अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

विज्ञान और संघी फासीवादी


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    केंद्रीय उप शिक्षा मंत्री सत्यपाल सिंह द्वारा डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को गलत वैज्ञानिक सिद्धांत करार दिये जाने के बाद शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का बयान आया है कि वे इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने अपने कनिष्ठ को हिदायत दी है कि वे इस तरह की बात न करें। उन्होंने इस बात से भी इंकार किया है कि सरकार किसी ऐसे वैज्ञानिक सम्मेलन के आयोजन में पैसा दे रही है जिसमें डार्विन के सिद्धांतों को चुनौती दी जायेगी। 

    भले मानस कहेंगे कि प्रकाश जावडे़कर की इन बुद्धिमत्तापूर्ण बातों के बाद विवाद समाप्त हो जाना चाहिए। जब शिक्षा मंत्री स्वयं यह कह रहे हों कि उन्हें डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में यकीन है कि वे वैज्ञानिकों का सम्मान करते हैं तो फिर भला कहने को क्या रह जाता है?

    लेकिन भले मानसों से सहमत हो पाना कुछ अन्य बातों की रोशनी में मुश्किल हो जाता है। बहुत दिन नहीं हुए जब प्रकाश जावड़ेकर के प्रधानमंत्री, जो स्वयं को गर्व से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक कहते हैं, ने एक अति आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए सारी दुनिया को बताया था कि भारत में तो प्राचीन काल में ही प्लास्टिक सर्जरी होती थी और इससे भी आगे बढ़कर एक सिर को दूसरे धड़ पर जोड़ने की शल्य क्रिया सम्पन्न की जाती थी। नरेन्द्र मोदी और प्रकाश जावडे़कर के संघी सहोदर यह कहते नहीं थकते कि भारत में प्राचीन काल में परमाणु बम, मिसाइल और हवाई जहाज सब थे। प्राचीन भारत में विज्ञान और तकनीक इतनी विकसित थी कि आज की सारी खोजें बच्चों का खेल भर हैं।

    संघियों की इन बातों का क्या डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से कोई मेल बैठाया जा सकता है? क्या इस तरह की बातें करते हुए भी संघी क्या यह दावा कर सकते हैं कि उन्हें डार्विन के वैज्ञानिक सिद्धांत में यकीन है?

    वैज्ञानिक दायरों से बाहर बहुत कम लोगों को पता होगा कि जब डार्विन ने 1859 में जीवों के विकास का खाका पेश करने वाली अपनी प्रसिद्ध किताब ‘प्रजातियों की उत्पत्ति’(आरिजिन आफ स्पेसीज) प्रकाशित की तो उन्होंने इसमें इंसान के बारे में कुछ नहीं कहा। बस एक जगह इशारा भर किया कि ये आम सिद्धांत इंसानों पर भी लागू होते हैं। केवल एक दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद ही इंसानों की उत्पत्ति के सवाल पर उन्होंने अपनी किताब प्रकाशित की ‘मनुष्य का अवतरण और लैंगिक चयन’। इसमें उन्होंने बताया कि इंसान का भी एक लम्बे समय में मानवाभ वानरों (एप्स) से विकास हुआ है। चिम्पेंजी, गोरिल्ला और आरांगउटाव उसके सबसे नजदीक हैं। बीच की वास्तव में नजदीक की प्रजातियां अस्तित्वविहीन हो चुकी हैं। इन प्रजातियों के बस इक्का-दुक्का अवशेष ही मिलते हैं। डार्विन ने उम्मीद जाहिर की थी कि इनके बारे में ज्यादा जानकारी हासिल होने के बाद इंसान की उत्पत्ति पर भी ज्यादा प्रकाश पड़ेगा। पर तब भी उसके आम नियम वहीं होंगे जो अन्य वैज्ञानिक प्रजातियों पर लागू होते हैं। 

    महत्वपूर्ण बात यह है कि डार्विन ने अपनी किताब ‘मनुष्य का अवतरण’ में न केवल उसके जैविक विकास पर बात की थी बल्कि उसके सांस्कृतिक विकास की भी बात की थी। शुरूआती दौर में तो दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। डार्विन ने स्पष्ट कहा था कि सभी सभ्य जातियों (देशों और राष्ट्रों) का एक असभ्य अतीत रहा है यानी सभी देशों के लोग अपने निकट या दूर अतीत में असभ्य आदिवासी या कबीलाई जीवन जीते थे। प्राचीन विश्व में सबसे उन्नत यूरोपीय सभ्यता यानी यूनान की बात करते हुए उन्होंने यह नहीं कहा कि उसकी विज्ञान तकनीक उनके जमाने की विज्ञान-तकनीक से ज्यादा ऊंची थी। डार्विन उत्तरोत्तर मानवीय प्रगति के सिद्धांत के समर्थक थे जिसके अनुसार बीच के सारे अपवाद के बावजूद कुल मिलाकर मानवीय सभ्यता प्रगति करती गयी है। 

    मानवीय सभ्यता के बारे में डार्विन के ये विचार, जो उनके मानव उत्पत्ति के सिद्धांत से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, संघी विचारों से कैसे सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं? भारत के अतीत में सारी विज्ञान व तकनीक को देखने वाले संघी विचार डार्विन के मानव प्रगति के सिद्धांतों के अनुरूप कैसे हो सकते हैं? स्पष्ट है कि ऐसा नहीं हो सकता। इस तरह प्रकाश जावड़ेकर का संघी फासीवाद का विज्ञान से तालमेल बैठाने का प्रयास सफल नहीं हो सकता। 

    बात केवल इतनी सी नहीं है। 

    डार्विन विज्ञान और वैज्ञानिकों की उस परंपरा में थे जो आधुनिक पूंजीवाद के साथ यूरोप में पैदा हुई थी। नये उभरते पूूंजीपति वर्ग को विज्ञान और तकनीक की जरूरत थी। दूसरी ओर विज्ञान उस स्थापित चर्च से टकराता था जो मध्यकाल से सामंती शासन को वैचारिक आधार प्रदान किए हुए थे। इस तरह एक ओर विज्ञान और पूंजीवाद तथा दूसरी ओर धर्म और सामंतवाद का टकराव लाजिमी था।

    चर्च ने नये उभरते विज्ञान का दमन करने का हर संभव प्रयास किया। यहां तक कि सुधरे प्रोटेस्टेन्ट चर्च ने भी इससे गुरेज नहीं किया। वैज्ञानिकों को प्रताड़ित किया गया, उन्हें जेल में डाला गया और उन्हें जिंदा जलाया गया। पूंजीवाद के हावी होने के साथ यह सब जब भौंड़े रूप में करना संभव नहीं रह गया तब भी चर्च ने दूसरे रूपों में विज्ञान के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा। आखिर यह उसके अस्तित्व का सवाल था। 

    डार्विन के समय तक विज्ञान काफी विजयें हासिल कर चुका था। गैलीलियो और न्यूटन के गति के सिद्धांत व्यापक मान्यता हासिल कर चुके थे। भाप के इंजन के आविष्कार के साथ आधुनिक मशीन उद्योग ने अपने झंडे गाड़ दिये थे। अब वह स्थिति बनने लगी थी जब किसी बात के सही होने के प्रमाण उसका विज्ञान सम्मत होना था जैसा कभी उसका ‘बाइबिल सम्मत’ या ‘चर्च सम्मत’ होना था। 

    लेकिन कुछ मूलभूत बातों पर विज्ञान स्वयं भी अभी पुरानी मान्यताओं से चिपका हुआ था। मसलन यह माना जाता था कि ब्रह्मांड, पृथ्वी और उस पर मौजूद जीव हमेशा से वैसे ही हैं। वे गतिमान तो हैं पर परिवर्तनशील नहीं। यदि परिवर्तनशील भी हैं तो वैसे ही जैसे ऋतुओं का चक्रीय परिवर्तन होता है। इन विचारों का तालमेल बाइबिल के उन विचारों से बैठाना मुश्किल नहीं था जिसके अनुसार ईश्वर ने ब्रह्मांड, धरती और उस पर सारे जीवों का निर्माण 4004 ईसा पूर्व में छः दिनों में किया था। ईश्वर ने पुरुष का निर्माण अपनी ही अनुकृति में किया था और फिर उसकी पसली से स्त्री का निर्माण किया था।

    इन विचारों में दरार उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में पड़नी शुरू हुई। डार्विन के दादा इरास्मस डार्विन और लामार्क ने ये विचार प्रस्तुत किये कि पृथ्वी पर सारे जीव हमेशा से नहीं हैं बल्कि उनका विकास हुआ है। लामार्क ने तो इस बारे में विस्तार से तथ्य प्रस्तुत किये। 

    इसी समय यह धारणा भी पैदा होने लगी कि धरती हमेशा से ऐसी ही नहीं है। इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण काम चार्ल्स लाइल ने किया जो डार्विन के गुरू और मित्र भी थे। धीमे-धीमे वैज्ञानिकों में यह स्थापित होने लगा कि पृथ्वी की उम्र दस से बीस करोड़ साल की है तथा यह विकास के कई चरणों से गुजरी है। 

    इस तरह के विचारों को आगे बढ़ाते हुए ही डार्विन ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि प्राकृतिक वरण के जरिये लम्बे समय में निचले जीवों से ऊपरी जीवों की पैदाइश हुई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि डार्विन ने यह कहा कि धरती पर जीवों के विकास में लगने वाले समय को देखते हुए धरती की उम्र तब अनुमानित दस से बीस करोड़ साल से काफी ज्यादा होनी चाहिए। उन्होंने स्वयं इसे पीछे तीस करोड़ साल या यहां तक कि पचास करोड़ साल पीछे ले जाने का सुझाव दिया। यह गौरतलब है कि आज वैज्ञानिक धरती पर बहुकोशिकीय जीवन को करीब साठ करोड़ साल पुराना मानते हैं जबकि धरती की कुल उम्र 460 करोड़ साल (माना जाता है कि धरती पर एककोशिकीय प्रोक्रार्यटिक जीव करीब 400 करोड़ साल पहले पैदा हो गये थे)।

    स्वाभाविक ही था कि डार्विन के इन विचारों का धर्म और चर्च की ओर से तीखा विरोध हो। यह सिद्धांत चर्च की वैचारिक आधार भूमि को ही खिसका देता था। वैचारिक आधार खिसक जाने के बाद चर्च के ऊपरी महल का ढहना अनिवार्य था। 

    हालांकि 1859 में डार्विन ने इंसान की उत्पत्ति के बारे में कोई बात नहीं कही थी पर उनके सिद्धांतों का निहितार्थ सबके लिए स्पष्ट था। और जब डार्विन ने इस निहितार्थ को बाकायदा तथ्यों के साथ मनुष्य का अवतरण में प्रस्तुत कर दिया तो मानो रही-सही कसर पूरी हो गयी। समूचा चर्च डार्विन के ऊपर टूट पड़ा।

    तब से लेकर आज तक धर्म और डार्विन के बीच यह संघर्ष जारी है। इस बीच दोनों बहुत बदले हैं पर यह संघर्ष बदले हुए रूप में जारी है। 

    समय के साथ जीवों के विकास के सिद्धांत के मामले में धर्म संघर्ष करते हुए भी पीछे हटता गया है। यहां तक कि रोमन कैथोलिक चर्च ने भी करीब दो दशक पहले इस सिद्धांत का मान्यता देते हुए यह घोषित कर दिया कि विकासवाद का बाइबिल की शिक्षाओं से कोई विरोध नहीं है। लेकिन यह लगभग उसी समय हुआ जब कुछ धार्मिक पोगापंथियों की यह मांग जोर पकड़ने लगी थी कि विद्यालयों में बाइबिल की ‘उत्पत्ति’ के सिद्धांत को विकासवाद के साथ-साथ पढ़ाया जाये। संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में वे अपनी मांगे मनवाने में सफल भी हो गये। 

    दूसरी ओर डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत उत्तरोत्तर प्रगति करता गया है -सैद्धांतिक तौर पर भी और प्रभाव के तौर पर भी। जेनेटिक व एपिजेनेटिक सिद्धांतों से लैस होकर यह ज्यादा उन्नत हो गया है और वैज्ञानिकों में लगभग सार्विक मान्यता प्राप्त है। कुछ तो इसे जीव विज्ञान का एकमात्र वैज्ञानिक सिद्धांत मानते हैं। धार्मिक विचारों के बावजूद यह आम जनों में ज्यादा से ज्यादा मान्य होता गया है। 

    पर धर्म और डार्विन का टकराव महज दो विचारों के बीच टकराव का मामला नहीं रहा है। असल में यह मसला प्रकारांतर से प्रतिगामी और अग्रगामी शक्तियों के बीच टकराव का मामला रहा है। जो सामाजिक शक्तियां समाज की प्रगति को रोकना चाहती हैं या उसे पीछे ले जाना चाहती हैं वे धार्मिक पोंगापंथ का इस्तेमाल करती हैं। इसके विपरीत समाज की जो शक्तियां समाज को आगे ले जाना चाहती हैं वे विज्ञान को आगे बढ़ाने की पक्षधर होती हैं और धार्मिक पोंगापंथ के खिलाफ संघर्ष करती हैं। 

    किसी समय पूंजीपति वर्ग समाज को आगे बढ़ाने वाला वर्ग था। तब वह सामंतवाद के खिलाफ था। वह धार्मिक पोंगापंथ के खिलाफ था और विज्ञान के पक्ष में था। अब स्थिति बदल गयी है। अब सामंतवाद बचा नहीं है। अब समाज में पूंजीपति वर्ग हावी है। अब यह वह वर्ग है जो समाज को आगे जाने से रोक रहा है। इसीलिए अब पूंजीपति वर्ग धार्मिक पोंगापंथ का रक्षक बन गया है। उसे आज तकनीक चाहिए। पर विज्ञान उसके लिए असुविधाजनक बन गया है। 

    यही कारण है कि आज सारी दुनिया में धार्मिक कूपमंडूकता को पूंजीपति वर्ग बढ़ावा दे रहा है। टी.वी. से लेकर सिनेमा तक उसकी भरमार है। पूंजीवादी नेता बढ़-चढ़कर स्वयं को धार्मिक दिखा रहे हैं। कुछ ने तो इसे अपनी राजनीति का आधार ही बना लिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ प्रदेशों में डार्विन के सिद्धांतों को मानने से मना कर दिया गया है तो भारत का शिक्षा मंत्री क्यों न यह मांग करे कि इसे पूरे भारत में नकार दिया जाये।

    जैसा कि पहले कहा गया है कि संघियों के डार्विन पर विचार उनके आम विचारों के अनुरूप हैं। उनका दुनिया को देखने का नजरिया ही ऐसा है। वह अपनी प्रकृति से विज्ञान विरोधी और कूपमंडूक आस्था पर आधारित हैं। एक संघी के लिए उसकी सारी तर्क क्षमता का इस्तेमाल उसकी कूपमंडूक आस्था की रक्षा में ही होना चाहिए। विज्ञान और वैज्ञानिक सिद्धांत इस कूपमंडूकता को खंडित करते हैं, इसलिए इन्हें नकारा जाना चाहिए। 

    संघी यदि विज्ञान के साथ तालमेल बैठाने का प्रयास करते हैं तो इसीलिए कि तकनीक बिना उनका काम भी नहीं चल सकता। पर यह उनके विज्ञान विरोधी धार्मिक पोंगापंथी कूपमंडूक चरित्र को जरा भी प्रभावित नहीं करता। और यह इन हिन्दू फासीवादियों की अन्य बातों की तरह ही मानव प्रगति के रास्ते की घोर बाधा है। 

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