अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

आटोलाईन यूनियन का धरना जारी


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    सिडकुल पंतनगर स्थित ऑटोलाईन कम्पनी के मजदूरों का धरना जारी है। विदित हो कि यूनियन पंजीकरण बहाली, मशीनों व मुख्य उत्पादक गतिविधियों में शामिल ठेका मजदूरों को स्थाई करने, यूनियन महामंत्री की कार्यबहाली, विकलांग हुए ठेका मजदूरों को 10 लाख का मुआवजा, स्थाई नौकरी व प्रबंधकों, ठेकेदारों को दण्डित करने, वेतन समझौता करने समेत अन्य मांगों को लेकर ऑटोलाइन इम्पाईज यूनियन द्वारा 6 दिसम्बर 2017 से कलेक्ट्रेट, रुद्रपुर में अनिश्चितकालीन धरना दिया जा रहा था। 

    यूनियन द्वारा कम्पनी में आये दिन अंग भंग का शिकार होकर मजदूरों के विकलांग होने के मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाने पर एक अच्छा खासा माहौल मजदूरों के पक्ष में बनने लगा था। ठेका मजदूर भी धरने पर आने लगे। कलेक्ट्रेट में अंग भंग हुए मजदूरों की फ्लेक्सी का जिला प्रशासन सामना नहीं कर पा रहा था। इसी माहौल की आंच में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने को कांग्रेसी व भाजपायी भी मजदूरों के समर्थन के नाम पर प्रपंच रचने लगे। कांग्रेस पार्टी के इलाकाई नेताओं ने 15 दिसम्बर को कम्पनी गेट पर कूच का प्रोग्राम रखा। 15 दिसम्बर के कार्यक्रम में आटोलाईन मजदूर व उनके परिजन सिडकुल की कई यूनियनों के कार्यकर्ता, श्रमिक संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों समेत अन्य संगठनों के सैकड़ों लोग प्रदर्शन में शामिल रहे। पुलिस द्वारा स्टे आर्डर का बहाना बनाकर जुलूस को ऑटोलाईन कम्पनी से लगभग आधा किमी. दूरी पर ही रोक दिया गया। कांग्रेसी नेताओं ने वहीं पर धरना व सभा चालू करवा दिया। सिडकुल की तमाम यूनियनों के पदाधिकारी व इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ताओं ने कम्पनी गेट पहुंचने का माहौल बनाने का प्रयास किया। परन्तु कांग्रेसी नेताओं द्वारा भाषणबाजी कर गर्मागर्म बातें की गयीं और कहा गया कि थोड़ी देर में पूर्व कैबिनेट मंत्री आने वाले हैं, उनके आने के बाद कम्पनी गेट को कूच किया जायेगा। काफी विलम्ब के पश्चात पूर्व के कैबिनेट मंत्री प्रकट हुए। उनके आने के कुछ ही समय पश्चात कम्पनी के एच.आर. हेड भी धरना स्थल पर पहुंच गये। वहां पर इंटक के लेटर हेड पर एक ज्ञापन कैबिनेट मंत्री द्वारा इंटक नेताओं के साथ में मिलकर कम्पनी के एच.आर. हेड को दिया गया और तुरन्त धरना समाप्त करने की घोषणा कर दी गयी। कम्पनी कूच करने का नारा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। कांग्रेसी व इंटक नेता इतने सजग थे कि उन्होंने स्थिति की नजाकत को समझते हुए श्रमिक संयुक्त मोर्चा महासचिव, मुखर यूनियन नेताओं व इंकलाबी मजदूर केन्द्र के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर भी नहीं दिया। कांग्रेसी डरते थे कि ये सभी लोग उनकी पोल पट्टी खोल देंगे और कांग्रेसियों को कम्पनी गेट जाने को मजबूर कर देंगे। कुछ मुखर लोगों द्वारा उपहास उड़ाया जा रहा था कि स्टे आर्डर तो ऑटोलाइन यूनियन के लिए है परन्तु वर्तमान में उसका पंजीकरण निरस्त हो चुका है। कानूनी रूप से स्टे वहां पर उपस्थित लोगों पर लागू ही नहीं होता है। 

    19 दिसम्बर 17 को भाजपाई भी ऑटोलाइन यूनियन के समर्थन में कलेक्ट्रेट पहुंचे और ए.डी.एम. की मध्यस्थता में कम्पनी प्रबंधन और यूनियन के मध्य वार्ता कराने का प्रयास किया जिसे यूनियन कार्यकारिणी ने ठुकरा दिया और भाजपाई बड़बड़ाते हुए सहमत हो गये। 

    इस बीच मजदूरों द्वारा उत्पादन को लगभग 20 प्रतिशत तक गिरा दिया गया जबकि वर्तमान में उत्पादन चरम पर है और भारी मांग है। अंततः दबाव में आकर कम्पनी प्रबंधन ने प्रस्ताव रखा कि यूनियन महामंत्री की कार्यबहाली के एवज में धरना समाप्त कर दिया जाये और मांग पत्र पर सुनवाई जारी रहेगी जिसे यूनियन ने ठुकरा दिया। 20 दिसम्बर 17 से यूनियन महामंत्री की कार्यबहाली कर दी गयी है। जिला प्रशासन के दबाव में आकर यूनियन द्वारा 25 दिसम्बर 17 से धरने को कलेक्ट्रेट रुद्रपुर से ए.एल.सी. रुद्रपुर में स्थानान्तरित कर दिया गया है जो कि वर्तमान में भी जारी है। इसी बीच कम्पनी ने अपने प्लाण्ट हेड को बदल दिया। नये प्लाण्ट हेड द्वारा 19 दिसम्बर को कम्पनी परिसर के हॉल में मजदूरों की सामूहिक बैठक बुलाकर उपदेश देने का प्रयास किया गया। प्लाण्ट हेड के भाषण के बीच में ही मजदूरों ने कुर्सियों को हटवा दिया और स्वयं जमीन पर बैठकर आक्रोश दिखाया। कहा कि हमारा सम्मानजनक वेतन समझौता करो, ठेका मजदूरों को स्थाई करो, तब हमारी समस्या हल होगी। कुर्सी पर बैठने से समस्या हल न होगी। 

    आज भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन की जो आम समस्या व बीमारी है वो ऑटोलाइन यूनियन में भी मौजूद है। कांग्रेस, भाजपा व अन्य पार्टियों के नेताओं को अपना मित्र समझने व इनके बल पर संघर्ष जीतने का भ्रम पालने की बीमारी इस यूनियन में भी गहरे पैठ बनाये हुयी है। ऑटोलाइन यूनियन नेतृत्व कांग्रेसी नेताओं को अपना तारणहार आज भी समझता है। वह इस तथ्य से आंखें मूंदे हुए हैं कि पिछले लगभग ढाई साल से इंटक के लैटर हेड पर यूनियन का मांगपत्र लगा हुआ था जिस पर आज तक भी सुनवाई नहीं हो पाई जबकि इस दौरान लगभग 2 साल तक कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी। बी.सी.एच., पारले, एरा, एस्कोर्ट, मिण्डा, डेल्फी टी.वी.एस. ढेरों ऐसे उदाहरण हैं कि ये यूनियनें बी.एम.एस., इंटक से संघबद्ध हैं। इनके नेतागण कांग्रेसी व भाजपाइयों के समक्ष नतमस्तक रहे हैं परन्तु सालों से इनके प्रमुख नेतागण कम्पनी से बाहर हैं उनकी कार्यबहाली तक नहीं हो पा रही है। सम्मानजनक वेतन समझौता तो दूर की बात है। 

    जब तक ऑटोलाइन यूनियन नेतृत्व का उपरोक्त पूंजीवादी पार्टियों के नेतृत्व के प्रति भ्रम बना रहेगा तब तक किसी सम्मानजनक समझौते की उम्मीद पालना व्यर्थ है।                                                                                               -रुद्रपुर संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


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