अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

वाम-उदारवादी और माकपा


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    कुछ साल पहले इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने यह सुझाव दिया था कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों यानी भाकपा और माकपा को अपना नाम बदलकर सामाजिक जनवादी पार्टियां रख लेना चाहिए और उसी रूप में भारत की राजनीति में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। ये वही गुहा हैं जो नितीश कुमार के पलटी मारकर मोदी-शाह की गोदी में बैठने से पहले सुझाव दे रहे थे कि नीतिश को कांग्रेस पार्टी का मुखिया बना देना चाहिए क्योंकि कांग्रेस के पास नेता नहीं हैं और नितीश के पास पार्टी नहीं है। 

    अब रामचन्द्र गुहा जैसे उदारवादियों या वाम-उदारवादियों (लेफ्ट-लिबरल) के कष्ट का एक और कारण पैदा हो गया है। 21 जनवरी को माकपा की केन्द्रीय समिति ने 55-31 के बहुमत से अपने महासचिव सीताराम येचुरी का यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि आने वाले समय में भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी के साथ कोई घोषित या अघोषित चुनावी गठबंधन किया जाये। पार्टी में यह बहस पिछले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले से ही चल रही थी। और उस चुनाव में यह गठबंधन हुआ भी था। यह अलग बात है कि इस गठबंधन का फायदा केवल कांग्रेस को हुआ था। वाम-मोर्चे और माकपा की तो और दुर्गति हुई थी। बाद में केन्द्रीय समिति ने इस गठबंधन को गलत घोषित किया था और पार्टी लाइन के खिलाफ भी। अब अप्रैल में होने वाली आगामी पार्टी कांग्रेस के तहत यह बहस जोर पकड़ गयी है। पहले पोलित ब्यूरो में यह बहस हुई और कोई एकमत न होने के कारण यह केन्द्रीय समिति तक गई। अंततः केन्द्रीय समिति ने 55-31 के बहुमत से पूर्व महासचिव प्रकाश करात के दस्तावेज को पास कर दिया जबकि वर्तमान महासचिव सीताराम येचुरी के दस्तावेज को अस्वीकार कर दिया। अब अंतिम फैसला कांग्रेस में होगा। 

    माकपा की इस अंदरूनी बहस पर वाम-उदारवादी दायरे की प्रतिक्रिया मजेदार रही। इस खेमे की, खासकर इसके बुद्धिजीवियों की इस बात की लगाताार शिकायत रहती है कि भारत की पार्टियों में कोई आंतरिक जनतंत्र नहीं है। वहां नीतियों को लेकर कोई बहस नहीं होती। उनके एक नेता की ही चलती है। वे वंशवाद की शिकार हैं इत्यादि। अब इस सबको देखते हुए यह स्वभावतः ही उम्मीद की जाती है कि वाम-उदारवादी दायरा माकपा द्वारा इतने प्रत्यक्ष तौर पर अंदरूनी जनतंत्र का प्रदर्शन किये जाने पर प्रसन्न हो। वह इसके लिए माकपा की प्रशंसा करे और बाकी पार्टियों के लिए उसे उदाहरण की तरह पेश करे। 

    पर ऐसा नहीं हुआ। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अखबार ने अपने सम्पादकीय में पोलित-ब्यूरो में बहस के समय ही इसे बाल की खाल वाली बहस कहकर इसका मजाक उड़ाया था और कहा था कि कामरेड जमीनी हकीकत का मुकाबला करने के बदलेे इस तरह उधेड़बुन में उलझे हुए हैं। अब केन्द्रीय समिति की इस बहस के समय तो इस तरह की टिप्पणियों की भरमार हो गयी। बिना किसी मकसद के ये टिप्पणियां येचुरी के समर्थन वाले दृष्टिकोण से लिखी गयी थीं। कहा गया कि प्रकाश करात ने बहुमत हासिल करने के लिए हर जोड़ तोड़ का काम किया। एक सदस्य को मतदान के समय आईसीयू से निकालकर लाया गया। प्रकाश गुट ने पहले मतदान करवाने का आभास नहीं दिया था इसलिए येचुरी गुट के कई सदस्य मतदान से पहले ही चले गये थे। येचुरी को महासचिव पद से हटाने के लिए पूरा षड्यंत्र रचा गया और उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी इत्यादि-इत्यादि। 

    ये सारी बातें सच भी हो सकती हैं और झूठ भी। पर यहां यह महत्वपूर्ण है कि ये सारी बातें इस मकसद से की गयीं जिससे केन्द्रीय समिति के वर्तमान फैसले को खराब रोशनी मेें पेश किया जा सके। वाम-उदारवादियों की दिलचस्पी केवल इसी में है।

    वाम-उदारवादी इस समय संघी फासीवादियों से खौफ खाये हुए हैं। वे उन्हें रोकना चाहते हैं। और चुनावी जोड़-तोड़ के सिवा उन्हें कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। वे सोचते हैं कि यदि भाजपा के खिलाफ सारे धर्मनिरपेक्ष विपक्षी एक हो जायेें तो चुनावों में संघी फासीवादियों को हराया जा सकता है। और चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है इसलिए उसके साथ गठबंधन जरूरी है। भाकपा-माकपा को भी उसके साथ गठबंधन करना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो संघी फासीवादियों की मदद की जा रही है। कुछ ने तो यह कह भी दिया कि प्रकाश करात इस समय मोदी-शाह के सबसे बड़े मित्र हैं।

    और वाम-उदारवादी यह राग तब अलाप रहे हैं जब कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के अपने नये नेतृत्व में पूरी तरह से ‘नरम हिन्दुत्व’ को अपनी विचारधारा बना चुकी है। ए के एंटोनी के सुझाव पर वह अब हिन्दुत्व की जमीन पर ही भाजपा का मुकाबला कर रही है। अभी गुजरात में यह स्पष्ट तौर पर दिखा था और अब कर्नाटक में यह दिख रहा है। कांग्रेस अब भूले से भी संघी फासीवादियों द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीड़न का मुद्दा नहीं उठा रही है। उल्टे वह स्वयं को हिन्दुओं की पार्टी घोषित करने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है। ब्राह्मण दादी, पारसी दादा और ईसाई मां वाले राहुल गांघी खुद को जनेऊधारी हिन्दू व शिवभक्त घोषित कर रहे हैं। 

    सामान्य तर्कबुद्धि से यही निष्कर्ष निकलेगा कि संघी फासीवादियों की हिन्दुत्व की जमीन पर उनसे संघर्ष हिन्दू फासीवादियों की सबसे बड़ी जीत है। यह धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी हार है। इस दृष्टि से कहा जाये तो भारत की पूंजीवादी राजनीति में संघी फासीवादी युद्ध जीत चुके हैं। अब उन्हें बस कुछ लड़ाईयां ही जीतना बाकी है। भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष संविधान को व्यवहार में किनारे लगाया जा चुका है। अब बस उसे औपचारिक तौर पर किनारे लगाना बाकी है। जब पूरे देश में भाजपा के चौदह सौ से ज्यादा विधायकों में महज चार मुसलमान हों और सांसदों में एक भी न हो तो यह देश की राजनीति से मुसलमानों का निष्कासन ही है। उनकी अर्थव्यवस्था व समाज में पहले की शोचनीय स्थिति से मिलाकर देखें तो तस्वीर मुकम्मल हो जाती है। मुसलमान इस देश में दोयम दर्जे क नागरिक की स्थिति में लगभग डाले जा चुके हैं। अब गुरू गोलवलकर का सपना साकार होने को है। 

    ऐसे में कांग्रेस पार्टी और उसके गठबंधन पर सारी उम्मीदें टिकाये रखना वाम-उदारवादियों के दिवालियेपन को दिखाता है। पर ये करें भी क्या? एक ओर नेहरू और दूसरी ओर राहुल गांधी इनकी सीमा बनते हैं। कांग्रेस पार्टी जो व्यवहार में करती गयी है उसे वे सिद्धान्त में जायज ठहराते गये हैं। यही उन्हें अब उस जगह ले आया है जहां राहुल गांधी के नरम हिन्दुत्व को स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं दीखता। और प्रकाश करात और उनके सहयोगी इसमें बाधा बनते प्रतीत होते हैं इसलिए वे इनकी लानत-मलामत करने में अपनी सारी वाम-उदारवादी मर्यादा को ताक पर रख देते हैं। 

    आज यदि वाम-उदारवादी स्वयं को माकपा की केन्द्रीय समिति अथवा प्रकाश करात एवं सहयोगियों द्वारा ठगा महसूस किये जा रहे हंै तो यह स्वाभाविक ही है। उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी। अपने जन्म के समय से ही माकपा भांति-भांति के सैद्धान्तिक नुस्खे के द्वारा चुनावी जोड़-तोड़ ही तो करती रही है। एक समय जब जोड़-तोड़ अपनी सीमाएं तोड़ता हुआ जनसंघ से गठजोड़ तक जा पहुंचा तब तत्कालीन महासचिव पी सुन्दरैया ने इसका विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया था। तब से कोई सीमा बची ही नहीं। इसके बाद तो कांग्रेस हटाने के नाम पर भाजपा से गठजोड़ और अब भाजपा को रोकने के नाम पर कांग्रेस से गठजोड़ उसकी आम कार्यनीति बन गयी है। बस अब बदली हुयी परिस्थितियां यह मांग कर रही हैं कि यह गठजोड़ लुका-छिपा न हो बल्कि प्रत्यक्ष हो। यही वह चीज है जिससे प्रकाश करात एण्ड कम्पनी चिहुंक कर पीछे हट जाते हैं। अन्यथा  तो इन्हीं प्रकाश करात के नेतृत्व में संप्रग सरकार को समर्थन दिया गया था। ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने का विरोध करने के बाद इन्हीं प्रकाश करात के नेतृत्व में माकपा के कार्यक्रम में यह दर्ज किया गया कि अवसर आने पर वह केन्द्र में सरकार बना सकती है। यानी ज्योति बसु जैसा कोई मौका नहीं चूकना है। 

    स्पष्ट है कि प्रकाश करात एवं उनके सहयोगी माकपा को उस खड्ड से बाहर नहीं ला सकते जिसमें वह अपने जन्म से ही घुसी पड़ी है। पुराने जमाने के संघर्षों की विरासत ही माकपा की भारत की पूंजीवादी राजनीति में सार्थकता बनाये हुए थी। अब वह विरासत अपना असर खो चुकी है। अब न नेतृत्व और न ही कतारों में वह ऊर्जा बची है कि वे माकपा को उस खड्ड से बाहर निकाल सकें। इसलिए व्यवहार में यही पाया जायेगा कि सीताराम येचुरी की लाइन ही लागू हो रही है। 

    जहां तक मजदूर वर्ग एवं अन्य मेहनतकश जनता का सवाल है, उसे वास्तव में संघी फासीवाद से उत्पन्न चुनौती का सामना करना है। पर यह किसी चुनावी जोड़-तोड़ से नहीं बल्कि पूंजीवाद विरोधी क्रांतिकारी संघर्षों को खड़ा करके ही किया जा सकता है।    

Labels: राष्ट्रीय


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