अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

बवाना से निकलते सबक


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    कुछ दिन पहले दिल्ली के एक औद्योगिक क्षेत्र बवाना में एक फैक्टरी में लगी आग में कई मजदूर मारे गये। क्योंकि यह घटना दिल्ली में घटी थी इसलिए काफी मीडिया कवरेज मिला पर यह कवरेज एक सनसनी से ज्यादा कुछ नहीं था। मानो किसी क्राइम स्टोरी को कवरेज दिया जा रहा हो। 

    दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों से परिचित कोई भी व्यक्ति जानता है कि वहां बवाना की इस फैक्टरी की तरह हजारों-हजार छोटी-बड़ी फैक्टरियां हैं जहां किसी कायदे-कानून का कोई पालन नहीं होता है। मजदूरों को दासों की तरह काम करना होता है और एक दास की तरह जीना और मरना पड़ता है। 

    दिल्ली के बवाना में रचे गये हत्याकांड की तरह पूरे देश में हाल के वर्षों में कई कांड दोहराये जा चुके हैं। फरीदाबाद में लखानी, गाजियाबाद में भूषण स्टील, ऊंचाहार में एन.एच.पी.सी. इत्यादि-इत्यादि। और ऐसे ही हत्याकांड पूंजीपतियों द्वारा चीन, बांग्लादेश सहित कई देशों में आये दिन घटते ही रहते हैं। मतलब साफ है कि यह एक फैक्टरी, एक औद्योगिक क्षेत्र, एक देश की बात नहीं है। यह पूंजीवादी देशों में घटने वाली एक आम परिघटना है। 

    ऐसे हत्याकांडों के समय थोड़ी सनसनी, थोड़ी हलचल के बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। मुआवजे, जांच, निंदा, आक्रोश के दौर के बाद फिर से सब कुछ सामान्य हो जाता है। 

    मजदूरों की इस तरह की हत्याओं से कोई किसी तरह का सबक नहीं सीखता है। न पूंजीपति, न उसकी सरकारें और न उसकी व्यवस्था। इसी तरह से न मजदूर, और न उसको संगठित करने का दावा करने वाले मजदूर संगठन। जहां तक पूंजीपतियों और उसकी सरकार व शासन व्यवस्था की बात है उसके लिए मजदूरों की जान की बात है तो वह भार ढोने वाले जानवर के यकायक खत्म हो जाने से ज्यादा कुछ नहीं है। मुआवजे बड़ी मुश्किल से भारी दबाव के बीच दिये जाते हैं। अक्सर घटना के तुरंत बाद मिल गया तो मिल गया अन्यथा राम जाने। फैक्टरी, कल-कारखाने के नुकसान की भरपाई बीमे आदि से हो जाती है। मजदूर के मारे जाने, अपंग होने की भरपाई तुरंत ही बेरोजगारों से हो जाती है। भूख, बेरोजगारी के बीच मजदूर अपनी जान को जोखिम में न डालें तो क्या करें। 

    मजदूरों और मजदूर संगठनों का ऐसी घटनाओं से सबक न सीखना ज्यादा घातक साबित हो रहा है। मजदूर संगठनों में जिन टेªड यूनियनों का बोल-बाला है वे इतने गिर चुके हैं कि उनके मुंह से ऐसे समय में दो बोल फूटने मुश्किल हैं। अधिक से अधिक कोई रस्म अदा कर दी या फिर पूंजीपतियों के साथ मुआवजे के घृणित खेल खेलकर मजदूरों के सच्चे आक्रोश को दबाने या भटकाने में लग जाते हैं। 

    पूंजीपतियों के इन जेबी संगठनों को इस तरह के हत्याकांड के समय में यह बात किसी भी कीमत में नहीं कहनी होती है जो ऐसे हत्याकांड के पीछे मूल और असली बात होती है। वह नहीं कह सकते हैं कि इस घटना के पीछे मूल वजह पूंजीपतियों के मुनाफे की अंधी हवस है इसलिए मजदूरो आगे आओ इस क्रूर नृशंस पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा कर अपना राज समाजवाद कायम करो। और जो सरकारें, अदालतें रोज मजदूरों को कानून का पाठ पढ़ाती हैं वे पूंजीपतियों को कदम-कदम पर संरक्षण देती हैं। बस अधिक से अधिक जब ज्यादा हायतौबा मचती है तो किसी व्यक्ति विशेष की गिरफ्तारी और मुकदमे का खेल खेला जाता है। और अंत में दिल्ली के उपहार सिनेमा की तरह, मुकदमे का परिणाम शून्य सरीखा होता है। 

    पूंजीवाद के जन्म से लेकर आज तक के इतिहास को देखा जाय तो इसमें ऐसे हत्याकांडों का अनवरत सिलसिला है और यह सिलसिला पूंजीवाद में कभी खत्म नहीं होगा। 

    इस सिलसिले में उस वक्त थोड़ी कमी अवश्य आ सकती है जब मजदूरों की आपसी एकता ऊंचे दर्जे की हो। संघर्ष करके पूंजीपतियों को मजदूर अपने कार्य व जीवन परिस्थितियों में सुधार के लिए मजबूर कर दें। कानून को बनवाने व लागू करवाने के लिए अपनी वर्गीय एकता का रोज-रोज प्रदर्शन करें।

        इतिहास की सच्चाई यही रही है कि पूरी दुनिया के मजदूरों की वास्तविक दशा में उस वक्त सबसे ज्यादा तेज गति से परिवर्तन आये जब पूरी दुनिया में समाजवाद तेजी से आगे बढ़ रहा था। एक के बाद दूसरे देश में, रूस की महान समाजवादी क्रांति की तर्ज पर क्रांतियां आगे बढ़ रही थीं। पूंजीपति वर्ग को अपनी लूट व मुनाफे की व्यवस्था खतरे में दिखायी दे रही थी। ऐसे वक्त में उसने अपनी व्यवस्था में कई सुधार किये। न्यूनतम मजदूरी की परिभाषा गढ़ी और कुछ उसका बंदोबस्त किया। कानून बनाये और यह दिखलाने की कोशिश की कि उसकी व्यवस्था ठीक और अच्छी हो सकती है। और यह सिलसिला तब बंद हो गया जब समाजवाद और मजदूर क्रांतियों का दबाव नहीं रहा। 

    अस्सी-नब्बे के दशक के बाद जब नई आर्थिक नीतियों की घोषणाएं हुईं तो मजदूरों से वह सब कुछ छीना जाने लगा जो उन्होंने एक दौर में वर्ग संघर्ष के जरिये हासिल किया था। एक के बाद एक ऐसे हमले होने लगे कि मजदूर वर्ग लगभग उसी अवस्था में पहुंच जाये जहां वह अठारहवी-उन्नीसवीं सदी में था। अधिकारविहीन, संगठनविहीन ऐसा जीव जिसके मुंह में कोई जुबान न हो। चुपचाप काम करे। ऐसे समय में मजदूर वर्ग की तमाम पार्टियों और संगठनों ने क्या किया है। उन्होंने पूंजीपति वर्ग के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। पूंजीपतियों के सामने अपनी आत्मा गिरवी रख दी। उसकी संसद, विधानसभाओं को अपनी पुण्यस्थली, शरणस्थली बना लिया है। 

    बवाना जैसे हत्याकांड हाल के दशकों में बढ़ गये हैं। नंगा, छुट्टा पूंजीवाद रोज मजदूरों की हत्याएं कर रहा है। घायल और अपंग मजदूरों की संख्या हर वर्ष के साथ बढ़ती जा रही है। निजीकरण व उदारीकरण की नीतियों ने देशी-विदेशी पूंजीपतियों की क्रूरता, अमानवीयता को जायज ठहरा दिया है। पूंजीपतियों के भोंपू अखबार व चैनल इन नीतियों का ऐसा गुणगान करते हैं मानो ये पवित्र ऋचायंे, आयतें हों। 

    बवाना जैसे हत्याकांड से पूंजीपति वर्ग कुछ नहीं सीखेगा। वे लातों के भूत हैं। मजदूर वर्ग को यह अवश्य सीखना होगा कि ये पूंजीवाद की आम प्रवृत्ति का हिस्सा है। मुनाफे की अंधी हवस की उपज है। मजदूरों की ऐसी कार्यवाहियां ही इन हत्याकांडों की जमीन को खत्म कर सकती हैं जिसे इंकलाब कहा जाता है। पूंजीवाद का खात्मा और समाजवाद की स्थापना ही बवाना जैसे हत्याकांड से निकाला जाने वाला आवश्यक और निर्णायक सबक है। 

Labels: सम्पादकीय


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