मोदी सरकार आये दिन भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी विकास दर के कसीदे गढ़ती है। कहा जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। और बस चंद साल ही बचे हैं जब भारत दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था (स.रा.अमेरिका व चीन के बाद) बन जायेगा।
ऐसी बातों के बीच एक खबर ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ में छपती है जो कहती है, ‘‘एच डी एफ सी म्यूच्युल फण्ड की रिपोर्ट बताती है कि तमाम झटकों के बीच भी ग्रोथ की सांस अभी चल रही है’’। (बिजनेस स्टैण्डर्ड 23 जनवरी)
यह कटु स्वीकारोक्ति है। कुछ अप्रचारित तथ्य व सभी की जानकारी में आयी बातें इसकी तस्दीक करती हैं। निम्न तथ्यों पर गौर किया जाए।
* अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई एम एफ) के अनुसार भारत का ऋण- जीडीपी के 80 फीसदी से अधिक है। यानी भारत देशी-विदेशी निजी-सार्वजनिक ऋण के जाल में फंसा हुआ है।
* भारत के राजस्व व्यय का 28 फीसदी वेतन; 15 फीसदी पेंशन; 25 फीसदी मौजूदा ऋण पर ब्याज; 15 फीसदी सब्सिडी व कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है। यानी कर्ज में डूबी भारत सरकार और उसके मंत्रियों-अधिकारियों-फौजी अफसरों-सांसद- विधायकों व कर्मचारियों (घटते) पर भारत के राजस्व का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। भारत के मजदूरों-किसानों के हिस्से जिनकी संख्या करोड़ों में है नाम मात्र का ही हिस्सा आता है। यही कारण है कि भारत की शिक्षा-रोजगार-स्वास्थ्य का इतना बुरा हाल है।
* भारत का माल व्यापार घाटा बढ़ा है।
* विदेशी निवेशक निकासी बढ़ा रहे हैं।
* रुपया डालर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। इस वक्त वह प्रति डालर 91.99 रुपये के स्तर से नीचे गोता लगाने को तैयार है। यानी व्यापार घाटा और महंगाई दोनों बढ़ेंगी।
* भारत के राजस्व में वृद्धि नहीं हो रही है।
* भारत में पारिवारिक बचत में गिरावट आ रही है। अब यह 10 फीसदी से घटकर 7 फीसदी हो गयी है।
* सोने का दाम प्रति दस ग्राम 1 लाख 58 हजार के पार जा चुका है।
उपरोक्त तथ्य यह बतलाने को पर्याप्त है कि मोदी सरकार भारत की अर्थव्यवस्था के विकास, मजबूती और भविष्य के बारे में जो दावे करती है, वे कितने सतही और झूठे हैं।