अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

‘नागरिक’ के बीस साल


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    नये वर्ष के साथ ‘नागरिक’ की उम्र बीस वर्ष हो गयी। 1998 में ‘नागरिक’ का प्रकाशन शुरू हुआ था।

    इन बीस वर्षों में ‘नागरिक’ एक मौके को छोड़कर निरन्तर बिना किसी व्यवधान के प्रकाशित होता रहा। ऐसे समय में जब अखबार, पत्र-पत्रिकायें कुछ माह का जीवन जी पाते हैं वहां बीस वर्ष तक इसका प्रकाशन संभव बनाने में ‘नागरिक’ के पाठकों, शुभेच्छुओं, कार्यकर्ताओं का योगदान बेहद उल्लेखनीय है। जाहिर है हम सब उस उद्देश्य के लिये समर्पित रहे हैं जो ‘नागरिक’ के पहले अंक के समय व्यक्त किया गया था।

    ‘नागरिक’ को इन बीस सालों में कई चुनौतियों व कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। चुनौतियां व कठिनाईयां उन सब की ओर से आयीं जिनके खिलाफ ‘नागरिक’ की आवाज बुलन्द है। पूंजीवाद, उसकी बाजार व्यवस्था और उसको संचालित करने वाली सत्ता।

    लगातार बढ़ती महंगाई के बीच ‘नागरिक’ को यदि लगातार उसके पाठकों, शुभेच्छुओं का साथ न मिला होता तो यह यात्रा संभव न होती। जहां तक साथी संवाददाताओं, कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम और रोज-रोज उठायी जाने वाली परेशानी की बात है वह नये समाज बनाये जाने की हमारी सोच और कोशिशों का अभिन्न हिस्सा है।

    ‘नागरिक’ के पाठकों को डराने-धमकाने की कोशिशें भारतीय राज्य द्वारा एक समय काफी की गईं। परन्तु ऐसे मौकों पर ‘नागरिक’ को हर ओर से ऐसा साथ मिला जिसकी उस वक्त ‘नागरिक’ के प्रकाशन को जारी रखने के लिए अति आवश्यकता थी। ‘नागरिक’ को उसकी जड़ों से काटने की कोशिशें विफल हो गयीं। समाज के बुद्धिजीवियों, लेखकों तक अपनी बात पहुंचाने और व्यापक मेहनतकश जनता को अपने साथ खड़ा करने के लिये उस समय से प्रतिवर्ष जो ‘सेमिनार’ का सिलसिला शुरू किया गया वह आज तक जारी है।

    ‘नागरिक’ ने अपनी पूरी क्षमता के साथ भारत के मजदूरों, किसानों, स्त्रियों, नौजवानों, शोषित-उत्पीड़ित सभी जनों की आवाज को बुलन्द करने की कोशिश की है। इसमें कई खामियां-कमियां रही हैं जिसकी ओर हमारे आलोचक इशारा करते रहे। आलोचना हमारे लिये अच्छी शिक्षक साबित हुयी। पर अभी भी यह बात बार-बार सालती है कि ‘नागरिक’ ने ऐसा शब्द सामाथ्र्य नहीं पैदा किया है कि यह भारत के मजदूरों, किसानों, शोषित-उत्पीड़ितों का मुखपत्र बन जाये। ऐसी आशा है कि आने वाले दिनों, वर्षों में ‘नागरिक’ भारत की शोषित-उत्पीड़ित जनता की ज्यादा सच्ची, ज्यादा ऊंची आवाज बन सकेगा।

    ‘नागरिक’ की अन्य चुनौतियां कुछ वैसी ही हैं जैसी पहले दिन थीं। प्रसार संख्या का सीमित होना, संसाधनों का बेहद अभाव, लगातार बढ़ती महंगाई के बीच इसकी लागत व कीमत को कम रखना इत्यादि।

    ‘नागरिक’ ने इन वर्षों में अपने रूप-रंग, कलेवर, तेवर में काफी बदलाव करने की कोशिशें की हैं। मजदूर आंदोलन व सामाजिक घटनाओं की वास्तविक तस्वीर खींचने की कोशिशें की हैं पर यह मजदूर व सामाजिक जीवन में इंकलाबी तेवरों से लगे हुये व्यक्तियों के निरन्तर व मजबूत सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता है। मजदूर वर्ग सहित शोषित-उत्पीड़ितों की सच्ची और ऊंची आवाज बनने के लिये ‘नागरिक’ को तन-मन-धन से मदद चाहिये। यह मदद जितनी गहरी और व्यापक होगी ‘नागरिक’ उतना ही आगे बढ़ेगा और चलेगा।

    आइये! हम सब जो ‘नागरिक’ के साथ किसी न किसी रूप में जुड़े हंै; पुनः अपने आपको उस उद्देश्य के लिये समर्पित करें, जिसका नाम इंकलाब है। ‘नागरिक’ इंकलाब की आवाज बन सके, इसके लिये वह सब करें, जो आवश्यक है।   संपादक 

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