अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

देश में चिकित्सा व्यवस्था की बदतर होती हालत


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    नवंबर के महीने में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के दो नामी अस्पतालों की घटनाओं ने सभी लोगों का ध्यान देश की चिकित्सा व्यवस्था की वर्तमान हालत की ओर खींचा। मैक्स और फोर्टिस की घटनाएं कोई अपवाद नहीं थीं पर वे इतनी ज्यादा भयानक थीं कि उन्हें किसी तरह नजरंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि मामले को ठंडा करने के लिए सरकारों ने अस्पतालों के लाइसेंस निलंबित या रद्द किये तथा अस्पतालों ने डाक्टरों के खिलाफ कार्यवाही की पर सभी के लिए यह स्पष्ट था कि यह बस लीपापोती थी। सभी के लिए यह भी स्पष्ट था कि यह देश की चिकित्सा व्यवस्था की वीभत्स हालत का बस एक नमूना मात्र था। 

    आज चौपट चिकित्सा व्यवस्था के कई आयाम हैं। प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय सभी स्तरों पर सरकारी चिकित्सालयों की एकदम खस्ता हालत जिसमें उनमें जांच के साधनों और दवाओं के पूर्ण अभाव भी शामिल हैं, निजी डाक्टरों और अस्पतालों की बेलगाम लूट और लापरवाही, दवाओं के लगातार बढ़ते दाम और उनकी गुणवत्ता का रसातल में जाना, जांच केन्द्रों की लूट, लापरवाही और डाक्टरों-अस्पतालों से उनकी सांठ-गांठ, चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा बीमा का फलता-फूलता कारोबार और उसके द्वारा बेलगाम लूट, चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की पैठ और उसकी गुणवत्ता का नीचे जाना, नई दवाओं के परीक्षण का अवैध धंधा इत्यादि, इसके अलग-अलग आयाम हैं हालांकि इन सबका स्रोत एक ही है। वह स्रोत है चिकित्सा को बेहिसाब मुनाफा कमाने के लिए निजी क्षेत्र के हवाले कर देना। 

    हमारे देश में सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की हालत पहले भी कोई अच्छी नहीं थी पर निजीकरण के दौर में इसे मानो एक योजना के तहत सरकार द्वारा खस्ताहाल किया जा रहा है। डाक्टरों से लेकर बिलकुल नीचे के स्तर पर कर्मचारियों की संख्या जरूरत या मापदंडों के मुकाबले बहुत कम है। यही नहीं पिछले समयों में संविदाकरण और बेगारी कराने की नीति ने इसे और खराब कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक जैसी साम्राज्यवादी संस्थाओं द्वारा प्रोत्साहित आंगनबाड़ी और भांति-भांति के टीकाकरण तो बेगारी 

पर ही आधारित हैं जिसमें छः घंटे से ज्यादा के रोजाना काम के पांच हजार रूपये भी नहीं मिलते। जहां तक चिकित्सालयों में सुविधाओं का सवाल है जिला अस्पतालों तक में जांच लगभग नहीं के बराबर है। सरकारी मेडिकल कालेजों में भी हालात लगभग यही हैं। अन्य तरह की सुविधाएं मसलन बेड की भी मापदंड के हिसाब से भारी कमी है। जहां तक दवाओं की बात है तो वे प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सालयों पर लगभग नदारद हैं। जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कालेज से सम्बद्ध अस्पतालों में भी ज्यादातर दवाएं नहीं मिलतीं। इनके इर्द गिर्द मौजूद दवा की दुकानों से ही कई बार पहचान होती है कि आस-पास कोई सरकारी अस्पताल है। 

    सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति के कारण ही आज अधिकाधिक लोग निजी डाक्टरों या अस्पतालों की शरण लेने को मजबूर हो रहे हैं। और नतीजा क्या निकल रहा है? भारी लूट और हद दर्जे की लापरवाही। मजदूर-मेहनतकश आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी प्राथमिक और द्वितीय स्तर की चिकित्सा के लिए अपने आस-पास मौजूद अप्रशिक्षित चिकित्सकों के पास जाता है। यहां से निराश होने पर ही वह सरकारी या निजी अस्पतालों में जाता है लेकिन तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है। आज इन अप्रशिक्षित चिकित्सकों पर लगाम कसने की काफी बातें हो रही हैं पर इसका बस इतना ही मतलब है कि इन पर निर्भर गरीब आबादी को निजी क्षेत्र के चिकित्सकों या अस्पतालों की ओर ढकेला जाये। निजी क्षेत्र के अस्पतालों या प्रशिक्षित डाक्टरों पर नियंत्रण की सारी बातें अभी तक सिर्फ बातें ही रही हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ही इलाज के खर्च का करीब तीन-चौथाई हिस्सा लोगों की जेब से जा रहा है और इस कारण हर साल करीब 6 करोड़ आबादी भूखमरी में चली जाती है। 

    जैसा कि छुट्टे पूंजीवाद में होता है निजी क्षेत्र में चिकित्सा के नाम पर लूट पूर्णतया बाजार पर और मांग व पूर्ति पर निर्भर है। इसमें ‘रेफरल’, ‘कट’ इत्यादि का पूरा जाल कायम हो गया है। अप्रशिक्षित चिकित्सकों की आय का एक बड़ा हिस्सा उनका निजी अस्पतालों के एजेंट के तौर पर काम करने से आता है। डाक्टरों व अस्पतालों की आय का एक बड़ा हिस्सा जांच केंद्रों से ‘कट’ के तौर पर आता है। और फिर सरकारी या निजी बीमा योजनाएं हैं ही। खासकर सरकारी चिकित्सा बीमा योजनाएं तो लूट का एक बड़ा मंजर साबित हुई हैं। बहुत सारे निजी अस्पताल तो लूट का एक बड़ा भंडार साबित हुये हैं। बहुत सारे निजी अस्पताल इसी के बल पर फल-फूल रहे हैं। पांच का इलाज करके बहुत आसानी से पचीस-पचास का भुगतान करा लिया जाता है। 

    और दवाएं! उनका तो कहना ही क्या? पूंजीवादी बाजार में बहुत थोड़े से माल होंगे जिनकी लागत और जिनके खुदरा व बाजार मूल्य में इतने ज्यादा का फर्क होता है। आज निजी चिकित्सकों और अस्पतालों की लूट का ये बहुत बड़ा स्रोत हैं जिनके मेडिकल स्टोर पर दवाएं थोक दर के मुकाबले दो गुने से लेकर पांच गुना यहां तक कि दस गुने तक पर भी बेची जाती हैं। यह एक ऐसा माल है जिस पर पूंजीवादी बाजार का मांग-पूर्ति का नियम काम करना बंद कर देता है। मरीज केवल जान की कीमत पर ही दवा खरीदने से इंकार कर सकता है। 

    बहुत सारे लोग इसका समाधान जेनेरिक दवाएं बताते हैं। पर एक तो बहुत सारी जरूरी दवाओं के मामले में केवल पेटेंट दवाएं ही उपलब्ध हैं। दूसरे यह कि आज नान बै्रंडेड जेनेरिक दवाओं की कोई भी गुणवत्ता नहीं है। उन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। मजबूरन मरीज को जेनेरिक दवाओं के भी बैं्रडेड संस्करण या नामी कंपनियों की दवाएं ही खरीदनी पड़ती हैं जो पांच-दस गुनी महंगी हो सकती हैं। 

    ऊपर से तुर्रा यह है कि पिछले दो दशकों में भारत सरकार ने विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के तहत बहुत सारी जरूरी दवाओं के मामले में प्रोसेस पेटेंट के मुकाबले प्रोडक्ट पेटेंट को स्वीकार कर लिया और इसने इन दवाओं के दाम बहुत बढ़ा दिये। अब कोई देशी कंपनी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा आविष्कृत किसी दवा की निर्माण प्रक्रिया में थोड़ा सा परिवर्तन कर वह दवा नहीं बना सकती। मरीज को विदेशी कंपनी की महंगी दवा खरीदनी ही होगी। हालांकि पिछड़े देशों को जन स्वास्थ्य के नाम पर जीवनरक्षक दवाओं के मामले में पेटेंट से कुछ छूट लेने का अधिकार है पर पिछड़े देशों की सरकारें इसका इस्तेमाल करने के बदले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा कर रही हैं। 

    निजी अस्पतालों, डाक्टरों और जांच केंद्रों की बेलगाम लूट की ही अगली कड़ी है मेडिकल शिक्षा का अधिकाधिक निजी क्षेत्रों में जाना। इन निजी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए मनमाने पैसे वसूले जाते हैं जिस पर सरकार ही नहीं न्यायालय भी रोक लगाने का प्रयास कर रहे हैं पर असफल साबित हो रहे हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों स्तरों पर प्रवेश की जो देशव्यापी व्यवस्था लागू करने की कोशिश हो रही है वह निजी क्षेत्र पर नियंत्रण कायम करने के बदले अन्य तरह की समस्याएं पैदा कर रही हैं। निजी क्षेत्र की आपाधापी का एक परिणाम यह भी हुआ है कि शिक्षण-प्रशिक्षण का स्तर बहुत गिर गया है और अब एक्जिट इक्जाम की बात होने लगी है यानी चिकित्सा का प्रमाणपत्र तभी मिलेगा जब अपने संस्थान से पास होने के बाद छात्र एक परीक्षा और दे। 

    यहीं यह भी रेखांकित करना होगा कि निजी क्षेत्र में जाकर लूटने की आम आकांक्षा ने स्नातक स्तर की डाक्टरी के शिक्षण-प्रशिक्षण को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। स्नातक स्तर पर एक अच्छा डाक्टर बनने के बदले अब छात्रों का सारा ध्यान इस पर केंद्रित रहता है कि कैसे वे स्नातकोत्तर डिग्री के लिए प्रवेश परीक्षा पास करें। इसके लिए कोचिंग सेंटरों की भरमार हो गयी है और अपने संस्थान में कुछ सीखने के बदले छात्र इनके चक्कर लगा रहे हैं। स्नातक शिक्षा के अंत में एक साल की इंटर्नशिप तो एकदम मजाक बनकर रह गयी है। 

    और अंत में चिकित्सा व्यवस्था का एक पहलू जो लगभग अदृश्य है। वह है नई दवाओं के परीक्षण का गोरखधंधा। नई दवाओं के आविष्कार की एक लम्बी प्रक्रिया होती है। जानवरों पर दवा की सफलता के बाद अंत में इसका इंसानों पर परीक्षण किया जाता है और यहां सफलता के बाद ही दवा बाजार में आती हैं। आज ज्यादातर नई दवाओं का आविष्कार साम्राज्यवादी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। उन देशों में नई दवा के परीक्षण के नियम बहुत सख्त हैं। ऐसे में ये कंपनियां पिछड़े पूंजीवादी देशों के गरीब लोगों को अपना निशाना बनाती हैं। अक्सर ही बिना मरीज को बताये हुए उस पर दवा का परीक्षण किया जाता है। दवा के कुप्रभावों से ग्रस्त होने वाले मरीज को पता नहीं चलता कि वह परीक्षण का शिकार हुआ था। इस तरह से होने वाली अपंगता और मौतों का देश में कोई हिसाब नहीं है। 

    विदेशों से ही जुड़ा मसला मेडिकल टूरिज्म और आरगन ट्रेड का है। आज ये दोनों बड़े व्यवसाय बन चुके हैं। अंग प्रत्यारोपण से लेकर किराये की कोख के लिए विदेशों से एक बड़ी संख्या भारत आ रही है। इस मामले में क्या कानूनी हो रहा है और क्या गैर कानूनी यह नहीं कहा जा सकता। किडनी निकालने के कई मामले सामने आ चुके हैं और कई लोगों को यह आशंका है कि नोएडा का प्रसिद्ध निठारी कांड दरअसल मानव अंगों के व्यापार से जुड़ा हुआ था, जिस पहलू को पूरी साजिश के साथ दबा दिया गया।

    बहुत संक्षेप में यह है वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति। यह इसकी एक बहुत बदसूरत तस्वीर पेश करती है।

    पर यह बदसूरत तस्वीर अपने आप अस्तित्व में नहीं आ गयी है। कहा जा सकता है कि इसे बाकायदा लाया गया है। पिछले तीन दशकों के निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर के छुट्टे पूंजीवाद का यह एक अविभाज्य हिस्सा है। 

    जैसा कि पहले कहा गया है कि देश की चिकित्सा व्यवस्था की हालत 1990 से पहले भी कोई अच्छी नहीं थी। लेकिन तब से तो एक नीति के तहत सरकारी चिकित्सा व्यवस्था को चौपट किया गया है। और उसे बेहिसाब मुनाफा कमाने के लिए निजी क्षेत्र के हवाले किया गया है। इसी का परिणाम है कि सरकारी चिकित्सा संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों का भी उद्देश्य निजी क्षेत्र में जाकर मरीजों को लूटना होता है, सरकारी चिकित्सा व्यवस्था का अंग बनना नहीं। 

    आज व्यवहारतः सरकारी चिकित्सा व्यवस्था को कुछ टीकाकरण कार्यक्रमों तथा कुछ महामारियों की रोकथाम के उपायों तक सीमित कर दिया गया है। द्वितीय व तृतीय स्तर की चिकित्सा को निजी क्षेत्र को मुनाफा कमाने के लिए दे दिया गया है।

    प्राथमिक स्तर पर सरकार का यह उद्देश्य नहीं है कि लोगों का आम स्वास्थ्य बेहतर बनाया जाये जिससे द्वितीय व तृतीय स्तर की चिकित्सा की जरूरत कम से कम पड़े। इस स्तर पर अगर कुछ किया जा रहा है तो वह विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी साम्राज्यवादी संस्थाओं के तहत कुछ नाम मात्र के कार्यक्रम हैं। ये कितने गंभीर हैं उसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये कार्यक्रम पूरी तरह से बेगारों की फौज के तहत- आंगनबाड़ी और आशा -के तहत चलाये जा रहे हैं। क्या बेरोजगारों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे बेगार कराने के जरिये किसी समाज का आम बुनियादी स्वास्थ्य ठीक किया जा सकता है? जहां तक बुनियादी स्वास्थ्य के लिये जरूरी स्वच्छ वातावरण और स्वच्छ पीने के पानी का सवाल है, उस पर कुछ न कहना ही बेहतर है।

    यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत में मौतों का एक बड़ा हिस्सा उन बीमारियों की वजह से है जो या तो होनी ही नहीं चाहिये या फिर जिनका आसानी से इलाज हो जाना चाहिये। इस दिशा में बेहतरी न के बराबर है और ऐसा लगता है कि यदि शासक वर्ग को स्वयं इससे महामारी का शिकार हो जाने का खतरा ना हो तो वह इधर ध्यान भी न दे।

    जहां तक द्वितीय व तृतीय स्तर की चिकित्सा सेवा की बात है वह अधिकाधिक निजी क्षेत्र को समर्पित की जा रही है -मुनाफे के लिये। 2002 और 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति इस बात की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती कि इसे सरकार की सोची-समझी नीति न माना जाये। पिछले सालों में कारपोरेट क्षेत्र की ओर से चिकित्सा व्यवस्था के लिये जो सुझाव दिये गये हैं उन्होंने ही इन नीतियों की दिशा तय की है।

    सरकार की इस समय पूरी चिकित्सा नीति हर तरह से कारपोरेट सेक्टर को बढ़ावा देने की है। उन्हें जमीन व अन्य छूटें प्रदान करने के साथ-साथ चिकित्सा बीमा को आधार बनाते हुये सरकारी अस्पतालों को कारपोटेट सेक्टर के हवाले कर देना इस नीति का सार है। क्लिनिकिल स्टेबिलिशमेन्ट एक्ट से लेकर एम.सी.आई. को पुनर्गठित करने तक सारे कदम इसी ओर हैं।

    भारत का कारपोटेट सेक्टर अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा क्षेत्र में भी कोई लिहाज नहीं करता। फोर्टिस का उदाहरण इसका प्रतिनिधिक नमूना है। यदि उसके अस्पताल चमकदार हैं तो वहां लूट और भी ज्यादा चमकदार है। जिस देश की ज्यादातर आबादी बहुत कम पढ़ी-लिखी और नियमों-कानूनों से अपरिचित हो वहां इस लूट की कोई सीमा नहीं हो सकती। यदि मध्यम वर्गीय लोगों से फोर्टिस दस गुणा वसूल सकता है बाकी के साथ उसके व्यवहार की केवल कल्पना की जा सकती है।

    पूंजीवाद के भीतर भी सरकारी खर्चे पर सभी लोगों को निःशुल्क चिकित्सा कोई असंभव चीज नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद का पांच-छः प्रतिशत खर्च ही इसके लिये पर्याप्त है। पर इसके लिये जरूरी होगा कि इस क्षेत्र को मुनाफे के दायरे से बाहर लाया जाये। और आज के लुटेरे पूंजीवाद में यह कठिन संघर्ष बन जाता है जब पश्चिमी देशों की मुफ्त चिकित्सा सेवा को भी मुनाफे के हवाले करने की मुहिम चल रही हो।

    पर स्वास्थ्य जीवन के लिये इतनी जरूरी चीज है कि इसके लिये संघर्ष को टाला नहीं जा सकता। खासकर मजदूर-मेहनतकश जनता के लिये तो यह और भी अहम बन जाता है क्योंकि ऊपर के अन्य वर्गों की तरह वह निजी चिकित्सा व्यवस्था के साथ कोई तालमेल नहीं बैठा सकती।

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