अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

सरकारी सालाना बजट और देश के मजदूर


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    पहली फरवरी को भारत सरकार का सालाना बजट पेश होने वाला है और मीडिया- खासकर अखबारों में- बजट के सम्बन्ध में एक कौतूहल का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। खबरों में अक्सर तो यही है कि सरकार इनकम टैक्स छूट का दायरा बढ़ा कर तीन लाख कर देगी या कर देना चाहिए। ज्यादा जोर से यह कहा जा रहा है। सरकार बजट घाटे को बढ़ने नहीं देगी तथा इस घाटे को कम करने के लिए सब्सिडी घटाने जा रही है। यह भी कि वित्त मंत्री जेटली सबकी सुन रहे हैं तथा अब की बार बजट ‘लोक लुभावन’ होगा क्योंकि भाजपा सरकार का यह अंतिम पूर्ण बजट होगा (अगले साल अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं)। अभी-अभी प्रधानमंत्री मोदी का एक बयान यह आया है कि बजट ‘लोक-लुभावन’ नहीं होगा। पर सवाल यह है कि पहली फरवरी को पेश होने वाले कोई 22 लाख करोड़ रु. के बजट में देश के मजदूरों को क्या कुछ या कितना कुछ मिलने वाला है? क्या मजदूरों की मजदूरी, पेंशन, ग्रेच्युटी आदि में कुछ बढ़ोत्तरी होगी? मजदूरों के आवास, चिकित्सा, बच्चों की शिक्षा जैसी सुविधाओं की स्थिति में कुछ अंतर आयेगा? क्या मजदूरों को जोखिम वाले कामों के लिए सुरक्षा उपकरण भी मिलेंगे? और अंततः, क्या सरकार का डंडा पूंजीपतियों की ओर से कुछ हटेगा?

    जैसा कि स्वाभाविक है और हमेशा से रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है। बजट की सरकारी रकम के बहने के नाले पहले से बने हैं। और, कुल मिलाकर, बजट के लाखों करोड़ रुपये उन्हीं नालों में बह जायेंगे जिनमें अब तक बहते रहे हैं। पिछले वर्ष का(2017-18) बजट 21 लाख 46 हजार 7 सौ 35 करोड़ था। यह रकम मुख्यतः तीन मदों से आनी थीः- 

1. तरह-तरह के टैक्सों सेः 15,15,771 करोड़ रुपया (सकल कर राजस्व) 

2. सरकारी कर्जों/अग्रिमों की वसूलियों सेः- 84,433 करोड़ रुपया

3. सरकार द्वारा लिये जाने वाले कर्ज सेः 5,46,531 करोड़ रुपया

कुल प्राप्तियां: 21,46,735 करोड़ रुपया

    अब, इस बजट की यह बड़ी रकम किन मदों में खर्च होनी थी, यह भी देख लीजिएः-

1. सरकार द्वारा लिये गये कर्जों की अदायगी में:- 5,23,078 करोड़ रुपया

2. रक्षा मेंः- 2,62,390 करोड़ रुपया

3. सब्सिडी मेंः- 2,40,339 करोड़ रुपया

4. पेंशन मेंः- 1,31,201 करोड़ रुपया

5. टैक्सों में राज्यों का हिस्सा देने मेंः- 1,37,101 करोड़ रुपया

6. शिक्षा मेंः- 79,686 करोड़ रुपया

7. कृषि, वाणिज्य, ऊर्जा, विदेश, परिवहन आदि-आदि सभी विभागों मेंः- 7,72,940 करोड़ रुपया

कुल खर्च:  21,46,735 करोड़ रुपया

    इसमें मजदूरों के सवालों की गुंजाइश कहीं नहीं है। यह विवरण पिछले साल (2017-18) का है। अगले आने वाले बजट में मुख्य रूप से इन्हीं मदों में रकम जायेगी। बस, किसी मद में कुछ थोड़ा कम या किसी में थोड़ा ज्यादा। आने वाला बजट पिछले साल के 21 लाख 46 हजार करोड़ की जगह सीधे 22 लाख करोड़ का हो सकता है। सरकार द्वारा लिये गये कर्जों की अदायगी की रकम बढ़ेगी। रक्षा मद में रकम अवश्य ही बढ़ेगी। सब्सिडी कुछ कम होगी। जी.एस.टी. की कम वसूली के चलते राज्यों के हिस्से में रकम बढ़ सकती है। जो भी हो, बजट के खर्चों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होना है। और मजदूरों को सीधे-सीधे या अन्य तरीके से भी कुछ मिलने वाला नहीं। यह जरूर है कि मजदूर विरोधी सरकार की शह पर पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण-दमन-उत्पीड़न और बढ़ेगा जैसा कि पिछले सालों में होता रहा है। तो क्या पेश होने वाले बजट से मजदूरों का कोई मतलब नहीं? नहीं। असल में सरकार के बजट भाषण में केवल बजट नहीं होता। खासकर 1991 से, जब से, उदारीकरण-निजीकरण तथा वैश्वीकरण की नीतियां खुलकर लागू की जाने लगीं तब से बजट भाषणों-बजट प्रस्तावों तथा इसमें नीति (नीयत) गत बयानों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है क्योंकि सरकार ने इसी के जरिये बहुत कुछ मजदूर विरोधी प्रावधान लागू करा दिये हैं। इसी से संकेत ग्रहण कर मालिकों-पूंजीपतियों ने मजदूरों के शोषण और उत्पीड़न के नये-नये तरीके अख्तियार कर लिये हैं। श्रम नियमों की अवहेलना और दिन-दहाड़े उल्लंघन और बढ़ा है। 

    कहा जाता है कि सरकार जहां भी अपने दस्तखत करेगी वहां फायदा पूंजीपति वर्ग का ही होगा। पूंजीवाद में ऐसा ही होगा। ऐसा कैसे संभव है कि पूंजीवाद में पूंजीवादी सरकारें मजदूरों के हित में कोई ऐलान करें और हुक्म जारी कर उसका पालन करायें। सरकार के इस बजट में भी फायदा पूंजीपतियों का ही होगा। जहां तक मजदूरों की बात है, उन्हें तो अपनी एकता, अपने संगठन और अपने संघर्षों पर ही भरोसा करना होगा। इसी के जरिये किसी प्रकार की उम्मीद की जा सकती है। 

Labels: राष्ट्रीय


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