अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

ग्रेजियानो प्रकरण : मारुति की तर्ज पर चार मजदूरों को आजीवन कारावास की सजा


Print Friendly and PDF

    ग्रेटर नोएडा में स्थित कम्पनी ग्रेजियानो के सीईओ की तथाकथित हत्या के दोषी चार मजदूरों राजेन्द्र कुमार, मोहिन्दर सिंह, पंकेश कुमार और सज्जन कुमार को 17 अगस्त को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुना दी साथ ही प्रत्येक को तीन हजार अर्थदण्ड की भी सजा दी है। दो मजदूरों को तीन वर्ष व दो मजदूरों को 1 वर्ष की सजा सुनाई गयी है। कुल मिलाकर 75 मजदूरों पर तथाकथित हत्या का केस चल रहा था जिनमें बाकी मजदूरों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। 

    घटना उस वक्त की है जब 22 सितम्बर 2008 को फैक्टरी में मजदूरों व प्रबंधक के गुण्डों के बीच संघर्ष हुआ और इसी बीच सीईओ ललित किशोर चौधरी को चोट लगी और अस्पताल में उनकी मौत हो गयी। पुलिस के अनुसार मजदूरों ने उनको हथोड़े से मारा और एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार वे छत से कूदे और कूदते समय उनको चोट लगी। बहरहाल कोर्ट ने पुलिस के द्वारा पेश सबूतों के आधार पर 4 मजदूरों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। 

    ग्रेजियानो कम्पनी में मजदूरों व प्रबंधकों के बीच संघर्ष और उसके बाद लम्बे समय तक सीईओ की तथाकथित हत्या के जुर्म में मजदूरों को जेल में रखना और फिर 4 मजदूरों को आजीवन कारावास की सजा तक की कहानी एक तरह से मारुति प्रकरण से बहुत कुछ मिलती है। यह आज व्यवस्था के एक और अंग कोर्ट के निर्लज्जता के साथ पूंंजीपति वर्ग के पक्ष में खुलकर खड़े हो जाने को भी दिखाता है। 

    ग्रेजियानो कम्पनी की स्थापना 2003 में हुयी थी। यह इटालियन मूल की बहुर्राष्ट्रीय कम्पनी है जिसके पूरी दुनिया में 34 प्लांट हैं। यह गाड़ियों के लिए गियर बनाती है। आजकल इसका स्वामित्व अमेरिकी है। उस समय मात्र 20 करोड़ की पूंजी से यह कम्पनी खड़ी की गयी थी। और 2008 आते-आते यह कम्पनी 400 करोड़ का टर्न ओवर कर रही थी।  इस कम्पनी की इतनी बड़ी तरक्की के पीछे दरअसल मजदूरों के खून पसीने की कमाई पर डाका था, उनका अकूत शोषण था। उस समय कम्पनी में 350 मजदूर स्थायी, 80 मजदूर ट्रेनी/अप्रेन्टिस और 500 मजदूर ठेके के थे। कम्पनी में दो शिफ्टें 12-12 घंटे की चलती थीं। 8 घंटे के अलावा 4 घंटे ओवरटाइम के होते थे। ये ओवरटाइम के घंटे अनिवार्य थे। अगर कोई ओवरटाइम नहीं करता था तो उसको निकाल दिया जाता था। कोई भी छुट्टी मजदूरों को नहीं दी जाती थी। इस सबके साथ कोढ़ में खाज यह बात थी कि झूठे बहानों के द्वारा मजदूरों की तनख्वाह काट ली जाती थी जैसे कि कार्ड पंचिंग के समय उचित तरीके से कार्ड पंच न करने पर जुर्माना लगाया जाता था। जबकि यह गलती एचआर विभाग की होती थी। 

    अपने शोषण व उत्पीड़न के खिलाफ पहली बार 2 दिसम्बर 2007 को मजदूरों ने आवाज उठायी। उनकी यूनियन की फाइल को तीन बार श्रम विभाग, कानपुर ने रिजेक्ट कर दिया था। चौथी बार जाकर उनकी यूनियन बनी लेकिन उसको मैनेजमेण्ट ने मान्यता नहीं दी। उनकी यूनियन एटक से सम्बन्धित थी। 100 मजदूरों का कम्पनी ने 4 दिसम्बर को लॉक आउट कर दिया। 7 दिसम्बर 2007 को एटक ने मैनेजमेण्ट की इस शर्त को स्वीकार कर लिया कि फैक्टरी में सब कुछ सामान्य होने पर ही यूनियन से बात की जायेगी। परन्तु जब इसको मजदूरों ने स्वीकार नहीं किया तो एटक ने भी मजदूरों को मंझधार में छोड़ दिया। 

    मजदूरों ने फिर भी हौंसला नहीं छोड़ा। 24 जनवरी को डीएलसी, मैनेजमेण्ट व मजदूर प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ जिसमें 3000 रुपये की वेतन वृद्धि का समझौता हुआ। पहले साल 1200 रुपये, दूसरे साल 1000 रुपये व तीसरे साल के लिए 800 रुपये। लेकिन जैसा कि हमेशा होता है मैनेजमेण्ट ने अपने इस फैसले को लागू नहीं किया और इसके बजाय वह यूनियन तोड़ने के काम में लग गयी। 

    मैनेजमेण्ट ने यूनियन पर दबाव बनाने के लिए ठेके के 400 मजदूरों को भर्ती किया जो मजदूर कम प्रबंधन के पालतू ज्यादा थे। मई 2008 में उसने 5 मजदूरों को निकाल दिया बाद में 29 और मजदूरों को उसने निकाल दिया। मजदूरों को तरह-तरह से परेशान करना उसने शुरू कर दिया। ताकि मजदूर कोई कार्यवाही करें और उसे मौका मिले। मैनेजमेण्ट ने कम्पनी में लगे एग्जॉस्ट फैन को बंद कर दिया जिससे कम्पनी के अंदर काफी गर्मी हो गयी। 30/31 मई को उसने 30 मजदूरों के खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखायी। बाद में 1 लाख की जमानत राशि पर मजदूरों को छोड़ा गया। 1 जुलाई 2008 को मजदूरों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। 2 जुलाई को जब मजदूर फैक्टरी पहुंचे तो 192 मजदूरों को निकाल दिया गया। 16 सितम्बर को एएलसी, डीएलसी और एडीएम की मध्यस्थता में समझौता हुआ कि मजदूर एक पेपर पर साइन करेंगे और अपनी गलती मानेंगे। इस कार्यवाही को बजाय श्रम विभाग में करने के मैनेजमेण्ट के ऊपर छोड़ दिया गया। जब मजदूर 18 सितम्बर 2008 को फैक्टरी पहुंचे तो उनको 22 सितम्बर को आने के लिए बोला गया। पूर्व निर्धारित योजना के 22 सितम्बर को वहां गुण्डों व सुरक्षा गार्डों को तैनात किया हुआ था और एक-दो मजदूरों को अंदर ले जाकर उन पर एक पेपर पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला गया। जिसमें लिखा था कि वे जब तक वहां काम करेंगे कोई पंगा नहीं करेंगे। यूनियन गतिविधियों में भाग नहीं लेंगे। इस पर मजदूर भड़क गये। मैनेजमेण्ट ने पहले से तैयारी की हुयी थी। गुण्ड़ों व सुरक्षा गार्डों ने मजदूरों को घेर कर पिटाई करनी शुरू कर दी। पुलिस तमाशबीन खड़ी रही। इसी बीच सीईओ ललित किशोर चौधरी ने छत से ऊपर से नीचे कूदने की कोशिश की और उसकी चोट लगने से अस्पताल में मौत हो गयी। 

    सीईओ की मौत को मुद्दा बनाकर कम्पनी ने यूनियन के अग्रणी लोगों पर मुकदमा दर्ज करवा जेल भेज दिया और बाद में उनको बर्खास्त कर दिया गया। जबकि सीईओ की पत्नी जो दिल्ली के किरोडी मल कॉलेज में भौतिकी की प्रोफेसर है, ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि उनकी मौत कारपोरेट प्रतिद्वन्द्विता का परिणाम है। लेकिन फिर भी मजदूरों को सालों-साल जेल में सड़ा दिया गया और अब 4 मजदूरों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी है। 

    इन मजदूरों को मारुति मजदूरों की तरह ही बेकसूर होने के बावजूद सजा सुनाई गयी है। इन मजदूरों को सजा सुनाने के साथ अदालत का पूंजीपतियों की खुली सेवा में उतर आना दिखा रहा है कि पूंजीवादी व्यवस्था में न्याय प्रणाली पूंजीपति वर्ग की ही सेवा करेगी। मजदूरों के साथ इस तरह का व्यवहार कर न्याय प्रणाली उनके सामने अपने असली रूप को ही उजागर कर रही होगी। साथ ही एटक जैसी ट्रेड यूनियनों का मजदूरों के संघर्षों से किनाराकसी करना, उनकी पूंजीपरस्ती को ही दिखलाता है। मजदूर इन जैसी ट्रेड यूनियनों से किनाराकसी तो कर रहे हैं लेकिन उनके सामने अपनी क्रांतिकारी ट्रेड यूनियनों के निर्माण की चुनौती भी मौजूद है। इस चुनौती को देश में मौजूद क्रांतिकारी संगठनों को अपने हाथ में लेना होगा।  

Labels:


घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर क्लिक करें।

अन्य महत्वपूर्ण लिंक्स


हमें जॉइन करे अन्य कम्यूनिटि साइट्स में

घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर
-फैक्टरी में घटने वाली घटनाओं की रिपोर्ट भेज कर
-मजदूरों व अन्य नागरिकों के कार्य व जीवन परिस्थितियों पर फीचर भेजकर
-अपने अनुभवों से सम्बंधित पत्र भेज कर
-विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, बेबसाइट आदि से महत्वपूर्ण सामग्री भेज कर
-नागरिक में छपे लेखों पर प्रतिक्रिया व बेबाक आलोचना कर
-वार्षिक ग्राहक बनकर

पत्र व सभी सामग्री भेजने के लिए
सम्पादक
'नागरिक'
पोस्ट बाक्स न.-6
ई-मेल- nagriknews@gmail.com
बेबसाइट- www.enagrik.com
वितरण संबंधी जानकारी के लिए
मोबाइल न.-7500714375