अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

प्रस्ताव-1


अल्पसंख्यकों-दलितों, धर्मनिरपेक्ष व जनपक्षधर बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों और पत्रकारों पर बढ़ते हमलों का विरोध करो !


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    केन्द्र में मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से संघी लॉबी ने अपने एजेण्डे के अनुरूप अल्पसंख्यकों-धर्मनिरपेक्ष तार्किक-चिंतकों, प्रगतिशील व जनपक्षधर बुद्धिजीवियों-पत्रकारों पर हमले तेज कर दिये हैं। सवर्ण ब्राह्मणवादी मूल्यों से लैस भाजपा-संघ की मुस्लिम समुदाय से नफरत, तार्किक वैज्ञानिक विचारों से नफरत व दलितों से नफरत जगजाहिर है। इसके हिन्दू राष्ट्र की परियोजना को परवान चढ़ाने के लिए इन तीनों का कुचला जाना जरूरी है और संघी लॉबी एक के बाद एक हमलों के जरिये यही कर रही है। 

    ‘लव-जिहाद’, ‘गौ-हत्या’ और ‘आतंकवाद’ आदि के बहाने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विषवमन लगातार बढ़ता गया है। संघी लॉबी के खुले-छिपे सहयोग से अखलाक, जुनैद के बाद अब अफराजुल की एक हिन्दू कट्टरपंथी द्वारा नृशंस हत्या कर दी गयी। अफराजुल की क्रूर-नृशंस हत्या के साथ हत्या का वीडियो बना कर उसे फैलाने की घटना संघ प्रचार से तैयार हो रहे, धर्मान्ध हत्यारों के पनपने की परिघटना को सामने लाती है। ये धर्मान्ध तत्व नृशंसता-क्रूरता में हिटलर और इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का अनुसरण कर रहे हैं। यह भारतीय समाज के बर्बरता की ओर बढ़ने का संकेत है। इन धर्मान्ध लम्पट तत्वों के दबाव में अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी को तेजी से दोयम दर्जे की स्थिति में धकेला जा रहा है। 

    दलितों के प्रति संघी लॉबी की नफरत उनके सवर्ण ब्राह्मणवादी मूल्यों के चलते पैदा होती है। संघी लॉबी एक ओर चुनावी राजनीति के मद्देनजर दलितों को अपने पीछे लामबंद करने को प्रयासरत है, वहीं वो उन्हें अपनी पांतों में बराबरी का स्थान नहीं देना चाहती। परिणामतः भाजपा के सत्तासीन होने के बाद संघी सवर्णों द्वारा दलितों के उत्पीड़न में बढो़त्तरी हो रही है। रोहित वेमुला, ऊना, सहारनपुर से लेकर एक के बाद एक उत्पीड़क कृत्य को संघी लॉबी अंजाम दे रही है। दलित आबादी भी इन फासीवादी हमलों का बहादुरी के साथ मुकाबला कर रही है। 

संघ-भाजपा की तार्किक-वैज्ञानिक विचारकों से पुरानी दुश्मनी है। अपने हिन्दुत्ववादी फासीवादी एजेण्डे को समाज में थोपे जाने की संघ की कोशिशों को समाज के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों व जनपक्षधर पत्रकारों की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

    मोदी की जनविरोधी, कारपोरेटपरस्त नीतियों के भंडाफोड़ के साथ संघी मंडली ‘घर वापसी’, ‘लव जिहाद’, ‘राम मंदिर’ व ‘गौ रक्षा’  जैसे साम्प्रदायिक फासीवादी नारों व कार्यक्रमों की प्रगतिशील व जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों ने कड़ी आलोचना की है और संघी मंडली को कटघरे में खड़ा करने का काम किया है। इन विचारकों द्वारा संघी लॉबी के कूपमंडूकतापूर्ण-अवैज्ञानिक-सामंती सोच को समाज में स्थापित होने से रोकने का प्रयास किये गये हैं।

    तर्क व विरोध की हर अभिव्यक्ति अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना संघी मण्डली के एजेण्डे पर है इसलिए वह अपने कुछ चाटुकार मीडिया चैनलों व जरखरीद बुद्धिजीवियों द्वारा प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के खिलाफ कुत्सा प्रचार कर रही है। उन्हें ‘अवार्ड वापसी गैंग’, ‘अफजल प्रेमी गैंग’ व ‘देशद्रोही’ आदि संज्ञाओं से नवाज कर उनके खिलाफ नफरत व हिंसा का माहौल बना रही ही है। संघी फासीवादियों अथवा उनसे प्रभावित हिन्दू धर्मान्धों द्वारा ऐसे प्रगतिशील-जनपक्षधर बुद्धिजीवियों की हत्यायें तक की जा रही हैं। गोविंद पानसरे, दाभोलकर, प्रोफेसर कलबुर्गी और हाल ही में गौरी लंकेश की हत्या इसी श्रृंखला की कड़ियां हैं। संघी फासीवादियों के इन सभी हमलों के वक्त अधिकांश पूंजीवादी मीडिया निर्लज्जता के साथ मोदी भक्ति में जुटा रहा। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद संघी फासीवादियों ने जिस तरह सोशल मीडिया पर जश्न मनाया व इस घृणित कायरतापूर्ण कार्यवाही का महिमा मंडन किया वह इनके मानवद्रोही व बर्बर चरित्र को प्रदर्शित करता है। 

    यह सेमिनार धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, वैज्ञानिक-तार्किक चिंतकों व जनपक्षधर पत्रकारों पर बढ़ रहे हमलों की भर्त्सना करता है। साथ ही यह इन हमलों के वक्त संघ के सुर में सुर मिलाने वाले पूंजीवादी मीडिया चैनलों-अखबारों के रुख की भी भर्त्सना करता है। यह सेमिनार इन हमलों के खिलाफ मजदूर-मेहनतकश जनता के प्रतिरोध संघर्ष को तेज करने व इन संघर्षों को स्वर देने वाले प्रतिरोधी मीडिया को आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है।

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