अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

अमरीकी साम्राज्यवादियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय


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    अमरीकी साम्राज्यवादी अक्सर ही दुनिया भर में अपनी लूटमार की गतिविधियों को जायज ठहराने के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ की बात करते रहते हैं। वे अपनी चाहत को ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ की चाहत बताते हैं।

    अभी हाल में अमरीकी साम्राज्यवादियों के ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ का एक नमूना सामने आया। अमरीका द्वारा यरूशलम में अपना इस्राइली दूतावास स्थानान्तरित करने के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 21 दिसम्बर को एक प्रस्ताव पास हुआ जिसमें अमरीका के फैसले का विरोध किया गया था। इस प्रस्ताव के समर्थन में 128 देशों ने मतदान किया। 35 देश तटस्थ रहे जबकि 8 देशों ने अमरीका का साथ दिया। 

    अमरीका का साथ देने वाले 8 देश कौन थे? वे थेः ग्वातेमाला, हांडूरास, इस्राइल, मार्शल द्वीप, माइक्रोनेसिया, नाउरू, पलाऊ और टोगो। इस्राइल को तो साथ देना ही था। बाकी सात में ग्वातेमाला एक छोटा सा दक्षिण अमरीकी देश है। हांडूरास और भी सूक्ष्म है। बाकी तो बस छोटे-छोटे द्वीप हैं जिन्हें दुनिया के नक्शे में ढूंढना मुश्किल है। ये अमरीकी सैनिक अड्डे हो सकते हैं। इस्राइल के मसले पर यही है अमरीकी साम्राज्यवादियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय।

    तटस्थ रहने वालों में आस्ट्रेलिया, अर्जेन्टीना और कनाडा ही बड़े देश थे। बाकी या तो छोटे-छोटे देश थे या फिर पूर्वी यूरोप व अफ्रीका के देश जो अमरीका पर निर्भर हैं। भारत के पूंजीपति वर्ग के लिए यह महत्वपूर्ण सूचना हो सकती है कि तटस्थ रहने वालों में भूटान भी था। 

    यहां यह भी याद रखना होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में मतदान के पहले अमरीकी साम्राज्यवादियों ने खुलेआम धमकी दी थी कि जो देश अमरीका के खिलाफ मतदान करेंगे, अमरीका उन्हें याद रखेगा यानी उन्हें इसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ेगा। 

    इस्राइल के मामले में अमरीकी साम्राज्यवादियों की हमेशा से ही यह स्थिति रही है। कई बार तो संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में केवल अमरीका और इस्राइल ही साथ होते थे। इस्राइल के खिलाफ इस आम सभा के प्रस्तावों की संख्या पचासों में है। सुरक्षा परिषद में अमरीका हमेशा इस्राइल विरोधी प्रस्तावों पर वीटो कर देता रहा है। दुनिया के एक सबसे महत्वपूर्ण मसले पर, जो कई मायने में अन्याय-अत्याचार का प्रतीक है, अमरीकी साम्राज्यवादियों का यही ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ रहा है।

    अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ हमेशा से ही एक सुविधाजनक श्रेणी रही है। जब दुनिया में अपनी किसी लूट-मार की गतिविधि को जायज ठहराने के लिए कुछ समर्थन हासिल हो जाता है तो वे ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ की बात करने लगते हैं। अन्यथा वे इस अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ठेंगा दिखाते हुए अपने मन की करते रहते हैं। अक्सर ही वे ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ का जो समर्थन हासिल करते हैं वह धौंस पट्टी और लालच से हासिल किया गया होता है। अन्य साम्राज्यवादी या पूंजीवादी देशों के शासक भी अपने हितों के मद्देनजर इस ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ में शामिल होते रहते हैं। 

    इस बात पर भारत में लोगों को आश्चर्य हुआ कि इस बार भारत अमरीकी साम्राज्यवादियों के इस ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ में शामिल नहीं हुआ। मोदी की संघी सरकार के काल में भारत इस हद तक अमरीकी साम्राज्यवादियों का बगलगीर हो गया है कि भारत द्वारा इस मसले पर परम्परागत तरीके से मतदान करने पर लोगों को आश्चर्य हुआ। यह आश्चर्य इसलिए और भी स्वाभाविक था कि कुछ दिन पहले ही भारत सरकार ने इस मसले पर चुप्पी साध ली थी। जहां दुनिया भर के तमाम देशों ने ट्रम्प द्वारा इस्राइल में अमरीकी दूतावास को यरूशलम स्थानांतरित करने की घोषणा की निंदा की थी वहीं भारत सरकार कुछ बोलने से कतरा गई। उसने गोलमाल वक्तव्य दिया कि वह इस्राइल-फिलिस्तीन विवाद के सही तरह से हल होने की पक्षधर है। 

    यह अमरीकी साम्राज्यवादियों की सफलता ही कही जायेगी कि उन्होंने भूटान को तटस्थ देशों की श्रेणी में शामिल कर लिया। कुछ लाख आबादी वाला भूटान इस समय भारत और चीन के बीच जंग का एक केन्द्र बना हुआ है। भारत के एक अघोषित प्रदेश के रूप में मौजूद भूटान का यह मत किसी भीतरी गति का संदेश हो सकता है। इसे कम से कम मोदी के बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय कद का प्रमाण तो नहीं माना जा सकता। 

    जैसा कि पहले कहा गया है अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ का तभी कोई महत्व है जब वह उनके साथ हो। अन्यथा वह जाये भाड़ में। इस बार भी उनका रुख यही है।   

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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