आखिर काकरोच सरदारों ने अपनी विचारधारा और अपना लक्ष्य घोषित कर दिया। उनके अनुसार काकरोच जनता पार्टी एक समाजवादी जनतांत्रिक मोर्चा है जो पांच लक्ष्यों को हासिल करने के लिए समाज में दबाव समूह या प्रेशर ग्रुप की तरह काम करेगा। ये पांच लक्ष्य हैः न्यायपालिका की निष्पक्षता सुनिश्चित करना, जनतांत्रिक जवाबदेही, महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में तुरंत 55 प्रतिशत आरक्षण, समयबद्ध मतदाता सूची को ठीक करना और अगली पीढ़ी का सशक्तीकरण। इनके अनुसार गांधी, अंबेडकर और नेहरू इनके आदर्श हैं। गांधी से वे शांति, अहिंसा व सत्याग्रह सीखते हैं। अंबेडकर से वे सामाजिक न्याय, बराबरी और हाशिये के लोगों के लिए संघर्ष की प्रेरणा लेते हैं। नेहरू से वे एक आधुनिक, धर्म-निरपेक्ष व विकसित भारत का सपना ग्रहण करते हैं।
अपने घोषणा पत्र में अपनी इस घोषणा से काकरोच सरदारों ने खुद को भारतीय राजनीति के वर्णक्रम में केन्द्र से कुछ वाम की ओर अवस्थित किया है। यह जगह योगेन्द्र यादव जैसे लोगों की जगह है। ऐसा करके उन्होंने खुद को आम आदमी पार्टी से कुछ अलग दिखाने का भी प्रयास किया है। उन पर अक्सर आम आदमी पार्टी से जुड़े होने का आरोप लगता रहा है। उनकी इस समय की कोर टीम के बारह लोगों में से चार-पांच उस पार्टी से जुड़े रहे हैं, वह भी ठीक-ठाक पदों पर।
उनकी मांगों या लक्ष्यों से उजागर होने वाले उनके चरित्र पर बात करने के पहले एक तथ्य पर बात कर लेना फायदेमंद होगा। कई लोगों ने यह इंगित किया है कि इनकी कोर टीम के सारे ही बारह लोग काकरोच नहीं हैं। इनमें से कोई भी ‘नाकारा’, ‘नाकाबिल’ बेरोजगार युवक या युवती नहीं है। ये खासे-पढ़े-लिखे और समाज में सफल लोग हैं। यानी ये उस अर्थ में काकरोच नहीं हैं जिस अर्थ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था। समाज की नजर में ये काकरोच नहीं बल्कि समाज की ‘क्रीम’ हैं। इसी आधार पर कुछ आलोचक इन्हें काकरोचों के सरदार की भूमिका लायक नहीं समझते। इनके अनुसार काकरोच सरदारों को स्वयं भी काकरोच ही होना चाहिए। इन आलोचकों के अनुसार ये ‘क्रीमी’ सरदार काकरोचों का फायदा उठायेंगे और एक दिन केजरीवाल एण्ड कंपनी की तरह सत्ता की कुर्सी पर काबिज होकर ऐश करेंगे। काकरोच जस का तस रह जायेंगे। पन्द्रह साल बाद 2011 फिर दोहराया जायेगा।
इस तरह के आलोचकों का शंकालु या छिद्रान्वेषी होना जायज है। इस देश ने पिछले पचास सालों में कई बार ‘व्यवस्था में सुधार’, ‘व्यवस्था परिवर्तन’, ‘दूसरी आजादी’, ‘भ्रष्टाचार का खात्मा’ इत्यादि के आंदोलन देखे हैं। 1974-75, 1988-89 व 2011-12 में इसे पहले ही देखा जा चुका है। हर बार पाया गया कि पैगंबर झूठे या धोखेबाज थे और हालात बद से बदतर होते गये। धोखेबाज पैगंबरों का कद भी बौना होता गया- जय प्रकाश नारायण, वी पी सिंह और केजरीवाल। अब यह चैथी बार हो रहा है। अब छिद्रान्वेषी यदि त्रासदी और प्रहसन से आगे बढ़कर चुटकुले की बात करें तो बहुत नाइंसाफी नहीं होगी। वैसे भी सी जे पी की शुरूआत इंटरनेटी चुटकुले से ही हुई थी। उन्होंने स्वयं ही कहा है कि वे इंटरनेटी भदेस मजाक से आगे बढ़कर अब गंभीर जमीनी समाजवादी जनतांत्रिक मोर्चा बन गये हैं।
छिद्रान्वेषियों और शंकालुओं से आगे बढ़कर बात करें तो स्वयं काकरोच सरदारों की बातें कोई आश्वस्ति पैदा नहीं करतीं। बल्कि उनकी मांगों पर एक नजर डालते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि या तो उन्हें पूंजीवादी राजनीति की जरा भी समझ नहीं हैं या फिर वे इस पूंजीवादी व्यवस्था को लेकर उसी तरह के विभ्रम के शिकार हैं जिस तरह व्यवस्था के भलेमानस होते हैं। वे केजरीवाल एंड कंपनी की तरह कुटिल हैं, इस विकल्प को फिलहाल छोड़ देते हैं।
वे सोचते हैं कि यदि देश के न्यायाधीश निष्पक्ष हो जायें, चुनाव आयोग निष्पक्ष हो जाये, महिलाओं को संसद व विधानसभाओं में आधे से ज्यादा सीटें मिल जायें, मतदाता सूची ठीक हो जाये और छात्र-छात्राओं को जनतांत्रिक जवाबदेही के बारे में स्कूल में पाठ पढ़ा दिया जाये तो सब ठीक हो जायेगा। इनकी मासूमियत पर गालिब का प्रसिद्ध शेर याद आता है। ये इतने मासूम हैं कि तहे दिल से यूएपीए कानून का समर्थन करते हैं और चुनाव आयुक्तों को इसके तहत जेल में डालने की बात करते हैं।
कुल मिलाकर कुछ सख्त कानून, कुछ चुनावी सुधार तथा कुछ पाठ इस सड़ी-गली व्यवस्था की सारी समस्याओं को दूर कर देंगे।
ये भले मानस यदि अपने से यह सीधा सा सवाल करते कि इनके आदर्श अंबेडकर-नेहरू के जमाने से भारत आज मोदी-योगी के राज तक पहुंचा कैसे तो शायद वे अपने नुस्खों पर इस कदर भरोसा नहीं करते। पर इस तरह के लोगों में इस तरह के सवाल करने की क्षमता ही नहीं होती। यदि कभी इस सवाल से उनका सामना हो तो वे कुछ व्यक्तियों को दोष देकर या कानूनों के अभाव का हवाला देकर अपने को संतुष्ट कर लेंगे।
पर गलती इन राजनीतिक दुधमुंहों की नहीं है। तीन महीने पहले इन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें इस तरह के राजनीतिक सवालों का सामना करना पड़ेगा। वे तो समाज के आम पढ़े-लिखे मध्यमवर्गीय या उच्च मध्यमवर्गीय युवक-युवती थे। वे राजनीति के बारे में वही भाव रखते थे जो समाज में आम हैं। और ये भाव क्या हैं? हिन्दू फासीवादी या फिर उदारवादी व वाम-उदारवादी। काकरोच सरदार उदारवादी या वाम-उदारवादी विचारों वाले लोग हैं। अपने उदारवादी या वाम-उदारवादी भावों को जब उन्होंने शब्दों में प्रकट किया तो वे उन्हीं पांच मांगों में अभिव्यक्त हुए।
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता। कि इस समाज में लोगों को पद के पीछे भागने और सत्ताधारियों के सामने नाक रगड़ने से नहीं रोका जा सकता। कि महिलाएं भी शासक के तौर पर पुरुषों की तरह ही क्रूर व भ्रष्ट हो सकती हैं। कि इस समाज में जनतांत्रिक जवाबदेही से निपटने के लिए पैसे के पास बहुत से रास्ते हैं। इसलिए यदि कभी काकरोच सरदारों की पांचों मांगें मान भी ली जायें तो पैसे की इस व्यवस्था का कुछ खास नहीं बिगड़ेगा। बहुत जल्दी ही पैसा अपना रास्ता ढूंढ लेगा।
काकरोच सरदार खुद को समाजवादी जनतांत्रिक कहते हैं। आखिर उन्होंने अपने मोर्चे को यही नाम दिया है। पर लगता नहीं कि उन्हें समाजवाद का क ख ग भी पता है। उनकी पांचों मांगें जनतंत्र से तो संबंध रखती हैं पर समाजवाद से जरा भी नहीं। समाजवाद किसी न किसी रूप में सम्पत्ति के ज्यादा बराबर या न्याय संगत बंटवारे की मांग करता है। वैज्ञानिक समाजवाद तो निजी सम्पत्ति के खात्मे की ही बात करता है। पर काकरोच सरदार इस संबंध में कोई बात नहीं करते। अंबेडकर और नेहरू का हवाला भी इस दिशा में कोई संकेत नहीं करता। ऐसे में उनका ‘समाजवादी’ होना बस उसी तरह भावनात्मक है जैसे इस देश में बहुत सारे समाजवादी हैं। बहुत छूट देकर बात की जाये तो ये लोग किसी किस्म के कल्याणकारी राज्य के समर्थक हो सकते हैं।
अस्तु, यदि काकरोच सरदारों को कुटिल के बदले मासूम मान लिया जाये तो भी उनके घोषित विचार यह जरा भी आश्वस्ति नहीं जगाते कि उनके आंदोलन से देश की मजदूर-मेहनतकश जनता का या छात्र-युवा आबादी का कुछ भला होगा। तब क्या फिर उनके आंदोलन को एकदम नकारात्मक मान लिया जाये? उससे दूरी बना ली जाये?
इस संबंध में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहला तो यह कि उनकी बातें और उनका आंदोलन छात्र-युवा आबादी में व्याप्त गहरे असंतोष और आक्रोश को अभिव्यक्त करता है। आखिर लाखों लोग यूं ही नहीं उनसे जुड़ गये। दूसरा यह कि काकरोच सरदारों के प्रयास के बावजूद यह आंदोलन मूलतः स्वतः स्फूर्त है। इस पर उनकी उस तरह पकड़ नहीं है, जैसे ‘अन्ना आंदोलन’ में केजरीवाल एंड कंपनी की थी।
यह स्थिति क्रांतिकारियों के लिए संभावना और अवसर दोनों प्रदान करती है। लंबे समय से छात्र-युवा आबादी में संचित हो रहा असंतोष-आक्रोश अब भांति-भांति के तरीके से फूट रहा है। इस आंदोलन मंे भी यही हो रहा है। यह छात्र-युवा आबादी को क्रांतिकारी ढंग से लामबंद करने की संभावना पैदा करता है। छात्र-युवा आबादी पहले से कहीं ज्यादा अब क्रांतिकारी विचारों को सुनने व ग्रहण करने को तैयार है। आंदोलन में छात्रों-युवाओं की भागीदारी उनकी लामबंदी के लिए बहुत सुगम अवसर प्रदान करती है। एक-दो के बदले सैकड़ों-हजारों छात्र-युवा गोलबंद होने के लिए सड़क पर होते हैं। काकरोच सरदारों को देखते ही देखते सैकड़ों जमीनी कार्यकर्ता और हजारों सदस्य मिल गये हैं। आम अनुयाईयों की संख्या तो लाखों में है।
क्रांतिकारियों को इस आंदोलन में हर संभव तरह से पैठ बनाकर अपनी बात पहुंचानी चाहिए और ज्यादा आगे बढ़े हुए तत्वों को अपने साथ खड़ा करना चाहिए। जहां संभव हो, आंदोलन का नेतृत्व भी अपने हाथ में लेने का प्रयास करना चाहिए। फिलहाल आंदोलन पर काकरोच सरदारों की एकदम ढीली पकड़ इसके लिए अवसर प्रदान करती है।
क्रांतिकारियों के लिए भी वैचारिक-सांगठनिक जड़ता कई बार भारी मुश्किल पैदा करती है। उनकी वैचारिक-सांगठनिक ताकत ही उनकी कमजोरी बन जाती है। जनता के स्वतः स्फूर्त आंदोलनों के समय अक्सर यह देखने को मिलता है। यह तब और होता है जब इन आंदोलनों में संदिग्ध किस्म के लोग नेतृत्व करने लगते हों।
ऐसे में जन-उभार के वास्तविक चरित्र को पहचानना और तद्नुरूप उसमें हस्तक्षेप करना अत्यन्त जरूरी हो जाता है। विरक्ति और प्रवाह में बह जाना दोनों ही ऐसी अवस्था मंे त्याज्य है। नेतृत्व के संदिग्ध चरित्र या स्पष्ट जन विरोधी चरित्र के बावजूद जन-उभारों में तत्परता के साथ हस्तक्षेप किया जाना चाहिए व उसे सही दिशा में मोड़़ने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए। केवल इसी तरह से क्रांतिकारी व्यापक जन में पैठ बना सकते हैं और उसे क्रांतिकारी ढंग से लामबंद कर सकते हैं।