अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

यहां लड़ाई मासूमों के बीच नहीं कातिलों के बीच है


केरल की हिंसा


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    पिछले दिनों दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों और टी.वी.चैनलों में अपने पूरे प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए भाजपा व संघ के नेता केरल में उनके खिलाफ हो रही तथाकथित हिंसा पर खूब भावुक बातें कर रहे हैं। वे उलाहना देने के साथ बुद्धिजीवियों का आह्वान भी कर रहे हैं कि उन्हें संघ-भाजपा के खिलाफ हो रही हिंसा के विरोध में पुरुस्कार वापसी जैसा कुछ करना चाहिए। 

    रक्षा-वित्त मंत्री अरूण जेटली से लेकर राकेश सिन्हा जैसे लिखाड़-बातूनी संघ विचारक ऐसा मासूम व्यवहार कर रहे हैं। मानो केरल में हो रही राजनीतिक हिंसा में ये दूध के धुले हुए हैं। ‘वामपंथी’ इन मासूम, सताये हुए बेचारे पवित्र कर्म में लगे लोगों के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। इनको जान के लाले पड़े हुए हैं। कोई इनकी सुनने वाला नहीं है। और मीडिया इस विषय में ‘वामपंथियों’ की जितनी लानत-मलानत कर सकता था, उतना नहीं कर रहा है। पक्षपात कर रहा है। 

    क्या संघ भाजपा केरल के बारे में जो कह रहे हैं, वह सच हैं? संघ-भाजपा के चाल-चरित्र को समझने वाला कोई भी व्यक्ति अपने सहजबोध से कह सकता है कि यह सच नहीं हो सकता या तो अर्द्ध सत्य है या फिर झूठ-मिथक गढ़ने में माहिर संघी भाजपाइयों का नया शिगूफा है। 

    सच्चाई यह है कि केरल में संघी भाजपाई कहीं से सताये हुए या मासूम नहीं हैं। केरल में वे पूरे भारत की तरह अपने घृणित राजनैतिक प्रचार के साथ संगठित तौर पर हमलावर हैं। वे अर्द्ध गुप्त, अर्द्ध सैन्य संगठन की तरह केरल में भी सक्रिय हैं। वे न केवल संगठित हमले करते हैं बल्कि दुर्दांत ढंग से अपने विरोधियों की हत्याएं भी करते हैं। केरल में आक्रामक हिंसा को अंजाम देने वाले शेष देश में अपने प्रचार संगठनों, अरूण जेटली जैसे वकील और राकेश सिंहा जैसे विचारकों के दम पर अपने को भोला-भाला सताया हुआ पवित्र राजनैतिक प्राणी घोषित करते हैं। गुजरात नरसंहार, बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसे कारनामे आयोजित करने वाले केरल में कहीं से अहिंसक साधु-संत नहीं बन गये हैं। यही बात तथ्यों से भी साबित होती है। 

    केरल पुलिस के अनुसार वर्ष-2000 से केरल में 172 राजनैतिक हत्याएं हुई है। इन हत्याओं में सर्वाधिक लोग माकपा के मारे गये हैं। सी.पी.आई.(एम) के 85, भाजपा-संघ के 65, कांग्रेस के 11 और टी.यू.एम.एल. के 11 लोग मारे गये हैं। यानी संघ-भाजपा के लोग मारे गये हैं तो इन्होंने भी माकपा के लोगों की हत्याएं की हैं। हिंसा-प्रतिहिंसा केरल के राजनैतिक परिदृश्य में आम है और यह हिंसा अपने राजनैतिक आधार को बनाने, बचाये रखने के लिए की जाने वाली हिंसा का हिस्सा है। हत्याएं बहशियाना ढंग से की जाती हैं ताकि उससे विरोधियों के कार्यकर्ताओं, समर्थकों के दिल में आतंक कायम हो। आतंक कायम करने के लिए ये हत्याएं निरंतर की जाती हैं। ऐसा नहीं है कि एक-दो हत्याओं के बाद ये सिलसिला रुक जाता हो। 

    केरल में राजनैतिक विरोधियों के बीच चल रही  इस हिंसा में ऐसा नहीं है कि एक पक्ष न्यायपूर्ण हो और दूसरा अन्यायपूर्ण हो। माकपा भाजपा-संघ को उन्हीं कि भाषा में जब जवाब दे रही है तो उसके भी कोई पवित्र उद्देश्य नहीं है। वह एक ऐसी पूंजीवादी पार्टी है जो अपने नाम के आगे कम्युनिस्ट और पीछे मार्क्सवादी लगाती है लेकिन उसका कम्युनिज्म या मार्क्सवाद से वास्तव में कोई नाता नहीं रह गया है। वह एक चुनावबाज पूंजीवादी पार्टी बन चुकी है। अपने चरित्र में वह सामाजिक फासीवादी है। इस तरह से देखें तो केरल की राजनैतिक हिंसा के पीछे एक खुले-नंगे हिन्दुत्व फासीवादी गुट संघ-भाजपा का सामना ढके-छिपे सामाजिक फासीवादी गुट से हो रहा है। और मजे की बात है कि दोनों ही गुट की लक्षित आबादी हिन्दू मतदाता है। केरल में माकपा को एक हिन्दू पार्टी के रूप में ही देखा समझा जाता है। संघ-भाजपा इसी हिन्दू मतदाता को प्रभावित-आतंकित करना चाहती है ताकि उसका भारत को एक हिन्दू फासीवादी राज्य में बदलने का कुस्वप्न साकार हो सके। संघ-भाजपा केरल में घृणित सांप्रदायिक प्रचार को संगठित और विस्फोटक ढंग से करती है। इसके मुकाबले माकपा इस काम को ऐसे करती ही नहीं है कि उस पर कोई सीधे तौर पर केरल में हिन्दू पार्टी होने का आरोप लगा सके। वह अपने राजनैतिक आधार को परंपरागत ढंग से बनाये रखने के लिए वामपंथी लफ्फाजी का सहारा लेती है और उन समीकरणों का ध्यान रखती है जो चुनावी सफलता के लिए आवश्यक होते हैं।

    यहां एक तथ्य और दिलचस्प है जब-जब वहां वामपंथी मोर्चे की सरकार रही है तब-तब राजनैतिक हिंसा का ग्राफ ऊपर गया है। 

    जहां तक इस राजनैतिक हिंसा में मरने वालों का सवाल है वे अधिकांश जन साधारण के लोग हैं। गरीब सर्वहारा आबादी से लेकर निम्न मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के लोग ज्यादा हैं। माकपा के निशाने पर ऐसे लोग अकसर रहते हैं जो पाला बदलकर भाजपा-संघ में चले गये हैं। संघ-भाजपा के द्वारा माकपा के प्रमुख स्थानीय कार्यकर्ताओं व नेताओं की हत्याएं करना उसके अब तक के मजबूत राजनैतिक आधार को खत्म करने की योजना का हिस्सा है। 

    केरल की तरह की राजनैतिक हिंसा पश्चिम बंगाल में आम रही है। वहां यह हिंसा दूसरे पूंजीवादी गुटों के साथ राजनैतिक वर्चस्व के रूप में फूटती रही है। यही स्थिति देश के अन्य हिस्सों में भी दिखायी देती है परंतु केरल की तरह संगठित, व्यापक व निरंतर होने वाली हिंसा केरल की प्रमुख विशेषता बन गयी है उसका एक प्रमुख कारण किसी भी कीमत पर इस राज्य में राजनैतिक व सामाजिक आधार हासिल करने की संघ व भाजपा की मंशा है। 

Labels: राष्ट्रीय


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