अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

एक घोटाले की अजीब दास्तां


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    21 दिसंबर को सी.बी.आई. की विशेष अदालत ने जगत प्रसिद्ध 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया। न्यायाधीश ओ.पी. सैनी ने फैसला सुनाया कि सी.बी.आई. अपने आरोप साबित करने में नाकामयाब रही है।

    यह घोटाला जगत प्रसिद्ध इसलिये हो गया था जब सर्वोच्च न्यायालय ने स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द किया था तो इससे विदेशी टेलीफोन कंपनियां भी प्रभावित हुई थीं। बड़ी पूंजी के बहुत सारे समर्थकों का कहना है कि इस फैसले से देश में विदेशी पूंजी निवेश नकारात्मक तौर पर प्रभावित हुआ था। कुछ लोग इसके प्रभावों में वर्तमान बैंक संकट को भी रखते हैं

    इन प्रभावों के बारे में चाहे जितनी विवाद की गुंजाइश हो पर इस बारे में शक नहीं कि इसने देश की राजनीति को गहरे से प्रभावित किया था। कोयला घोटाले के साथ इस घोटाले ने वह माहौल तैयार किया कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार घोटालों की सरकार बन गई। इस माहौल में अन्ना हजारे जैसा जमूरा पश्चिम भारत के एक कोने से निकलकर दिल्ली का नायक बन गया। उसे नचाने वाले मदारी कुछ साल बाद दिल्ली प्रदेश सरकार पर काबिज हो गये। यही नहीं, इस माहौल का इस्तेमाल कर पश्चिम भारत का एक अन्य कस्बाई व्यक्ति सीधे दिल्ली की गद्दी पर आ विराजा। दिल्ली की इन दोनों गद्दियों पर काबिज होने वालों का दावा था कि वे भ्रष्टाचार का समूल नाश कर देंगे।

    अब सी.बी.आई. की विशेष अदालत के न्यायाधीश का कहना है कि समय बीतने के बाद सी.बी.आई. के अफसरों का उत्साह इस मामले में ढीला पड़ता गया और अंत में दिशाहीन हो गया। यह रोचक तथ्य है। सी.बी.आई. ने यह मुकदमा तब शुरू किया जब घोटाले बाज कांगे्रस सरकार थी। तब उसका मामले में उत्साह ज्यादा था। पर बाद में पिछले साढ़े तीन साल भाजपा सरकार रही है। अब सी.बी.आई. उत्साहहीन और दिशाहीन हो गयी। रोज-रोज विपक्षी नेताओं के यहां छापा मारने वाली सी.बी.आई. इस मामले में उत्साहहीन और दिशाहीन कैसे हो गयी? क्यों हो गयी? सी.बी.आई. को पूरी तरह से नियंत्रित करने वाली मोदी सरकार में ऐसा कैसे हुआ?

    इसका कुछ अंदाज दो घटनाओं से लगता है। कुछ समय पहले अचानक मोदी डी.एम.के. के नेता करुणानिधि से मिलने पहुंच गये थे। ए.राजा डी.एम.के. के हैं और कनीमोझी उनकी बेटी हैं। ये दोनों इस घोटाले में प्रमुख आरोपी थे। दूसरा, फैसला आने के बाद मोदी-शाह सरकार के ढाइवें व्यक्ति यानी अरूण जेटली ने यह कहा कि कांगे्रस पार्टी को इस फैसले को अपने प्रमाणपत्र के तौर पर या तमगे के तौर पर नहीं लेना चाहिये। शायद उनका आशय यह था कि हमारी मेहरबानी से आप बच निकले तो इतरायें नहीं।

    इस जगत प्रसिद्ध मामले में सी.बी.आई. के उत्साहहीन या दिशाहीन हो जाने का एक ही कारण हो सकता है। वह यह कि मोदी सरकार नहीं चाहती थी कि इसमें किसी को सजा हो। इसके पीछे डी.एम.के. के साथ भाजपा का कोई नया समीकरण हो सकता है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसमें देश के बड़े पूंजीपति वर्ग की उपस्थिति बड़ी वजह रही। हालांकि अनिल अंबानी इस मामले में वायदा माफ गवाह बन गये थे (यह अलग बात है कि उन्होंने याद न होने का बहाना बनाकर कुछ भी बताने से इंकार कर दिया) पर उनकी कंपनी के कुछ बड़े अफसर इसमें आरोपी थे। कम से कम मोदी ऐसे लोगों को सजा नहीं होने दे सकते थे। परिणाम निकला कि सात साल तक बिना नागा बैठने वाले न्यायाधीश महोदय को आरोपियों को निर्दोष घोषित कर देना पड़ा।

    2-जी स्पेक्ट्रम में दोनों घोटाले हुये थे- आम तौर पर पूंजीपति वर्ग पर सरकारी खजाना लुटाने वाला तथा खासतौर पर किसी खास पूंजीपति को फायदा पहुंचाने वाला। पहला पूरी सकार की नीति थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था यह कहते हुये कि नीति तय करने का अधिकार सरकार को है। दूसरा ए.राजा का अपना मामला था। यह मुकदमा दूसरे से संबंधित था। पहले के मामले में स्वयं फैसला सुनाने वाले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का कहना है कि वह दूसरे से भिन्न था इसलिये सी.बी.आई. अदालत के फैसले का उससे सम्बन्ध नहीं है। 

    यह बेहद महत्वपूर्ण बात है। पहले वाला घोटाला कोई कानूनी अपराध नहीं साबित किया जा सकता। इसके लिये किसी मोदी या किसी मनमोहन सिंह पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के पिछले तीन दशकों में यह धड़ल्ले से चल रहा है। इसमें सबसे बढ़-चढ़कर तो मोदी ने ही भूमिका निभाई है। इस भूमिका की वजह से ही बड़े पूंजीपति वर्ग की उन पर मेहरबानी हुई और वे दिल्ली की गद्दी पर बैठा दिये गये।

    ऐसा नहीं है कि मोदी दूसरे वाले घोटाले में लिप्त नहीं हैं। अडाणी से अनके सम्बन्ध जग जाहिर हैं। आज भाजपा को इफरात पैसा यूं ही नहीं मिल जा रहा है।

    पर असल बात पहले वाले घोटाले की है जिस पर लगभग कोई भी चर्चा नहीं होती। यह नहीं पूछा जा रहा है कि 2-जी स्पेक्ट्रम की बाद में नीलामी से सरकार को जो आय हुई उसका क्या हुआ? क्या वह फिर दूसरी तरह से उसी बड़े पूंजीपति वर्ग के पास नहीं पहुंच गयी?

    यह पूंजीपति वर्ग के हित में है कि लोगों का ध्यान दूसरे वाले घोटाले पर केन्द्रित रहे। पूंजीपति की लूट का असल खेल आंखों से ओझल रहता है।

Labels: राष्ट्रीय


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