अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

एक संविदाकर्मी की मौत और नाकाम ट्रेड यूनियन


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    हरिद्वार में बी.एच.ई.एल. (भेल) में दिनांक 12 जनवरी 2018 को रात लगभग 11 बजे ब्लाॅक-1 में भेल संविदा कर्मचारी श्री कृष्ण कुमार को हार्ट अटैक आया। लगभग आधे घंटे के बाद उसके साथ के कर्मचारियों ने उसे देखा और भेल अस्पताल में ले गये। वहां आकस्मिक सेवा में तैनात डा. जोशी ने उसकी जांच करने के बाद वरिष्ठ डा. बलवंत सिंह कुशवाह को बुलाया। डा. कुशवाह ने संविदा कर्मी का ई.सी.जी. करवाया। ई.सी.जी. को देखकर डा. कुशवाह ने संविदा कर्मी कृष्ण कुमार को रात डेढ़ बजे मृत घोषित कर दिया। कृष्ण कुमार के जीजा पारितोष जो भेल में स्थाई कर्मचारी हैं, ने डा. से बार-बार आग्रह किया कि आप इसे करंट थैरेपी, इंजेक्शन या वैन्टीलेटर पर रखने की कार्यवाही करें। लेकिन डा. कुशवाहा ने संविदा का होने के कारण कर्मचारी का कोई सही तरीके से इलाज नहीं किया और उसे मृत घोषित कर मोर्चरी में रखवा दिया। सुबह परिजनों ने पोस्टमार्टम के लिए जब लाश का पंचनामा करने के लिए मोर्चरी से बाहर निकाला तो सब लाश को देखकर हैरान परेशान हो गये क्योंकि मृत व्यक्ति कृष्ण कुमार ने मोर्चरी में ही उलटी व पेशाब किया हुआ था। उसके बाद सभी यूनियनों ने वरिष्ठ डा. सर्वजीत सिंह से डा. कुशवाहा की लापरवाही के कारण कर्मी की मृत्यु होने की बात कही। उसके बाद लाश का पोस्टमार्टम होने के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया। कर्मी के परिजन डा. की लापरवाही के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करने के लिए गये लेकिन थाना इंचार्ज ने पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद एफआईआर दर्ज करने का आश्वासन दिया। 

    6 दिन बाद 18 जनवरी 18 को कृष्ण कुमार की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली जिसमें कृष्ण कुमार की मृत्यु पोस्टमार्टम के समय 13 जनवरी 18 को दोपहर ढाई बजे से 6 घंटे पहले हो चुकी थी। यानी कृष्ण कुमार की मृत्यु 13 जनवरी 18 की सुबह 8 से 8:30 बजे के बीच मोर्चरी में हुयी। 18 जनवरी 18 को सांय 5 बजे पुलिस स्टेशन से पोस्टमार्टम की रिपोर्ट लेने सभी यूनियनों के सदस्य पहुंचे। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के आधार पर भी एफआईआर लिखने के लिए थाना इंचार्ज ने मना कर दिया क्योंकि भेल प्रबंधन का पुलिस विभाग पर पूरा दबाव था। सभी यूनियनों के सदस्यों ने थाना इंचार्ज पर बहुत दबाव बनाया लेकिन वह रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब भेल मजदूर ट्रेड यूनियन (बीएमटीयू) के सदस्यों ने जोरदार नारेबाजी की। इसका यह परिणाम निकला कि थाना इंचार्ज को एएसपी को बुलाना पड़ा। एएसपी ने भी डाक्टर को बचाने की पूरी कोशिश की और कहा कि हम एक सरकारी डाक्टर व सीएमओ की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित करेंगे और जांच कमेटी के आधार पर रिपोर्ट दर्ज करेंगे। पुलिस भी कुल मिलाकर मजदूरों के अंदर उठ रहे रोष को कम कर रही थी। अगले दिन 19 जनवरी 18 को सभी यूनियनों के पदाधिकारी एसटीडी बूथ पर इकट्ठे हुए। एक यूनियन भेल कर्मचारी परिषद; जिसमें मृतक का साला पारितोष है; के एक पदाधिकारी ने कहा कि हम दो डिमांड तैयार करके लाये हैं। एक मृतक की पत्नी को स्थायी नौकरी व दूसरी डा. के खिलाफ कार्यवाही। और उन्होंने कहा कि हमें प्रबंधन के सामने आराम से बात करनी है नहीं तो प्रबंधन हममें से ही किसी के खिलाफ कार्यवाही कर देगा और हम इसी में उलझ कर रह जायेंगे। इस बात का सभी यूनियनों ने तीखा विरोध किया। फिर हर यूनियन से एक-एक सदस्य वार्ता के लिए गया। वार्ता जीएम एचआर से हुयी। शुरू में जीएम एचआर काफी डरा हुआ था। लेकिन जब मृतक के साले और उससे सम्बन्धित यूनियन ने प्राथमिकता में नौकरी को रखा और डाक्टर के खिलाफ कार्यवाही को भूल गये तो जीएम एचआर ने मीटिंग को दोबारा उसी दिन 3 बजे के लिए बुलाया। इसी बीच बीएमटीयू के पदाधिकारी ने जीएम एचआर पर दोषी डाक्टर के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए बात रखी। मीटिंग समाप्त होने के बाद बीएमटीयू के अध्यक्ष ने मृतक के साले पारितोष से बात की और समझाया कि जितना हम डाक्टर पर शिकंजा कसेंगे उतना अपनी मांगों को मनवा सकेंगे। 3 बजे वार्ता शुरू हुयी। जीएम एचआर ने कहा कि मैं कोड न. पर नहीं रख सकता। उसके लिए कारपोरेट आॅफिस दिल्ली में बात करनी होगी क्योंकि वो संविदा कर्मी था। मैं उसकी पत्नी को संविदा पर ही रख सकता हूं। इस पर मोर्चे की यूनियनें (बीएमटीयू, सीटू, एटक, बीकेएस, बीकेकेएमएस) वार्ता को छोड़कर बाहर चली आईं। इन वार्ताओं में मान्यता प्राप्त संगठन व 10 प्रतिशत के संगठन का रवैया नकारात्मक रहा। उन्होंने तीखा विरोध नहीं दिखाया। उन्होंने अपनी ताकत कारखाने के मजदूरों को इकट्ठा करके कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने की कोशिश नहीं की। जबकि इस घटना से संविदाकर्मी, कोडेड कर्मी, स्थाई मजदूरों के अंदर व्यापक रोष देखने को मिला। उन्हें भी डर था कि उस डाक्टर की अगली लापरवाही हम या हमारे परिवार का कोई  सदस्य भुगत सकता है। मैनेजमेण्ट ने 2 सितम्बर 2015 की हड़ताल के बाद से मजदूरों के ऊपर सस्पेंड करना, ट्रांसफर करना, धमकी देना आदि डर बना रखे थे। ये एक ऐसा मौका था जब डाक्टर के ऊपर शिकंजा कसकर मैनेजमेण्ट पर दबाव बनाकर यूनियनें अपने लिए व संविदा मजदूरों के लिए कई रास्ते बना सकते थे। लेकिन ये आज की दलाल यूनियनें मजदूरों के अधिकारों को हासिल न कर पाने के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए आज के दौर में एक क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन व क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन सेण्टर की जरूरत है।               -हरिद्वार संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


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