फासीवाद

कैसा राष्ट्रवाद? किसका राष्ट्रवाद?

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आज यह स्थापित बात है कि भारत के हिन्दू फासीवादियों ने आजादी की लड़ाई में क्रूर, धूर्त व अत्याचारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खुले व छिपे ढंग से समर्थन किया था। ये आजादी की लड़ाई से दूर-दूर रहे। और उन सामंती, राजाओं की गोद में बैठकर ऊंघते-सोते रहे जो अंग्रेजों के पिट्ठू, दलाल व लठैत थे। हेडगेवार, गोलवलकर आदि को अपने घृणित हिन्दू साम्प्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए पैसा व अन्य संसाधन राजा-महाराजाओं, जमींदारों, सूदखोरों व अंग्रेजों के चाकर व्यापारियों से ही आता था।

एन आर सी, हिंदू फासीवाद और मणिपुर

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असम के बाद एन आर सी का मुद्दा मणिपुर में गहराता जा रहा है। असम में 1300 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद 19 लाख नागरिक और उनके बच्चे अपने ही देश में शरणार्थी या अवैध प्रवासी बन

पश्चिम बंगाल में भाजपाइयों का आतंक

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एक जुलाई को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में महुआ मोइत्रा के स्थानीय ट्रांजिट पार्टी कार्यालय पर हमला हुआ। यह कार्यालय राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित है जहां संघी भाजप

बंगाल: हिंसा-तांडव से नई प्रयोगशाला बनाते संघी

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पश्चिम बंगाल में जबसे भाजपा सत्तासीन हुई है उसने हिंसा-तांडव का जो नंगा नाच शुरू किया है उसके आगे तृणमूल शासन व माकपा शासन की सारी गुण्डागर्दी छोटी पड़ गयी है। संघ-भाजपा अ

नागरिकता और हिंदू फासीवादी

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विशेष गहन पुनर्रीक्षण को थोपने और इसके जरिए मनमानी करने के बाद हिंदू फासीवादी अब नागरिकता के परीक्षण के लिए हालात बना रहे हैं। 
    

गुंडा विधेयक: बंगाल में दमन के नए हथकंडे अपनाती सरकार

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पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार बंगाल को हिन्दुत्व की नई प्रयोगशाला बनाने पर उतारू है। इसी मकसद से 29 जून को विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि

युवाओं के आक्रोश से दहला पाटलिपुत्र स्टेशन

भारत में पढ़े-लिखे युवाओं में बेकारी की समस्या विस्फोटक स्तर तक बढ़ चुकी है। छात्रों-युवाओं की रोजगार को लेकर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। इस बेचैनी का एक नमूना बीते दिनों

मोदी की नार्वे यात्रा

भारत के प्रधानमंत्री मोदी की नार्वे यात्रा काफी चर्चित रही। इस अचानक की गयी यात्रा के उद्देश्य और वहां नार्वे की पत्रकार के प्रश्न पर मोदी की चुप्पी दोनों चर्चा में रहे।

हिंदू फासीवादियों के मनमुताबिक कोर्ट का फैसला

अंततः वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। विशेष गहन पुनरीक्षण संवैधानिक है या नहीं, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पिछले साल लगी थी। यह मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जोयमाला ब

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।