एथेनाल ब्लेंड पेट्रोल: दावे और हकीकत

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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आजकल ई-20 पेट्रोल का मामला काफी चर्चा में है। मोदी सरकार ने ई-20 एथेनाल मिश्रित पेट्रोल को ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘किसान कल्याण’ और ‘ऊर्जा सुरक्षा’ जैसे दावों के साथ बिना बहस मुहाबसे और राय मशवरा किए ही थोप दिया। मार्च 2025 से देश के लगभग सभी पेट्रोल पंपों पर 20 प्रतिशत इथेनाल मिश्रित पेट्रोल (ई-20) की बिक्री अनिवार्य कर दी गई। 
    
मोदी सरकार का दावा था कि इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी, किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण को लाभ होगा। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों से बिल्कुल विपरीत है। इसमें कंपनियां और सत्ता से जुड़े लोगों को अरबों रुपये का फायदा पहुंच रहा है, जबकि आम उपभोक्ता को कम माइलेज, बढ़ती लागत, इंजन को संभावित नुकसान और वाहनों की घटती रीसेल वैल्यू का तिहरा बोझ झेलना पड़ रहा है। 
    
जिस प्रकार हिंदू फासीवादियों ने अपनी अन्य योजनाओं को भी भारी भरकम दावों के साथ लागू किया और फिर अंततः उसका आम नागरिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा जबकि इसकी कीमत पर बड़े पूंजीपति और संघ तथा भाजपा के लोग भारी कमाई करने में सफल रहे वही इस मामले में भी हो रहा है। काला धन लाने के दावे के साथ की गई नोटबंदी का हश्र तो सभी को याद है। यही हाल मेक इन इंडिया का हुआ जिसमें भारत को आत्मनिर्भर बना देने के दावे हुए।
    
ई-20 पेट्रोल के मामले में भी ‘आत्मनिर्भरता’ का ढोंग बेनकाब हो जाता है। मोदी सरकार ने दावा किया कि एथेनाल मिश्रण से कच्चे तेल का आयात घटेगा और देश ऊर्जा के मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनेगा। मगर तथ्य इसके उलट हैं। यहां भी पेट्रोल में इस्तेमाल किया जाने वाला एथेनाल आयात करना पड़ रहा है । यहां ईंधन-ग्रेड एथेनाल के आयात पर प्रतिबंध जरूर है, लेकिन औद्योगिक एथेनाल का बड़े पैमाने पर आयात होता है इसी को फिर पेट्रोल में इस्तेमाल हेतु तैयार किया जा रहा है। 
    
‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत हर साल लगभग एक अरब लीटर औद्योगिक इथेनाल आयात करता है और इसका 90 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से आता है। यह घरेलू एथेनाल को ईंधन ब्लेंड पेट्रोल हेतु मुक्त करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा एथेनाल उत्पादन मक्का (कार्न) से किया जा रहा है। एथेनाल उत्पादन के लिए मक्का की मांग इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत, जो कभी मक्का का शुद्ध निर्यातक था, अब मक्का का शुद्ध आयातक बन गया है। वर्ष 2024-25 में एथेनाल के लिए मक्का की मांग लगभग 8 लाख टन से बढ़कर अनुमानित 128 लाख टन तक पहुंच गई। इसी अवधि में देश को लगभग 8 लाख टन मक्का का आयात करना पड़ा। कृषि मंत्रालय ने इस बात पर चिंता जताई कि एल्कोहल उत्पादन पर अत्यधिक जोर ने भारत को उस फसल का आयातक बना दिया जिसका वह परंपरागत रूप से निर्यातक रहा है। 
    
दूसरे ढंग से देखें तो यह ‘खाद्य बनाम ईंधन’ का भी संकट है। एक किलोग्राम मक्का जो किसी गरीब परिवार का पेट भर सकता था, वह अब इथेनाल में बदलकर महज कुछ किलोमीटर की सवारी का माध्यम बन रहा है। एक ऐसे देश में जहां अब भी कुपोषण और भूख जैसी चुनौतियां मौजूद हैं, वहां खाद्यान्न से एल्कोहल के रूप में ईंधन बनाया जा रहा है और उसके लिए विदेशों से मक्का मंगाना पड़ रहा है। यह ‘आत्मनिर्भरता’ का ऐसा माडल है जो हिंदू राष्ट्रवाद की पर्त दर पर्त उधेड़ता है साथ ही बुनियादी प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
    
सरकार ने यह दावा किया था कि इस एथेनाल नीति से किसानों की आय बढ़ेगी और उन्हें गन्ने का उचित मूल्य मिलेगा। वास्तविकता यह है कि इस नीति का सर्वाधिक लाभ किसानों को नहीं, बल्कि बड़े चीनी मिल मालिकों और एथेनाल उत्पादक पूंजीवादी घरानों को मिला है। सरकार ने इथेनाल परियोजनाओं के लिए 4,687 करोड़ रुपये की ब्याज सब्सिडी को मंजूरी दी और एथेनाल पर जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। यह आर्थिक सहायता सीधे उत्पादक कंपनियों के खातों में जाती है, न कि किसानों की जेब में। इसके अलावा, गन्ना आधारित इथेनाल उत्पादन का जल-अवशोषण बेहद चिंताजनक है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि एक लीटर एथेनाल हेतु गन्ना उत्पादन में औसतन 2,000 से 3,000 लीटर पानी खर्च होता है, जो पहले से जल-संकट झेल रहे क्षेत्रों में भूजल स्तर को और नीचे धकेल रहा है। 
    
इस खेल में सबसे बड़ी लाभार्थी वे कंपनियां हैं जो भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, जो इस नीति के सबसे मुखर समर्थक रहे हैं, पर उनके परिवार की कंपनियों को इस नीति से असाधारण लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे हैं। गडकरी के पुत्र निखिल गडकरी द्वारा संचालित ‘सीआईएएन एग्रो इंडस्ट्रीज’ का राजस्व वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही (फ1 थ्ल्25) में बढ़कर लगभग 511 करोड़ रुपये हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 की समान तिमाही में यह मात्र 17.47 करोड़ रुपये था- यानी एक वर्ष में 2,800 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि। गडकरी ने इन आरोपों को ‘आयात लाॅबी की साजिश’ करार देकर खारिज किया, लेकिन कंपनी के आंकड़े अपनी कहानी खुद बयान करते हैं। 
    
एथेनाल नीति से लाभान्वित होने वाली कंपनियों और सत्तारूढ़ दल के बीच वित्तीय रिश्तों की एक और कड़ी चुनावी बान्ड के आंकड़ों से भी सामने आई। बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड, जो इथेनाल उत्पादन का एक बड़ा नाम है, ने भारतीय जनता पार्टी को 2 करोड़ रुपये का चंदा दिया। इसी तरह श्री रेणुका शुगर्स से जुड़ी ‘रेणुका इन्वेस्टमेंट्स एंड फाइनेंस लिमिटेड’ ने भाजपा को 5 करोड़ रुपये का चुनावी बान्ड दान किया। 
    
इस मुनाफे के गोरखधंधे का पूरा नुकसान उन आम नागरिकों को हुआ है जो पेट्रोल गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। सरकार ने दावा किया था कि ई-20 पेट्रोल सस्ता होगा, लेकिन ईंधन पंपों पर इसकी कीमत शुद्ध पेट्रोल के बराबर ही है। पेट्रोल में प्रति लीटर 20 प्रतिशत एथेनाल की मिलावट हुई मगर पेट्रोल की कीमत बिल्कुल भी कम नहीं हुई। 
    
लागत से भी बड़ी मार माइलेज में गिरावट के रूप में पड़ रही है पेट्रोल का ऊर्जा घनत्व लगभग 32 मेगाजूल प्रति लीटर होता है, जबकि इथेनाल का ऊर्जा घनत्व मात्र 21.2 मेगाजूल प्रति लीटर है- यानी लगभग 34 प्रतिशत कम। इसलिए ई-20 पेट्रोल में प्रति लीटर उपलब्ध ऊर्जा केवल पेट्रोल की तुलना में अपने आप कम हो जाती है। व्यवहार में यह गिरावट 6 से 7 प्रतिशत माइलेज में कमी के रूप में सामने आती है। एक उपभोक्ता सर्वेक्षण के अनुसार, 2023 से पहले बने वाहनों के दस में से छः से अधिक मालिकों ने 10 प्रतिशत से अधिक माइलेज गिरने की शिकायत की। एक स्वतंत्र विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि कम माइलेज के चलते उपभोक्ताओं को सामूहिक रूप से लगभग 88,234 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय वहन करना पड़ा।
    
केवल माइलेज ही नहीं, एथेनाल के रासायनिक गुण वाहनों के लिए कई तकनीकी संकट खड़े करते हैं। एथेनाल वायुमंडल से नमी सोखने की प्रबल क्षमता रखता है। जब ई-20 ईंधन लंबे समय तक टंकी में रहता है, तो यह नमी सोखता है, जिससे ईंधन प्रणाली में जंग लगने की संभावना होती है। इसके अलावा, एथेनाल के  कारण ठंड के मौसम में इंजन स्टार्ट करने में कठिनाई आती है। उपयोगकर्ताओं ने यही समस्याएं दर्ज कराई हैं- क्लाग्ड इंजेक्टर, संक्षारित ईंधन लाइनें और पुराने वाहनों के रबर तथा प्लास्टिक पार्ट्स का क्षरण। दरअसल, अधिकांश पुराने वाहनों की ईंधन प्रणाली में लगे सील, गैस्केट और होज एथेनाल के रासायनिक प्रभाव को झेलने लायक नहीं बनाए गए थे, जिससे रिसाव और खराबी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। 2023 के बाद ही ई-20 पेट्रोल के हिसाब से इंजन बनाने का आदेश सरकार ने दिए। मगर अधिकांश गाड़ियां पुरानी ही हैं।
    
वैज्ञानिक दृष्टि से उत्सर्जन का पहलू भी उतना ही जटिल है। सरकार पर्यावरण लाभ का दावा करती है, जबकि शोध बताते हैं कि एथेनाल मिश्रण से कार्बन मोनोआक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन भले थोड़ा घटे, लेकिन एसीटैल्डिहाइड जैसे कैंसरजनित कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन बढ़ जाता है। इसी तरह, नाइट्रोजन आक्साइड का उत्सर्जन भी कुछ इंजन स्थितियों में बढ़ सकता है। इसी तरह गन्ना मक्का हेतु आयधिक भू-उपयोग परिवर्तन के प्रभावों को जोड़ें तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी का दावा बेहद कमजोर पड़ जाता है। 
    
एथेनाल के सही इस्तेमाल के लिए इंजन में उसी हिसाब से बदलाव की जरूरत थी मगर यह बेहद कमजोर है। देश की सड़कों पर चलने वाले अधिकांश पुराने वाहन इस लाभ का दोहन करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें केवल नुकसान ही उठाना पड़ रहा है। इंजन की मरम्मत का खर्च, बार-बार सर्विसिंग और घटती रीसेल वैल्यू- यह तिहरा आर्थिक बोझ सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ा है।
    
एक ऐसी नीति जो देश के लगभग 30 करोड़ वाहन मालिकों को प्रभावित करती है, उसे बिना किसी व्यापक सार्वजनिक परामर्श, बिना संसदीय बहस और बिना स्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन के चुपचाप लागू कर दिया गया। मार्च 2025 से अधिकांश पेट्रोल पंपों पर उपभोक्ता को शुद्ध पेट्रोल या ई-10 जैसे विकल्प उपलब्ध नहीं रहे, उन्हें केवल ई-20 लेने के लिए बाध्य किया गया।  
    
जहां तक मुख्य धारा के मीडिया और सरकार का सवाल है वह लगातार ही ऐल्कोहल ब्लेंड पेट्रोल के मामले में किसी भी आलोचना या आरोप को खारिज करने में जुटी हुई है। कुछ ने अपनी गाड़ियों से संबंधित खराबी के लिए ई-20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराते हुए सोशल मीडिया पोस्ट डाली तो उन्हें धमकियां दी र्गइं और डराया गया। स्थिति यह है कि 2023 से पहले के वाहनों के लिए वाहन निर्माता कम्पनियों ने गाड़ी की वारंटी पीरियड के दौरान ई-20 पेट्रोल से इंजन में खराबी के लिए किसी भी प्रकार से जवाबदेह होने मना कर दिया है। वाहन उपभोक्ता इस स्थिति में चारों ओर से पिस रहा है। एक ओर यह सब एक उपभोक्ता और एक नागरिक के बतौर अधिकार पर हर तरह से हमला है तो दूसरी ओर उधर वाहन उद्योग, हिंदू फासीवादी सरकार, तेल कंपनियां, इंडस्ट्रियल एल्कोहल आयात और निर्माण में लगी कंपनियां सब का यह गठजोड़ खूब लूट-खसोट में व्यस्त है। आखिर हिंदू राष्ट्रवादियों के दौर में राष्ट्रवाद इसी लूट खसोट का दूसरा नाम है।

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