अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

आई.एम.ए. की परेड व ‘शाखा दर्शन’


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    भारतीय सेना की छवि एक धर्म निरपेक्ष सेना की रही है। यह बात अपने आप में कितनी सच रही है इस पर विवाद हो सकता है लेकिन यह सच है कि आम तौर पर भारतीय सेना में सभी धर्मों, जातियों, क्षेत्र व पंथों के नौजवान शामिल होते हैं और धर्म व जाति के आधार पर सेना में कभी किसी भेदभाव की बात सामने नहीं आयी है। हालांकि यह बात सही है कि भारतीय सेना की स्थापना ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अपने औपनिवेशिक राज्य की सुरक्षा व उसके हितों के खातिर की थी और इसलिये उन्होंने कुछ जातियों को ‘मार्शल रेस’ का दर्जा दिया और कुछ खास इलाकों से भर्ती पर जोर दिया। फौजी रेजीमेण्टों के नाम भी इलाकों क्षेत्रों व जातियों के नाम पर रखे मसलन -कुमांऊ रेजीमेन्ट, गढ़वाल रायफल्स, राजपूताना रेजीमन्ट, गोरखा रेजीमेन्ट, महार रेजीमेन्ट, जाट रेजीमेन्ट, सिख रेजीमेन्ट आदि।

    जातिगत व क्षेत्रगत आधार पर रेजीमेन्ट बनाने की ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की नीति के मूल में फौजी रेजीमेन्टों के बीच जाति-क्षेत्र का श्रेष्ठता बोध कायम रखना था ताकि देश के विभिन्न इलाकों में आबादी के आन्दोलन को दबाने के लिये इन भावनाओं का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सके।

    आजादी के बाद ‘सर्व धर्म समभाव’ की नीति पर चलते हुये भारतीय शासकों ने औपनिवेशिक अतीत की गलतियों को खत्म तो नहीं किया लेकिन भारतीय सेना को धर्म-क्षेत्र की विभाजनकारी राजनीति से दूर रखा।

    लेकिन मोदी नीत भाजपा सरकार के कार्यकाल में पूंजीवादी जनतंत्र के सभी अंगों के भगवाकरण की मुहिम के साथ सेना के भगवाकरण की प्रक्रिया भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा शुरू कर दी गयी है।

    इस बार देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी की पासिंग आउट परेड के बाद एक अफसर (सेकेण्ड लेफ्टीनेन्ट) के बतौर कमीशन हासिल करने वाले जेन्टिलमैन कैडरों को ‘देशभक्ति’ का पाठ सीखने के लिए आर.एस.एस. द्वारा आयोजित ‘शाखा दर्शन’ कार्यक्रम में भी शिरकत करनी पड़ी।

    इस ‘शाखा दर्शन’ कार्यक्रम में आई.एम.ए. से पास होकर अफसर बनने वाले कैडेटों ने संघ प्रमुख मोहन भागवत का देशभक्ति पर भाषण व उपदेश सुना। जिस संघ का आजादी के आंदोलन में गद्दारी व अंग्रेज परस्ती का व आजादी के बाद साम्प्रदायिक विषैली राजनीति व दंगों का कलुषित इतिहास रहा हो उसी संघ के प्रमुख आई.एम.ए. कैडेट को देशभक्ति की घुट्टी पिला रहे थे। जाहिर है यह घुट्टी ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के सिवा और क्या हो सकती है।

    भारतीय सेना द्वारा अतीत में उच्च पेशेवर मानदंडों की बात करते हुये कभी भी इस तरह के कार्यक्रम नहीं रखे गये जिसमें सेना या सरकार से इतर कोई संगठन या व्यक्ति उन्हें ‘देशभक्ति’, ‘अनुशासन’ का पाठ पढ़ाये।

    लेकिन मोदी सरकार द्वारा सेना की ‘अराजनीतिक’, पेशेवर व ‘धर्मनिरपेक्ष’ छवि को तार-तार करते हुये सेना को ‘शाखा दर्शन’ करवा दिया। अगर भविष्य में सेना राष्ट्रीय ध्वज के साथ संघ का भगवा ध्वज साथ में लहराये व ‘जय हिंद’ के साथ ‘जय श्री राम’ का नारा लगाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। मोदी सरकार संघ के इशारे पर सेना को इसी दिशा में धकेल रही है। आखिरकार सेना के भगवाकरण के बिना ‘हिन्दू राष्ट्र’ का संघ का लक्ष्य कैसे पूरा होगा।

Labels: राष्ट्रीय


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