अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

मच्छरों पर चर्चा


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    आज बड़े अफसोस के साथ मच्छरों पर चर्चा करनी पड़ रही है। हमारे चारों तरफ मच्छर हैं। परन्तु मच्छरों पर चर्चा का न तो अखबार वालों और न ही समाचार चैनलों के पास समय है। अफसोस प्रशांत किशोर के दिमाग में भी आज तक ऐसा विचार नहीं आया। 

    इस देश में चाय पे चर्चा होती है, गाय पर चर्चा होती है, खाट पर चर्चा होती है, शमशान व कब्रिस्तान पर भी चर्चा होती है परन्तु मच्छरों पर चर्चा के लिए राजनैतिक दलों व नेताओं के पास समय नहीं है। चीन पर विमर्श होता है, पाकिस्तान और आतंकवाद पर विमर्श होता है परन्तु जनशिक्षा और जनस्वास्थ्य विमर्श से पूरी तरह गायब है। 

    सोचिए अगर किसी आतंकवादी हमले में इतने बच्चे मारे गये होते तब भी क्या समाचार चैनल डोकलाम पर विमर्श कर रहे होते? इस देश की सरकार मीडिया समूहों के मार्फत जानबूझकर राजनीतिक विमर्श में ऐसे मुद्दों को नहीं आने देती जो जनसरोकारों से सम्बद्ध हैं। बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद इसका राजनीतिक परिचर्चा में दो दिन भी न बने रहना आश्चर्यजनक है। 

    इस देश में सरकारी आंकड़ों के उलट मच्छरों से होने वाली बीमारियों से मरने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के अधीन ‘नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कण्ट्रोल प्रोग्राम’ चलाया जा रहा है। उसकी 2014-15 की वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि 2014 में मच्छरों से होने वाली बीमारियों के चलते केवल 316 लोगों की ही भारत वर्ष में मृत्यु हुई। रिपोर्ट में जापानी इंसेफ्लाइटिस से 286 लोगों के मरने, जबकि डेंगू से मात्र 86 मौतों का आंकड़ा दर्ज है। यह डाटा 2014 अक्टूबर तक का है और समग्र भारत का है। 

    अखिल भारतीय स्तर पर डेंगू व जापानी इंसेफलाइटिस से इतनी कम मौतों का दर्ज होना शायद यही इंगित कर रहा है कि गणना अवास्तविक तथ्यों पर आधारित है या इसमें उन मौतों को शामिल नहीं किया गया है जो सरकारी अस्पतालों में नहीं हुयी थीं। और जो भी हो मच्छर जनित बीमारियों    से होने वाली मौतों का आंकड़ा वास्तविकता से मेल नहीं खाता है। फिर भी इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि रिपोर्ट उन आंकड़ों को भी बहुत कम दिखाती है जो मच्छर जनित बीमारियों के शिकार रहे हैं। उपरोक्त रिपोर्ट में यह दर्ज है कि चिकनगुनिया के 12,694 डेंगू के 33,320 तथा जापानी इंसेफलाइटिस के मात्र 1568 मामले दर्ज हुए। इसके साथ ही मलेरिया के 851372 मामले दर्ज हुए।

    अगर कोई स्वतंत्र संस्था एक ही राज्य के सरकारी व निजी अस्पतालों तथा ऐसे मरीजों का डाटा इकट्ठा करवाये जो मच्छर जनित बीमारियों के शिकार तो हैं परन्तु अस्पताल नहीं जा पाते तो इस सरकारी संस्था की गणना की पोल खुलते देर नहीं लगेगी। सरकारी डाटा व्यवहारिक जीवन की सच्चाइयों से मेल नहीं खाता है। वास्तविकता तो यह है कि मच्छरजनित बीमारियों मसलन मलेरिया, डेंगू, फाइलेरिया, चिकनगुनिया आदि में सामान्य जन का जीना दूभर कर दिया है। कभी कभी तो इन बीमारियों का भय जनमानस में इतना पसर जाता है या यह कहें कि कभी इनका भय इतना फैलाया भी जाता है कि दवा कम्पनियों से लेकर मच्छरों तक की पौ बारह हो जाती है। 

    जनमानस मच्छरजनित बीमारियों से त्रस्त है और हजारों लोग मौत के भी शिकार हो रहे हैं परन्तु इस देश के हुक्मरानों के पास जनस्वास्थ्य पर चर्चा के लिए वक्त नहीं है। चिकित्सा व्यवस्था में जैसे-जैसे निजी पूंजी बढ़ी है और इस क्षेत्र का जिस हद तक बाजारीकरण हुआ है उसने शहरी व देहात के गरीब जनसमुदाय को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। दवा कंपनियां और अस्पतालों के मालिक तब सबसे ज्यादा खुश होते हैं जब मौसम बदलने के साथ साल में दो बार बीमारियों का सीजन आता है। अगर नागरिक निरोगी हुए तो वे दुखी हो जाते हैं। 

    सरकारें अगर जनस्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देती है तो इसका सीधा फायदा दवाई कम्पनियां, निजी चिकित्सक व अस्पताल उठा रहे हैं। कमीशन खोरी के लालच ने डॉक्टरी पेशे को इतना बदनाम कर दिया है कि अब कोई डॉक्टर पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। दवाई में कमीशन, जांचों में कमीशन यहां तक कि अस्पताल में रोगी को भर्ती करवाने वालों को भी कमीशन दिया जाता है। दवाई कम्पनियों से मिलकर इतनी महंगी दवाइयां लिखी जाती हैं कि रोगी की आर्थिक तौर पर कमर ही टूट जाये। गांव-शहर के गरीब-गुरबा चिकित्सा व्यवसाय में मौजूद दलाली के इस गोरखधंधे में ऐसे पिस रहे हैं कि वे अपना सब कुछ अस्पतालों की देहरी पर लुटा बैठते हैं और ऐसा करने वाले चिकित्सकों से लेकर दलाल और दवा कम्पनियों तक सब मालामाल हो रहे हैं। 

    जनस्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ क्या हुकूमतों को दिखाई नहीं देता। परन्तु जो निजाम/व्यवस्था स्वयं जनस्वास्थ्य से मुंह मोड़ चुकी हो वह उपरोक्त हालात को ठीक कैसे कर सकती है? उसके सामने धर्मसंकट है कि वह मच्छरों को खत्म करने के लिए गांव-शहर में पैसा खर्च करे और अपने नागरिकों के जीवन को बचाये या फिर चिकित्सा व्यवस्था के व्यापारियों के आगे दुम हिलाये जिनका ‘सीजन’ इन बीमारियों के बिना, बिना कमाई के निकल जायेगा। 

    ऐसा नहीं है कि जनस्वास्थ्य के प्रति यह नजरिया सिर्फ मोदी सरकार का है या कुछ राज्य सरकारों का है। दरअसल दल चाहे जो भी हों सभी का जन स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण तिरस्कार का ही रहा है। सरकारें जनस्वास्थ्य के ख्याल को निजी मामला बनाकर देखती रही हैं। सरकारों के इस घृणित नजरिये ने ही जनस्वास्थ्य को इस खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है कि आम नागरिक के लिए अपना इलाज कराना असम्भव हो चला है। 

    सरकारें अगर केवल मच्छरों को ही खत्म कर दें और यह कोई बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं है तो ही इस देश के गरीब-गुरबा को आधी बीमारियों से निजात मिल जायेगी। वे बरबाद होने से बच जायेंगे और अपने बेहतर जीवन को जीने की कोशिश कर सकते हैं परन्तु हम सभी जानते हैं कि सरकारें ऐसा नहीं करेंगीं। 

    ऐसे में जरूरत यही है कि जनस्वास्थ्य के प्रश्न को सरकारों के ऊपर यूं ही न छोड़ा जाये। जहां सरकार से जनस्वास्थ्य पर खर्च के लिए एक ओर लड़ा जाये तो दूसरी ओर जन स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल के लिए लोगों को उत्साहित किया जाये। जनस्वास्थ्य केन्द्रों पर इलाज व दवाई मुहैय्या न होने पर इसके लिए संघर्ष किया जाये। 

Labels: राष्ट्रीय


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