अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

मजदूर संघर्ष और मीडिया


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    (17 दिसम्बर को गुड़गांव में ‘नागरिक’ द्वारा ‘मजदूर संघर्ष और मीडिया’ विषय पर आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत सेमिनार पत्र)

    पूंजी के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ मजदूर वर्ग लगातार संघर्षरत रहा है। पूरी दुनिया के मजदूर आंदोलन की तरह भारत में भी मजदूर संघर्षों का गौरवशाली इतिहास रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी के खिलाफ श्रम का संघर्ष एक अनवरत व निरंतर चलने वाला संघर्ष है। इस संघर्ष के चलते मजदूर वर्ग ने पूंजीपति वर्ग को पीछे धकेलकर अनेक श्रम अधिकार हासिल किये, दुनिया में अपने राज्य भी कायम किये। आज से सौ वर्ष पहले रूस में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति एक ऐसी ही गौरवशाली व युगांतरकारी घटना थी जो मजदूर वर्ग द्वारा अंजाम दी गयी। एक समय पूरी दुनिया का एक तिहाई हिस्सा व आबादी का पांचवा हिस्सा मजदूर वर्ग के झंडे तले रहा। समाजवादी राज्यों के चलते पूरी दुनिया में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को गति मिली व साम्राज्यवादी गुलामी का जुआ तोड़कर कई मुल्क आजाद हुए जिनमें हमारा देश भी रहा है। इस तरह मजदूर वर्ग का संघर्ष ‘इतिहास’ को गति देने वाला, मानव सभ्यता को आगे ले जाने वाला रहा है। 

    कालांतर में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के चलते मजदूरों के राज खत्म हुए और पूरी दुनिया के स्तर पर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद मजदूरों के खिलाफ हमलावर हुआ। आज उदारीकरण, वैश्वीकरण के नाम पर लागू नवउदारवादी नीतियों के चलते मजदूरों का शोषण-उत्पीड़न काफी तेज हो गया है। लेकिन इस सबके बावजूद छिटपुट रूप में मजदूरों का संघर्ष सदा जारी रहा है। कभी मंद तो कभी तेज गति से वह निरंतर मौजूद रहा है। 

    मजदूरों के संघर्ष को कुचलने, उसका दमन करने और उसे बदनाम करने में पूंजीपति वर्ग ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। मजदूर आंदोलन का दमन करने में जहां राज्य मशीनरी खासकर पुलिस व सशस्त्र बलों का इस्तेमाल शासक वर्गों ने किया है तो वहीं मजदूर आंदोलन व मजदूर संघर्षों को बदनाम करने में मीडिया उसका मुख्य हथियार बना है। 

    आमतौर पर जब भी मीडिया की बात की जाती है तो उसका आशय तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया अथवा पूंजीवादी मीडिया से होता है। यहां भी मीडिया का आशय उस तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया से है जो अपने को स्वघोषित तौर पर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता है। इस ‘मुख्यधारा’ के मीडिया का मजदूर संघर्षों के प्रति रुख हमेशा आलोचनात्मक, निंदक, उपेक्षापूर्ण व दुश्मनानात्मक रहा है। पूरी दुनिया के मीडियातंत्र की तरह भारत में भी मीडिया की यही भूमिका है। 

    वैसे तो मीडिया का यही रुख सभी मेहनतकश वर्गों-तबकों के संघर्षों के प्रति रहा है पर तब भी यह कहना गलत नहीं होगा कि मजदूर वर्ग के संघर्षों के प्रति उसकी उपेक्षा/निन्दा कहीं ज्यादा है। किसानों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं के मुद्दे/संघर्ष यदा कदा मीडिया में जगह पा भी जाते हैं पर मजदूर वर्ग के संघर्षों को अधिकतर ही मीडिया में जगह नहीं दी जाती या दी भी जाती है तो उन्हें बदनाम करने की ही कोशिश अधिक होती है। 

    साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के जिस दौर में आज हम जी रहे हैं उसे कथित रूप से ‘सूचना क्रांति’ का युग भी कहा जाता है। सूचनाएं व समाचार आज पलक झपकते ही जिंदा रूप में देश के एक कोने से दूसरे कोने, संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद हम अपने आस-पास हो रहे मजदूरों के संघर्षों व आंदोलनों से पूरी तरह अनभिज्ञ रहते हैं। मजदूरों का संघर्ष कितना व्यापक व प्रभावशाली क्यों न हो वह समाचार पत्रों (खासकर मुख्यधारा के समाचार पत्रों) में जरा भी जगह नहीं पाता। देश की राजधानी में बैठे लोगों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र-गुडगांव, नोएडा, फरीदाबाद आदि में चलने वाले संघर्षों की भनक तक नहीं लगती। अगर आज किसी हद तक ये खबरें सीमित जनता तक पहुंच पाती हैं तो उसका कारण सोशल मीडिया या बेहद कम प्रसार संख्या वाली जनपक्षधर पत्र-पत्रिकायें हैं। अन्यथा मजदूरों-मेहनतकशों के संघर्ष गुमनामी में धकेल दिये जाते हैं। 

    संचार के माध्यम व साधन जो सूचना व ज्ञान के माध्यम हो सकते हैं, वे किस कदर कूपमंडूकता फैलाने अथवा खबरें छिपाने, मनमाफिक खबरें फैलाने का माध्यम बन सकते हैं। इसका उदाहरण पूंजीवादी मीडिया है। समाचार माध्यमों की भूमिका आज व्यापक जनता को देश-दुनिया के मजदूर संघर्षों व न्यायपूर्ण आंदोलनों से अनभिज्ञ रखकर अथवा काटकर उन्हें सत्ताधारियों अथवा शासक वर्गों के रोजमर्रा के लटके-झटकों, झगड़े-लफड़ों, सिनेमाई कलाकारों व क्रिकेटरों की चकाचौंध, सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत की गयी अपराध कथाओं, अश्लील व फूहड़ कामेडी शो, साधु-संतों के पाखंड़ी व भ्रामक प्रवचनों, अंधराष्ट्रवादी उन्माद, धार्मिक अंधविश्वासों, रूढ़िवादी परंपराओं, सास-बहू के किस्सों में फंसाये रखने की बन चुकी है। पतित उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रचार-प्रसार ही पूंजीवादी मीडिया का मुख्य काम बन चुका है। पूंजीवादी मीडिया की यह भूमिका बेहद सचेत भूमिका है। पूंजीवादी मीडिया किस हद तक सचेतन पूंजीपति वर्ग के पक्ष में मजदूर संघर्षों के विरोध में खड़ा होता है। इसे निम्न तथ्यों से समझा जा सकता है।

1. 2009 में गुड़गांव के रिको मजदूर आंदोलन के दौरान एक बाऊंसर की गोली से मारे गये; एक मजदूर अजीत यादव की हत्या का दोष प्रबंधन से सांठगांठ कर पुलिस प्रशासन ने मजदूरों के नेतृत्व पर थोप दिया। मीडिया ने वास्तविकता को सामने लाने के बजाय पुलिस-प्रबंधन गठजोड़ की कहानी को ही ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया। जबकि वह सच्चाई से वाकिफ था। 

2. मारूति-सुजुकी के मजदूरों का संघर्ष विगत समय में एक ऐसा संघर्ष रहा है जिसकी अनुगूंज पूरी दुनिया में सुनी गयी। भारत के मुख्यधारा के मीडिया ने इस संघर्ष को पहले तो नजरअंदाज किया और फिर एकाध मीडिया ने इस संघर्ष को बदनाम करने के आशय के साथ- मसलन ‘‘30 लाख में बिकी सोनू गुर्जर की नेतागिरी’’।

    मारूति आंदोलन के दौरान इस आंदोलन से अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान व औद्योगिक अशांति को लेकर मीडिया खासा चिंतित था। 18 जुलाई, 2012 को मारूति-सुजुकी के मानेसर कारखाने में अग्निकांड में एक मैनेजर की मृत्यु पर मीडिया ने तत्परता दिखाते हुए बिना किसी सबूत व जांच-पड़ताल के इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का दोष मारूति के संघर्षरत मजदूरों पर डाल दिया। मारूति आंदोलन के पूरे दौर में मीडिया पूरी तरह प्रबंधन, पुलिस प्रशासन व सरकार का पैरोकार बना रहा। 

3. विगत वर्षों में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर लाखों की संख्या में मजदूर जंतर-मंतर व संसद मार्ग पर प्रदर्शन करते रहे हैं। लेकिन भूले बिसरे ही इनकी खबर कभी समाचार चैनलों व राष्ट्रीय अखबरों में आती हैं। 

    2 सितंबर, 2016 को हुई देशव्यापी हड़ताल व बंद के दौरान रिकार्ड करोड़ों मजदूरों ने इसमें भागीदारी की। दुनियाभर में यह बंद व हड़ताल चर्चा का विषय बना लेकिन ‘सच को जिंदा रखने’ का दावा करने वाले तमाम प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इस घटना को खामोशी में दफन करना उचित समझा। इस वर्ष भी 9, 10 व 11 नवंबर को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर विभिन्न मांगों को लेकर हजारों मजदूर प्रतिदिन संसद मार्ग पर आयोजित इस महापड़ाव में इकट्ठा हुए लेकिन तीनों दिन किसी मीडिया चैनल या राष्ट्रीय अखबार ने इस महापड़ाव की तनिक भी चर्चा नहीं की। 

    कुछ बजरंगियों के उत्पात, कुछ सौ जाति व धर्म के ठेकेदारों के विरोध प्रदर्शन पर दिन-रात चीख-पुकार मचाने वाला मीडिया लाखों मजदूरों के प्रदर्शनों पर आखें चुरा लेता है। 

4. किसी होटल में शराब के नशे में हुई हत्या या मारपीट जैसी घटनाओं को मीडिया चैनल या समाचार पत्र सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करते हैं। हर एक मीडिया चैनल ने सनसनी, वारदात आदि नामों से हत्या व अपराध की घटनाओं के लिए नियमित प्रसारण कार्यक्रम बना रखे हैं। लेकिन इन समाचार चैनलों व अखबारों के लिए हर दिन मुनाफे की हवस में मजदूरों से खतरनाक परिस्थितियों में काम कराने व उनकी ठंडे दिमाग से की जाने वाली हत्याएं कोई खबर नहीं है। मजदूरों के मामले में तो संवेदनहीनता इस हद तक होती है कि लखानी फैक्टरी में हुए अग्निकांड जिसमें भारी संख्या में मजदूर मारे गये, ज्यादातर समाचार पत्रों ने केवल एक दिन ही छोटी सी एक कालम की खबर ‘‘जूता फैक्टरी में लगी आग’’ शीर्षक से लगाई। कंपनी का नाम तक बताना इस सच के कथित पहरेदारों को गंवारा नहीं हुआ। 

5. पूरी दुनिया सहित भारत में ट्रेड यूनियन संगठनकर्ता लगातार हत्या, अपहरण, अकारण या बिना किसी अपराध के गिरफ्तारी, मारपीट, हत्या की धमकी, उत्पीड़न आदि से गुजरते हैं। मीडिया को इन बातों की रिपोर्ट करने के बाद भी मीडिया इन बातों को कभी सामने नहीं लाता है। आज ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता दुनियाभर में राज्य और पूंजीपतियों के गठजोड़ से भयंकर रूप से उत्पीड़ित हैं। अमेरिका में 4 अरब डालर का उद्योग केवल धमकी और बाहुबल के दम पर यूनियन तोड़ने और मजदूर संघर्षों को खत्म करने का चल रहा है। भारत में भले ही यह इतना संगठित न हो पर मजदूर आंदोलन में भाड़े के गुंडों द्वारा भय फैलाने व मारपीट करने यहां तक कि हत्या कराने की घटनाएं यहां कोई नई बात नहीं है। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी, दत्ता सामंत मुंबई के प्रसिद्ध मजदूर नेता कृष्णा देसाई और सफदर हाशमी जैसे मजदूर नेताओं व रंगकर्मियों की हत्या मजदूर आंदोलन के दौरान भाड़े के गुंडों द्वारा करायी गयी। इनके वास्तविक हत्यारे कभी दंडित नहीं हुए। पुलिस, अदालत ने केवल भाड़े के गुंडों को पकड़कर व अदालत ने भी भाड़े के गुंडों को मामूली दंड देकर इतिश्री कर ली। तथाकथित मीडिया जो आरूषि हत्याकांड व जेसिका जैसे मामलों में सालों-साल खबरें चलाता रहता है मजदूर नेताओं की हत्या व उनकी हत्या के दोषियों का पता न लगने पर खामोश रहता है। 

6- हाल ही में कोयंबटूर स्थित प्रिकोल एवं मारूति मानेसर के मजदूरों के मुकदमों में अदालतों ने तथ्य, सबूत व तर्क से परे जाकर निवेश, बाजार व पूंजी के हितों के मानदंडों के आधार पर फैसले दिये। इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़कर किसी मुख्यधारा के अखबार या मीडिया चैनलों ने न तो इन फैसलों की चर्चा की और न इन पर सवाल उठाये। ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं जो मौजूदा समय में मीडिया के मजदूर वर्ग के प्रति रुख की झलक दिखला देते हैं। मजदूरों के जीवन व संघर्ष से जुड़े हर मामले में मीडिया की भूमिका पूंंजीपतियों के साथ पक्षधरता लिए सामने आती है। 

    मजदूर संघर्षों या आंदोलनों की खबर अगर कभी तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में जगह पाती है तो नकारात्मक प्रस्तुतिकरण के साथ ही पाती है। 

    मजदूर संघर्ष और हड़तालों के बारे में अखबारों व मीडिया चैनलों में खबरों में इन्हें बबाल, उपद्रव, अशांति के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है। कभी इस बात की चर्चा नहीं आती कि मजदूर हड़ताल करने को क्यों बाध्य होते हैं अथवा उनकी मांगें क्या थी? प्रबंधन द्वारा समझौता वार्ताओं से अनुपस्थित रहने या अड़ियल रुख अपनाने, मजदूरों का अथाह शोषण-उत्पीड़न करने की बात कभी सामने नहीं लायी जाती है। 

    मजदूरों द्वारा आहूत बंद या हड़ताल के दौरान जनता को होने वाली असुविधा समाचार माध्यमों की प्रमुख चिंता होती है। वे यह कभी नहीं बताते कि मजदूर फैक्टरियों में बहुत कम वेतन पर खतरनाक कार्य परिस्थितियों में 12-12 घंटे काम करते हुए रोज कितनी असुविधा झेलते हैं। मालिकों द्वारा की जाने वाली छंटनी व घोर शोषण-उत्पीड़न से मजदूरों की जिंदगी किस कदर नरक बन गयी हैं। 

    कुल मिलाकर मजदूर संघर्षों व आंदोलनों के प्रति मीडिया समाज में एक खास सोच या परसेप्शन (च्मतबमचजपवद) को निर्मित करती है जिसके अनुसार मजदूर जाहिल, उद्दंड, झगड़ालू और असभ्य-उत्पाती होते हैं। मजदूर आंदोलनों से औद्योगिक अशांति फैलती है। उद्योगों का पलायन होता है, विकास रुक जाता है। मजदूर आंदोलन के पीछे कुछ भड़काऊ तत्व होते हैं जो अपनी नेतागिरी को चमकाने के लिए मजदूरों को भड़काते हैं और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। मजदूरों को कठोर नियंत्रण में रखना जरूरी है। यूनियनबाजी किसी इलाके के औद्योगिक विकास के लिए घातक है। 

    इसलिए मजदूरों को कठोर नियंत्रण में रखना उन्हें भड़काऊ तत्वों से बचाना, औद्योगिक शांति बनाये रखना, यूनियनबाजी व लीडरी को हतोत्साहित करना जरूरी है। और इसी कारण मजदूर संघर्षों में पुलिस हस्तक्षेप, गुंडों और बाउंसरों का प्रयोग न केवल जायज है बल्कि जरूरी है।

    मजदूर संघर्षों पर बनी पुरानी हिन्दी फिल्में गांधीवादी-मानवतावादी रुख अपनाते हुए मालिक-मजदूर एकता का ढिंढोरा पीटती थीं। इनका सारतत्व यह होता था कि मालिक-मजदूर मिलकर देश का विकास कर सकते हैं। कि दोनों के हित एक से हैं। हां कुछ ‘दुष्ट’ मजदूर नेता उन्हें आपस में लड़ाने का माहौल पैदा करते हैं। मालिक मजदूरों को रोजी-रोटी देने वाला है। पूंजीवादी मीडिया भी मोटे तौर पर इसी रुख को अपनाता रहा है वह मजदूरों में व बाकी जनता में यह भ्रम पैदा करता है कि मालिकों व मजदूरों के हित एक से हैं। कि उद्योग-धंधों के विकास, बढ़ते पूंजी निवेश से देश का विकास होगा व इससे मालिकों-मजदूरों दोनों का भला होगा कि इस विकास की खातिर मजदूरों को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो उद्योगों के विकास, निवेश आदि को नुकसान पहुंचाये। कि देश में ढेरों इलाकों में फैक्टरियों की बंदी-पलायन के दोषी मजदूरों के संघर्ष हैं। 

    इस तरह मीडिया न केवल मजदूर वर्ग के संघर्षों को तिरस्कृत करता है बल्कि मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी विचारधारा मार्क्सवाद को भी लांछित करता है। वह पूंजी के शोषणकारी चरित्र को छिपाता है। वह मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन पूंजीवाद के खात्मे व समाजवाद की स्थापना करते हुए वर्ग विहीन, शोषणविहीन समाज की ओर बढ़ने को लगातार लांछित करता है। इसके लिए अतीत में कायम हुए समाजवादी समाजों को कोसने, उनके बारे में ढेरों झूठ प्रचारित करने से भी उसे कोई गुरेज नहीं है।  

    मजदूरों के वास्तविक जीवन से अपरिचित अधिकांश मध्यम वर्ग के लोग इसी सोच से ग्रसित होते हैं और यह सोच तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने लंबे समय तक मजदूर आंदोलन व मजदूर संघर्षों के बारे में नकारात्मक प्रचार के बल पर स्थापित की है। इस सोच के प्रभाव में मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी है। 

    तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का मजदूर आंदोलनों व संघर्षों के प्रति रुख शत्रुतापूर्ण दिखायी देता है। 

    इस सबके बावजूद तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया के प्रति आमतौर पर मजदूर आंदोलन में विभ्रम मौजूद रहता है। मजदूर सोचते हैं कि मुख्यधारा के मीडिया का समर्थन पाकर वे अपनी लड़ाई को मजबूत कर सकते हैं, कि मीडिया अगर उनकी लड़ाई को समर्थन न करे तो भी उनके न्यायपूर्ण संघर्ष के बारे में निष्पक्ष होकर भी कुछ छाप दे या खबर प्रकाशित कर दे तो भी उनकी लड़ाई के लिए फायदेमंद होगा। 

    दरअसल शेष समाज की तरह मजदूर भी काफी हद तक इस भ्रम के शिकार होते हैं कि मीडिया निष्पक्ष होता है। यह भ्रम मीडिया ने अपने बारे में स्वयं फैलाया है। हर प्रमुख राष्ट्रीय अखबार अपनी पहचान ‘निष्पक्ष’, ‘निर्भीक’ व ‘सच का पहरेदार’ के रूप में देता है। जाहिर है कि मजदूर भी मीडिया के खुद के बारे में गढ़े गए भ्रामक प्रचार का शिकार होते हैं। वे मीडिया के वर्ग चरित्र को भूल जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि मीडिया संस्थानों के मालिक कौन हैं, उनके अपने वर्गीय हित क्या हैं?

    मजदूर वर्ग के महान शिक्षक कार्ल मार्क्स व फ्रेडरिक एंगेल्स ने 1845 में ‘जर्मन विचारधारा’ नामक लेख में लिखा है। 

    ‘‘हर युग में शासक वर्ग के विचार ही प्रभुत्वशाली विचार (त्नसपदह प्कमें) होते हैं। यानी वह वर्ग जो भौतिक तौर पर प्रभुत्वशाली होता है वही उस समय प्रभुत्वशाली बौद्धिक साबित होता है। जिस वर्ग के नियंत्रण में भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं उसी का मानसिक उत्पादन पर भी नियंत्रण होता है।’’ (ळमतउंद प्कमवसवहल . डंतग ंदक म्दहमसे-अनुवाद हमारा)

    पूंजीवादी समाज में पूंंजीपति वर्ग का सभी उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण होता है। इसी के चलते समाज के सारे बौद्धिक उत्पादन पर भी पूंजीपति वर्ग का नियंत्रण होता है। मजदूर वर्ग अपने युग के ज्ञान से वंचित रहता है। उसके पास जो भी विचार पहुंचते हैं वह मुख्यतः पूंजीवादी प्रचार माध्यमों द्वारा पहुंचते हैं। पूंजीवादी समाज में प्रचार माध्यमों अथवा बड़े मीडिया संस्थानों पर पूंजीपति वर्ग का स्वामित्व होता है। अतः वे पूंजीपति वर्ग के दृष्टिकोण अथवा पूंजी की जरूरत व हितों के अनुरूप होते हैं। वे मजदूर वर्ग को वर्गीय समाज की क्रूर सच्चाई से दूर उसे काल्पनिक व आभासी दुनिया में फंसाये रखते हैं। वे मजदूर वर्ग को पूंजी की गुलामी के चक्र में फंसाये रखने का काम करते हैं। वे मजदूर वर्ग को उसकी वर्गीय एकता व वर्गीय पहचान से विरत कर उसे जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा-लिंग व राष्ट्रीयता के आधार पर बांटे रखकर अंधविश्वासी, भाग्यवादी, कूपमंडूक, जातिवादी, अतार्किक व जाहिल रखने का काम करते हैं। वे मजदूर वर्ग को उसके वर्ग बंधुओं द्वारा देश-दुनिया में पूंजी के शोषण व दमन के खिलाफ चलाये जा रहे बहादुराना संघर्ष से दूर रखते हैं। वे मजदूर आंदोलनों को तिरस्कार से देखते हैं और मजदूर वर्ग के संघर्षों के खिलाफ कुत्सा प्रचार में लगे रहते हैं। इस सबका मूल कारण उनका पूंजीवादी स्वामित्व व पूंजीवादी हित है। 

    पूंजीवाद के प्रारंभिक काल से ही उत्पादन के तमाम साधनों पर पूंजीपति वर्ग के मालिकाने की तरह, संचार के साधनों पर भी पूंजीपति वर्ग का मालिकाना कायम हो गया। हालांकि शुरुआत में संचार के साधनों पर उसका पूर्ण प्रभुत्व व नियंत्रण नहीं कायम हुआ था। कुछ हद तक छोटी पूंजी से चलने वाले अखबार भी होते थे जो स्ववित्त पोषित थे और अपने पाठकों व शुभचिंतकों के सहयोग से चलते थे। जिस हद तक ये स्वंवित्तपोषित थे उस हद तक ये मजदूर संघर्षों को उठाने, मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में रिपोर्टें देते भी थे। इंग्लैण्ड में 19वीं सदी के शुरुआत में कुछ ऐसे अखबार रहे थे लेकिन पूंजीवादी सरकारों द्वारा लगातार स्टांप ड्यूटी बढ़ाकर ऐसे अखबारों के अस्तित्व को खत्म कर दिया और अखबार अधिकाधिक कुछ लोगों के स्वामित्व तक सिमट गये। लेकिन इसके बावजूद डेली हेराल्ड, न्यूज क्रोनिकल, संडे सिटिजन जैसे अखबार 20 वीं सदी के मध्य तक बचे रहे जो मजदूरों से संबंधित खबरें छाप दिया करते थे। इसका कारण यह था कि इनकी एक अच्छी प्रचार संख्या मजदूर आबादी के बीच भी थी। लेकिन मीडिया में पूंजी के बढ़ते प्रभाव, तकनीक व संसाधनों के लगातार महंगे होने व विज्ञापनों की बढ़ती भूमिका और इस सबके चलते मीडिया संस्थानों पर एकाधिकारी घरानों के बढ़ते वर्चस्व के साथ यह स्थिति धीरे-धीरे खत्म हो गयी। 

    भारत में शुरूआत में ऐसे अखबार रहे हैं जो मजदूर वर्ग के संघर्षों व जीवन स्थितियों की रिपोर्टे छापते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा कानपुर से प्रकाशित ‘प्रताप’ अखबार एक ऐसा ही अखबार था। कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा ‘जनयुग व किश्ती’ अखबार मजदूर वर्ग के सच्चे अखबार थे जिनकी उस समय प्रचार संख्या अच्छी थी। लेकिन उस दौर में भी तथाकथित मुख्यधारा के अखबारों की स्थिति क्या थी इसका अंदाज हम इस बात से लगा सकते हैं कि गांधी जी ने यंग इंडिया के मार्च, 1926 के अंक में लिखा था- ‘‘आज बड़े-बड़े प्रतिष्ठित अखबार और पत्रिकायें भी अनैतिक विज्ञापनों की बुराई का शिकार हैं।’’ गांधी इसके लिए अखबार के मालिकों और संपादकों के विवेक का परिष्कार करने की जरूरत की बात सुझाते हैं।

    गांधी जी की मनोगत सदिच्छा जो भी हो इन अखबारों का चरित्र अपने पूंजीवादी मालिकाने व पूंजीवादी हितों के अनुरूप था जिसका किसी भी तरह का परिष्कार नहीं किया जा सकता था। स्वतंत्रतापूर्व के ऐसे ही अखबारों या अखबार समूहों से भारत में तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का विकास हुआ। आज अंग्रेजी का सबसे ज्यादा प्रसारित होने का दावा करने वाला दैनिक ‘टाइम्स आफ इंडिया’ पूरी तरह ब्रिटिश साम्राज्यवाद परस्त रहा है। 

    पूंजीवादी व्यवस्था में हर उद्योग या उद्यम की तरह मीडिया भी एक उद्यम है। उसके मूल्य, चरित्र और विचार, बाजार व पूंजीवादी व्यवस्था के हितों के अनुरूप होते हैं। पूंजीवादी मीडिया का चरित्र उसके स्वामित्व, वित्तपोषण, विज्ञापनदाताओं की जरूरत व हितों के अनुरूप ही होता है। 

    एकाधिकारी पूंजीवाद के दौर में मीडिया का चरित्र भी एकाधिकारी होता गया है। पूरी दुनिया के पैमाने पर सी.एन.एन. जैसी मीडिया कंपनियों का राज है तो भारत में भी कुछ मीडिया घराने ही पूरे संचार माध्यमों को संचालित करते हैं। इन मीडिया घरानों की ताकत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इनके आगे सरकारें नतमस्तक होती हैं।

    आज जितने भी मीडिया घराने हैं उनकी उद्योग, रियल स्टेट, बिजनेस में खासी पूंजी लगी है। कई तो सीधे कई उद्योगों के मालिक हैं। इसके अलावा यह भी सच है कि देश के बड़े औद्योगिक घराने व पूंजीपति, मीडिया में खासा निवेश कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े पूंजीपति रिलायंस समूह के मालिक मुकेश अंबानी आज अधिकतर मीडिया समूहों के शेयर धारक हैं। पहले उन्होंने टी.वी.-18 की बहुलांश हिस्सेदारी को खरीदा उसके बाद इनाडु टी.वी. की बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली। आज इनमें से कोई मुकेश अंबानी के खिलाफ खबर छापने या प्रसारित करने की हिम्मत नहीं करता है। 

    भारत में मीडिया में पूंजी निवेश 1980 के दशक में तेजी से बढ़ा और नई आर्थिक नीति के बाद इसमें तेजी से इजाफा हुआ। 1981 से 1989 के बीच मीडिया में पूंजी निवेश पांच गुना हो गया। इसके बाद 1990 से 1996 के दौरान फिर यह पांच गुना बढ़ गया। इसके बाद इसमें वृद्धि लगातार जारी है। 1981 में विज्ञापन पर खर्च राशि 320 करोड़ रुपये थी जबकि 1996 में यह 4200 करोड़ रुपये पहुंच गयी। अब 2017 में विज्ञापनों पर खर्च कुल राशि 61,204 करोड़ पहुंच गयी। विज्ञापन उद्योग आज भारत का सबसे तेजी से विकास करने वाले उद्यमों में शामिल है जो सालाना 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। उद्योग अपने विकास के लिए मीडिया व मनोरंजन पर निर्भर है। इसी कारण मीडिया व मनोरंजन क्षेत्र 13.9 प्रतिशत की दर से विकसित हो रहा है। 

    आज मीडिया पूरी तरह विज्ञापन पर आधारित होने के साथ विज्ञापन के लिए ही पूरी तरह समर्पित हो गया है। विज्ञापन उद्योग में तेजी दरअसल पूंजीवाद में मालों की बिक्री के लिए गलाकाटू प्रतियोगिता से जुड़ी है। 

    आज वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद के संकटग्रस्त होने के साथ बाजारों के लिए प्रतियोगिता अत्यंत ऊंचे स्तर पर पहुंच गयी है। पहले से संतृत्प हो चुके बाजारों में मांग को किसी तरह बनाये रखना टेड़ी खीर हो चुका है। पूंजीवाद के संकट के चलते तमाम पूंजीवादी सरकारों ने जहां तमाम कल्याणकारी कामों के खर्च में कटौती की है, वहीं बड़े पैमाने पर छंटनी व महंगाई बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है। इन्हीं के चलते बाजारों में मालों की मांग में बेहद गिरावट आयी है। ऐसी स्थितियों में जब पूंजीवाद में सभी क्षेत्रों में विकास में गिरावट आ रही है तो विज्ञापन उद्योग व उस पर आधारित पूंजीवादी मीडिया सबसे तेज गति से विकसित हो रहे हैं। आज जहां भारत की अर्थव्यवस्था 6 प्रतिशत की विकास दर तक पहुंचने को तरस रही है वहीं मीडिया क्षेत्र सबसे तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र बन गया है। प्रिंट मीडिया 7.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है तो टेलीविजन 14.7 व डिजिटल मीडिया 15.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 

    जाहिर है कि मीडिया संकटग्रस्त व पतनशील पूंजीवाद का एक बड़ा संबल है। ऐसे मीडिया से कुछ भी सकारात्मक की उम्मीद करना, मजदूर संघर्षों से सरोकार की उम्मीद करना, बेमानी ही नहीं बेहद हास्यास्पद हो जाता है। 

    मीडिया के पूरी तरह एक पूंजीवादी उद्योग में तब्दील होने के साथ मीडिया कर्मी अथवा पत्रकार भी वेतनभोगी मजदूरों की स्थिति में पहुंच गये हैं। कुछेक मीडियाकर्मियों अथवा पत्रकारों के ईमानदार व मजदूर वर्ग का हितैषी होना भी आज किसी तरह मजदूरों के संघर्ष के लिए मददगार नहीं हो सकता क्योंकि मीडिया में खबरों के चयन व प्रसारण में पत्रकारों की भूमिका लगभग नगण्य हो गयी है। खासकर जब मामला मजदूर संघर्षों का हो। 

    मीडिया के अधिकाधिक पूंंजीवादी अथवा एकाधिकारी होते जाने के साथ मजदूर मेहनतकश जनता उसके लिए महत्वहीन होती गयी है। उसके लिए विज्ञापनदाताओं का लक्ष्य मध्यम वर्ग की ‘जनता’ बन चुका है। ‘मजदूर वर्ग’ उसकी जनता की परिभाषा से बाहर होता चला गया है।

    संकटग्रस्त पूंजीवाद के क्रमशः प्रतिक्रियावादी व दक्षिणपंथी होते जाने के साथ मीडिया का चरित्र भी दक्षिणपंथी होता गया है। भारत में घोर मजदूर विरोधी नई आर्थिक नीतियों के पक्ष मे माहौल बनाने का सबसे बड़ा चैंपियन मीडिया बना। शासक वर्गीय हितों व जनविरोधी मजदूर विरोधी नीतियों के पक्ष में जनमत तैयार करने के काम में आज मीडिया की मुख्य भूमिका रहती है। 

    पूरे देश में अंधराष्ट्रवाद व सांप्रदायिकता के उभार के साथ आज फासीवाद का खतरा बढ़ता जा रहा है। हिन्दुत्ववादी फासीवाद के इस उभार में मीडिया की खासी भूमिका है। पूंजीवादी मीडिया के द्वारा मजदूर वर्ग को भी हिंदुत्ववादी फासीवाद की गिरफ्त में लिया जा रहा है। फासीवाद किस हद तक मजदूर वर्ग को अपनी चपेट में ले सकता है। इसका उदाहरण हम जर्मनी के उदाहरण से समझ सकते हैं जहां एक अध्ययन के मुताबिक हिटलर के सत्ताशीन होने से पहले 1930 में नाजी पार्टी के 40 प्रतिशत सदस्य मजदूर मेहनतकश थे। भारत में हाल ही में मजदूर-मेहनतकश जनता का नोटबंदी के समर्थन में आना पूंजीवादी मीडिया की जनमत को प्रभावित करने अथवा शासकवर्गीय नीतियों के लिए जनमत तैयार करने व मजदूर वर्ग को शासक वर्गों की नीति का समर्थक बना देने की क्षमता को दिखाता है। 

    आधुनिक संचार माध्यमों इंटरनेट, फेसबुक, व्हाटसएप्प आदि की भी आज के दौर में भूमिका बढ़ी है लेकिन सीमित स्तर पर मजदूर-मेहनतकश जनता तक इनकी पहुंच होने के बावजूद इस पर भी पूंजीपति वर्ग का नियंत्रण है। मौजूदा दौर में देशभर में फासीवादी विचारों व सांप्रदायिक घटनाओं की बढ़ोत्तरी में इनकी खासी भूमिका रही है। 

    कुल मिलाकर वर्तमान समय में पूंजीवादी मीडिया पूरी तरह पतित प्रतिक्रियावादी बन चुका है। पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष में मजदूर वर्ग को पूंजीवादी मीडिया के इस मकड़जाल को भी चुनौती देनी होगी, मजदूर वर्ग को इसकी गिरफ्त से निकालना होगा। इसके प्रति कोई खास मोह या भ्रम की स्थिति मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी संघर्ष के विकास के लिए बाधक होगी। मजदूर वर्ग के बीच पूंजीवादी मीडिया के वर्ग चरित्र के भंड़ाफोड़ के द्वारा ही मजदूर वर्ग को इसकी गिरफ्त से मुक्त किया जा सकता है। 

    पूंजीवाद में संचार व तकनीक के साधनों यानी मीडिया पर पूंजीपति वर्ग का नियंत्रण होने के चलते मजदूर वर्ग को अपने विचारों व संघर्षों को व्यापक जनता तक पहुंचाने के लिए और मजदूर वर्ग को पूंजीवादी मीडिया की गिरफ्त से निकालने के लिए निम्न बातों को अमल में लाना होगा।

1. सर्वप्रथम मजदूर वर्ग को इस भ्रम से मुक्त करना होगा कि मालिकों के खिलाफ उनकी लड़ाई मीडिया के समर्थन से मजबूत होगी। हमें मजूदर वर्ग को इस बात को समझाना होगा कि उनके संघर्ष को, उनकी अपनी एकता व संघर्ष की मजबूती, मजदूर वर्ग की व्यापक एकजुटता तथा अन्य मेहनतकश तबकों के समर्थन से ही जीता जा सकता है। 

2-हमें मजदूर वर्ग तथा मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच व्याप्त इस धारणा को खत्म करना होगा कि मीडिया को सुधारा जा सकता है। मीडिया रिफार्म की कोई बात मीडिया के चरित्र को न समझने के चलते ही सामने आती है। पूंजीवादी मीडिया को सुधारकर नहीं बल्कि उसको चुनौती देकर ही मजदूर वर्ग पूंजी के खिलाफ अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकता है। पूंजीवादी मीडिया के खिलाफ एक वैकल्पिक मीडिया को विकसित व मजबूत करना मजदूर वर्ग की जरूरत है। यह वैकल्पिक मीडिया निश्चित तौर पर पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध व संघर्ष का मीडिया होगा। मजदूर वर्ग का यह मीडिया मजदूर वर्ग के सहयोग व फंड से ही पोषित होगा। रूस में महान अक्टूबर क्रांति से पहले ‘प्रावदा’ जैसा अखबार जो मजदूरों के फंड पर निर्भर था व मजदूरों पर ही जिसका वितरण निर्भर था, इस मामले में एक आदर्श प्रस्तुत करता है। 

3. मजदूर वर्ग के प्रति पूंजीवादी मीडिया द्वारा व्यापक मेहनतकश जनता के बीच प्रचारित नकारात्मक पूर्वाग्रहों को खत्म करने के लिए मजदूर वर्ग को व्यापक मेहनतकश जनता के जनवाद व न्याय के लिए संघर्ष में सहयोग करना होगा, उसे हर उत्पीड़न व अन्याय का विरोध करने में सबसे अगली पंक्ति में खड़ा होना होगा तभी मजदूर वर्ग व्यापक मेहनतकश जनता के साथ एकता कायम कर सकता है तथा पूंजी के खिलाफ अपने संघर्ष में व्यापक शोषित, उत्पीड़ित जनता को अपने साथ खड़ा कर सकता है। 

4. मजदूरों को पूंजी के खिलाफ अपने हर संघर्ष को व्यापक मेहनतकश जनता के बीच ले जाना होगा। इसके लिए मजदूर वर्ग के व्यापक हिस्सों सहित समस्त मेहनतकश आबादी के बीच व्यापक प्रचार अभियान चलाने होंगे। अपने प्रचार अभियानों को पूंजीवादी व्यवस्था के समग्र भंडाफोड़ सहित मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी विचारधारा व मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी दृष्टिकोण से सुसज्जित करना होगा। यही वह हथियार है जिसके दम पर हम पूंजीवादी प्रचार व मीडिया को मात दे सकते हैं। 

5. अपने प्रचार अभियानों के दौरान हमें यह बात गहराई तक आत्मसात करनी होगी कि तकनीक कभी भी इंसान से ऊपर व बेहतर नहीं हो सकती है। हर न्यायपूर्ण युद्ध में हथियार नहीं बल्कि जनता निर्णायक होती है। 

    अंततः हमें यह याद रखना चाहिए कि सच को छिपाया जा सकता है, उसे दबाया जा सकता है पर उसे खत्म नहीं किया जा सकता। काकोरी के शहीदों को फांसी चढ़ाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद को भारत से रुखसत होना पड़ा। आज 17 दिसम्बर को उनकी शहादत को याद करते हुए पूंजीवाद साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष तेज करने का संकल्प लिया जाना चाहिए। पूंजीवाद साम्राज्यवाद पतनशील है, मरणासन्न है और मजदूर वर्ग के संघर्ष ही मानवता को उसके भविष्य की ओर ले जायेंगे। यही सच है। आइए! मजदूर वर्ग की मुक्ति के संघर्ष को आगे बढ़ायें। एक वर्ग विहीन, शोषण विहीन दुनिया बनाने के लिए, पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष तेज करें। 

Labels: सेमिनार पत्र


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