अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

सोचो तो -गोरख पाण्डेय


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बिलकुल मामूली चीजें हैं

आग और पानी

मगर सोचो तो कितना अजीब होता है

होना

आग और पानी का

जो विरोधी हैं

मगर मिलकर पहियों को गति देती हैं

वैसे, सोचो तो अंधेरे में चमकते

ये हजारों हाथ हैं

इतिहास के पहियों को

रोटी-रचना और मुक्ति के

पड़ावों की ओर बढ़ाते हुए

इतिहास की किताबों में

इनका जिक्र भी न होना

सोचो तो कितना अजीब है

सोचो तो मामूली तौर पर

जो अनाज उगाते हैं

उन्हें दो जून अन्न जरूर मिलना चाहिए

उनके पास कपड़े जरूर होने चाहिए

जो उन्हें बुनते हैं

और उन्हें प्यार मिलना ही चाहिए

जो प्यार करते हैं

मगर सोचो तो

यह भी कितना अजीब है

कि उगाने वाले भूखों रहते हैं

और अनाज पचा जाते हैं

चूहे और बिस्तरों पर

 पड़े रहने वाले लोग

बुनकर फटे चीथड़ों में रहते हैं

और अच्छे-से-अच्छे कपड़े

प्लास्टिक की मूर्तियां पहने होती हैं

गरीबी में प्यार भी नफरत करता है

और पैसा नफरत को भी 

प्यार में बदल देता है

सोचो तो इस तरह कितनी अजीब और

कभी-कभी एकदम उलटी

होती हैं चीजें

जिन्हें हम मामूली समझकर चलते हैं

वैसे, सोचो तो सोचने को

बहुत कुछ है मगर सोचो तो

यह भी कितना अजीब है

कि हम सोच सकते हैं

कि फसल जमींदारों के बिना भी

उग सकती है

जैसे परमाणु अस्त्रों के बिना भी

कायम हो सकती है शांति

जो कल-कारखाने अपने हाथों चलाते हैं

वे उनके मालिक भी हो सकते हैं

पानी जोंकों के बिना भी

बहता रहता है

और आग झोंपड़े जलाने के लिए नहीं

बल्कि ठंड से कांपते लोगों को

बचाने के काम आ सकती है

सोचो तो सिर्फ सोचने से

कुछ होने जाने का नहीं

जबकि करने को पड़े हैं

उलटी चीजों को उलट देने जैसे जरूरी

और ढेर सारे काम

वैसे, सोचो तो यह भी कितना भी अजीब है

कि बिना सोचे भी

कुछ होने जाने का नहीं 

जबकि 

होते हो

इसलिए सोचते हो।

Labels: कविता


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