तुम्हारी उस मुस्कुराहट पर
जो तुम ‘संधि-पत्र’ (ज्तमंजल) पर हस्ताक्षर करते वक्त
कैमरों को दिखा रहे थे।
इतिहास गवाह है-
व्यापारी जब भी ‘दाता’ बनकर आए हैं
वे अपने जहाजों में
मसाले नहीं, हमारी आजादी भरकर ले गए हैं।
तुम कहते हो-
यह डील मेरे खेतों को ‘स्मार्ट’ बनाएगी
पर मुझे शक है तुम्हारी परिभाषाओं पर।
कहीं ऐसा तो नहीं?
कि ‘स्मार्ट’ होने की पहली शर्त यह हो
कि मुझे अपनी ही ज़मीन पर ‘गूंगा’ होना पड़े?
तुम्हारे इन रंगीन विज्ञापनों में
हंसता हुआ जो किसान दिखता है
उसकी आंखों में चमक नहीं, एक डर है।
डर इस बात का-
कि जो बीज तुमने लेबोरेटरी में बनाया है
वह मेरे खेत की मिट्टी को पहचानता भी है?
या वह एक ‘विदेशी जासूस’ है
जो धीरे-धीरे मेरी जमीन की उर्वरता (थ्मतजपसपजल) चुरा लेगा?
मुझे शक है
कि तुम्हारी यह ‘फूड सिक्योरिटी’
असल में ‘फूड कंट्रोल’ का षड्यंत्र है।
क्योंकि जिस दिन मेरा बीज खत्म होगा
जिस दिन मेरा देसी खाद ‘अवैध’ होगा
उस दिन मेरी भूख का रिमोट
तुम्हारे वातानुकूलित दफ्तर में होगा।
यह समझौता नहीं, एक छलावा है।
इसमें लिखा है कि तुम जोखिम उठाओगे
पर बारीक अक्षरों (थ्पदम चतपदज) में यह भी लिखा है-
कि अगर प्रकृति रूठ गई
तो हरजाना तुमसे नहीं, मेरी अगली नस्लों से वसूला जाएगा।
मुझे शक है
कि तुम मेरी फसल खरीदना नहीं चाहते
तुम बस यह चाहते हो
कि मैं हार मान लूं
और अपनी जमीन तुम्हारे ‘वेयरहाउस’ के लिए छोड़ दूं।
मारे जाएंगे हम सब
अगर हमने यह नहीं पूछा-
कि सात समंदर पार बैठा वह सूट-बूट वाला आदमी
मेरे फटे जूतों की चिंता अचानक क्यों करने लगा है?
साभार : फेसबुक पेज किसान से