नये साल की पहली सुबह
जीवन संगिनी ने लम्बी उम्र की कामना की
मैं अल-सुबह सैर पर निकला,
बादलों के टुकड़ों से झांकते
तारों से मुलाकात की
पहाड़ों पर टिम-टिमाती रोशनी को निहारा,
आजाद पंछियों के मधुर गीत को सुना।
सड़कों से गुजरा,
अल सुबह मजदूरों को काम पर जाते देखा
गृहणियों को घर बुहारते देखा।
और उस दुकानदारिन को देखा,
जो रोज सुबह गर्म चाय से ग्राहकों का स्वागत करती है,
खास बात है, उसके आलू के गुटके
जो महका देते हैं, पूरी सड़क को मसालों की खुशबू से।
ट्रक-ट्राली दौड़ाते, ड्राइवरों को देखा
और देखा, कैसे कोई बीन रहा है, बीती रात के अवशेष
जवान पति के बोरे में कागज के गत्ते,
और उसकी संगनि के बोरे में खाली बोतलें।
गहमागहमी से भरी थी सुबह,
फासिस्टों ने निकाली सुबह-सुबह परेड
मानो कह रहे हों, ये साल तो हम निगल जायेंगे।
कौतुहल से भरे लोगों ने परेड का उड़ाया मजाक
कोई बोल उठा, पैदा होते हैं यहां बलात्कारी
अनायास अंकिता भण्डारी का चेहरा घूमा
इनका पूरा इतिहास खुल गया
देशद्रोही, राष्ट्रवादी बन गये
बलात्कारी, संस्कारी बन गये
हत्यारे, मसीहा बन गये।
अभी सुबह बाकी है,
नये साल का पूरा दिन है,
बधाईयों के तांते का इंतजार है।
और चाहत है,
जल्द से जल्द बीते, मजदूर-मेहनतकशों का बुरा वक्त
मेरे जेब में हैं,
बच्चों के लिए टाफियां और चाकलेट
ढूंढ रहा हूं उन्हें, उनका प्यारा तोहफा देने के लिए।
(साभार : कविता संग्रह ‘वक्त-वक्त की बात है’)