प्रशांत भूषण का ‘अफसोस’ और वाम-उदारवादियों का राजनीतिक दिवालियापन

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:16
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गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट किया। ट्वीट का सार यह था कि वह (मनमोहन सिंह) एक सादगी पसंद, सज्जन और पढ़े-लिखे व्यक्ति थे जिनकी विनम्रता और शिष्टता को उनकी कमजोरी समझा गया। और कि प्रशांत भूषण को अफसोस है कि वह एक ऐसे आंदोलन (अन्ना आंदोलन) का हिस्सा थे, जिसने मनमोहन सिंह को अपमानित किया और एक दुष्ट सरकार (मोदी सरकार) को सत्ता तक पहुंचने में मदद पहुंचायी।
    
प्रशांत भूषण के इस ट्वीट के बाद बहुत से उदारवादी अथवा वाम-उदारवादी स्वतंत्र पत्रकार व बुद्धिजीवी उनका साक्षात्कार लेने पहुंच गये या इस संदर्भ में कार्यक्रम करने लगे या लेख लिखने लगे। कुल मिलाकर, प्रशांत भूषण के ट्वीट के बाद अन्ना आंदोलन, यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार, मनमोहन सिंह की छवि, नरेन्द्र मोदी-संघ-भाजपा का उभार और देश में हालिया साम्प्रदायिक फासीवादी माहौल, आदि पर चर्चा छिड़ गयी।
    
अप्रैल, 2011 में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चले ‘अन्ना आंदोलन’ को लेकर तब बहुत से लोगों को भ्रम थे। किन्तु आज उसका कोई नाम लेना भी पसंद नहीं करता। खासकर सकारात्मक अर्थों में। यहां तक कि भाजपा और आम आदमी पार्टी भी उस आंदोलन का जिक्र नहीं करती हैं, जिन्हें इससे सबसे अधिक राजनीतिक लाभ पहुंचा।
    
‘अन्ना आंदोलन’ में भ्रष्टाचार बस एक मुद्दा था। वह उस आंदोलन का उद्देश्य नहीं था। अलग-अलग ताकतें और लोग अपने स्वतंत्र उद्देश्यों के लिए एक सिद्धान्तहीन-अवसरवादी मंच पर एक साथ आये थे। आंदोलन का एक ही उद्देश्य था, तत्कालीन सरकार की साख गिराना और फिर जो ‘रिक्तता’ पैदा होगी उसमें स्वयं के लिए राजनीतिक अवसर तलाश करना।
    
इस सबमें जो सबसे अधिक अर्थहीन तत्व था वह था स्वयं अन्ना हजारे। अन्ना हजारे इस आंदोलन में महज एक सर्वमान्य कठपुतलीनुमा चेहरा था। आंदोलन के बाद वह वहीं और उसी स्थिति में पहुंच गया जहां वह पहले था। पहले भी एक बहुत छोटे से क्षेत्र से बाहर उसे कोई नहीं जानता था और आज भी उस क्षेत्र से बाहर वह किसी को याद नहीं है।
    
इस आंदोलन का सबसे ज्यादा लाभ संघ-भाजपा और अरविन्द केजरीवाल (आम आदमी पार्टी) को पहुंचा। 2014 में संघ-भाजपा ने केन्द्र में कांग्रेसनीत यूपीए को नगण्य स्थिति में पहुंचाकर सत्ता कब्जा ली। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में शीला दीक्षित की कांग्रेस सरकार की वही हालत कर अपनी सरकार बना ली। आंदोलन में व्यक्तिगत हैसियत से शामिल कुछ लोग ‘आप पार्टी’ में चले गये और किरन बेदी, शाजिया इल्मी जैसे कुछ लोग भाजपा में सीधे चले गये अथवा कुमार विश्वास की तरह मोदी के चाटुकार बन गये।  
    
इस आंदोलन के बाद अन्ना हजारे के अलावा अगर किसी और की भी दुर्गति हुई तो वे थे वाम-उदारवादी। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव आदि जिनके प्रतिनिधिक उदाहरण हैं। वे या तो प्रशांत भूषण की तरह ‘अफसोस’ जता रहे हैं अथवा योगेन्द्र यादव की तरह वर्तमान के विपक्ष (इंडिया गठबंधन व अन्य) पर अपने दांव खेल रहे हैं। अधिकांश लोग अपने घर बैठ गये हैं, निराश और पस्तहिम्मत होकर।
    
जहां तक क्रांतिकारी शक्तियों की बात है, उनके अधिकांश हिस्से को ‘अन्ना आंदोलन’ को लेकर कोई मुगालता नहीं था। मंच पर तो किसी के लिए भी जगह नहीं थी। भाषण पूरी तरह वर्जित थे। केवल वक्तव्य जारी होते थे। किन्तु क्रांतिकारियों को तो पर्चे तक नहीं बांटने दिये जाते थे। ‘अन्ना आंदोलन’ फासीवादियों के लिए एक प्रयोग था। जहां मंच पर केजरीवाल सरीखे फासीवादियों का कब्जा था वहीं भीतरखाने और जमीन पर संघी-भाजपाई फासीवादियों का बोलबाला था। आंदोलन में भीड़ की व्यवस्था तो प्रमुख रूप से संघी-भाजपाई ही कर रहे थे। रामदेव, श्री श्री रविशंकर आदि तो सीधे संघी एजेन्ट थे। यहां तक कि अन्ना हजारे की संघ-भाजपा से नजदीकी बाद में खुलकर सामने आ गई।
    
प्रशांत भूषण की बात में दो ‘अफसोस’ जताये गये। एक तो मनमोहन सिंह जैसे ‘भले मानुष’ की लानत-मलामत हुई। दूसरा नरेन्द्र मोदी के रूप में ‘एक दुष्ट सरकार’ केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गयी।
    
पहले मनमोहन सिंह वाले ‘अफसोस’ को लिया जाये। राजनीति में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई ‘मृदुभाषी’ है या ‘कटुभाषी’ है; व्यक्तिगत तौर पर कोई ईमानदार है या भ्रष्ट; नामी विश्वविद्यालयों से पढ़ा हुआ है या अंगूठाछाप है। राजनीति में निर्णायक यही बात है कि कोई व्यक्ति किस वर्ग की सेवा करता है। निश्चित तौर पर कोई भ्रष्ट व्यक्ति मजदूर वर्ग का सेवक नहीं हो सकता लेकिन मनमोहन सिंह सरीखे ‘ईमानदार’ व्यक्ति भी कोई मजदूर वर्ग के सेवक नहीं थे।
    
मनमोहन सिंह उदारीकरण-निजीकरण- वैश्वीकरण की नीतियों के भारत में प्रस्तोता और लागू करने वाले सर्वप्रथम प्रमुख व्यक्तियों में से थे। आर्थिक क्षेत्र में लागू की गयी एल.पी.जी. की इन्हीं नीतियों का एक परिणाम भारत में राजनीति का दक्षिणपंथ व फासीवाद की ओर झुकाव है। एल.पी.जी. की नीतियों ने भारत में ‘सामाजिक कल्याणकारी राज्य’ की नींव को खोद डाला। पहले की नाम मात्र की सामाजिक सुविधाओं के प्राप्तकर्ता ‘अधिकार सम्पन्न जन’ आज सरकार के रहमोकरम पर पलने वाले ‘लाभार्थीजन’ बना दिये गये। ट्रेड यूनियनों और ट्रेड यूनियन आंदोलनों को इस हद तक कमजोर कर दिया गया कि आज ट्रेड यूनियन बनाना अघोषित तौर पर ‘गैर-कानूनी’ कृत्य की श्रेणी में पहुंचा दिया गया है। तमाम सरकारी संस्थान धन्नासेठों को बेच डाले गये और भारत के श्रमिक व भारत का बाजार पूरी तरह से देशी-विदेशी पूंजीपतियों को खुली लूट करने के लिए परोस दिया गया।
    
आखिर मनमोहन सिंह ने सत्ता में रहते हुए किसकी सेवा की। देशी-विदेशी एकाधिकारी घरानों की। टाटा-बिड़ला-अम्बानी और आज के अडाणी वर्तमान में जितने बड़े एकाधिकारी पूंजीपति बन चुके हैं, इसका रास्ता मनमोहन सिंह की एल.पी.जी. नीतियों ने ही साफ किया था। इसलिए इनकी ‘मृदुभाषिता’ ‘पढ़ा-लिखापन’ व ‘ईमानदारी’ टाटा-बिडला-अम्बानी-अडाणी के लिए ही लाभप्रद सिद्ध हुई। मजदूरों-मेहनतकशों के लिए तो यह एक अभिशाप ही रही। और इसके लिए मनमोहन सिंह की जितनी लानत-मलामत की जाये उतनी कम है।
    
अब आते हैं प्रशांत भूषण के दूसरे ‘अफसोस’ पर। यानी ‘अन्ना आंदोलन’ के बाद मोदी सरकार के रूप में एक ‘दुष्ट सरकार’ का केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो जाना। अपने एक साक्षात्कार में प्रशांत भूषण कहते हैं कि वर्तमान की भाजपा सरकार एक साम्प्रदायिक फासीवादी सरकार है, जो भारत के सामाजिक ताने-बाने और संविधान को गम्भीर नुकसान पहुंचाते हुए नष्ट करने की तरफ बढ़ रही है। और कि उन्हें अफसोस है कि वे एक ऐसे आंदोलन का हिस्सा बने जिसने ऐसी सरकार बनने में सहायता पहुंचाई।
    
इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार साम्प्रदायिक-फासीवादी सरकार है और भारत के सामाजिक ताने-बाने और संविधान को नष्ट करने की तरफ बढ़ रही है। लेकिन प्रशांत भूषण या किसी को भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि ‘अन्ना आंदोलन’ की वजह से ही मोदी केन्द्र की सत्ता तक पहुंचा। नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग, भाजपा व आर.एस.एस. के बीच बने गठजोड़ का नतीजा है। यहां तक कि मोदी के नाम पर आर.एस.एस. व भाजपा में आम सहमति बनाने में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की ही महत्वपूर्ण भूमिका रही। 2010-11 के बाद से ही एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग कांग्रेस से हटकर नरेन्द्र मोदी और भाजपा की तरफ झुकने लगा था। भाजपा के लिए पूंजीपतियों ने अपनी तिजोरियां खोल दीं। नरेन्द्र मोदी की ‘ब्रांडिंग’ की जाने लगी। ‘गुजरात माडल’ की बात आम हो गयी। पूंजीवादी मीडिया दिन-रात कांग्रेस सरकार की बखिया उधेड़ने और नरेन्द्र मोदी के महिमामंडन में लग गया। ‘अन्ना आंदोलन’ की इस सबमें सीमित और छोटी भूमिका है। यह आंदोलन न भी हुआ होता तब भी पूंजीपति वर्ग और भाजपा का गठजोड़ कांग्रेस सरकार की साख गिरा सकता था और वे ऐसा कर भी रहे थे। दो-तीन साल तक हर माध्यम से तत्कालीन कांग्रेस सरकार की साख गिराने का काम चल रहा था। उस सरकार का जाना और नरेन्द्र मोदी का सत्ता में आना तय हो चुका था। यह चीज एक ‘अन्ना आंदोलन’ की मोहताज नहीं थी।
    
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने कांग्रेस को छोड़ फासीवादी संघ-भाजपा से गठजोड़ क्यों किया?
    
लगभग ढाई दशक की उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के दम पर फल-फूल कर मोटे हुए एकाधिकारी पूंजीपतियों को और अमीर बनने के लिए अब और भी ज्यादा ‘आर्थिक सुधारों’ की आवश्यकता थी। पूंजीपतियों की इस चाहत के रास्ते में प्रमुख रूप से दो राजनीतिक बाधायें थीं। पहली, दूसरे चरण के तीव्र आर्थिक सुधारों को लागू करने की पूंजीपतियों की मांग तेजी से पूरा करने में कांग्रेस हिचक रही थी जबकि भारत के पूंजीपति सभी प्राकृतिक संसाधनों, अर्थव्यवस्था के हर छोटे-बड़े क्षेत्र और श्रम-शक्ति की सम्पूर्ण व बिना सरकारी रोक-टोक की लूट की क्षमता अपने हाथ में चाहते थे। दूसरी चुनौती जनता की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया से निपटने की थी। लगभग ढाई दशक से लागू ‘नई आर्थिक नीतियों’ ने पहले से ही आम मजदूरों-मेहनतकशों-किसानों की हालत खराब कर दी थी। ऐसे में और अधिक आर्थिक सुधार उनमें गम्भीर आक्रोश पैदा करता। उपरोक्त परिस्थितियों में नरेन्द्र मोदी व संघ-भाजपा की नीतियां व राजनीति भारत के पूंजीपति वर्ग के लिए एकदम मुफीद थी।
    
संघ-भाजपा हमेशा से ‘कल्याणकारी राज्य’ की नीतियों के बजाय खुले-नंगे पूंजीवाद के पैरोकार रहे हैं। आम तौर पर भी राजनीति में ‘कल्याणकारी राज्य’ मजदूर वर्ग और समाजवाद से मिल रही चुनौती के सामने मजबूरी के रूप में ही अंगीकार किया गया था। नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल से एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग को पूर्ण आश्वस्त कर दिया था कि उसके शासन में उन्हें लूट की खुली छूट होगी। टाटा की नैनो कार के प्रोजेक्ट का बंगाल से गुजरात पहुंचना इस आश्वस्ति का संकेत था और आज अम्बानी-अडाणी की अकूत सम्पदा इस आश्वस्ति पर मुहर के समान है।
    
नरेन्द्र मोदी और संघ-भाजपा की हिन्दुत्ववादी-साम्प्रदायिक राजनीति एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की दूसरी उलझन का समाधान प्रदान करती थी। गुजरात दंगों के बाद से ही भारत के अंदर साम्प्रदायिक सोच रखने वाले लोगों के लिए मोदी हिन्दुत्व का सबसे बड़ा चेहरा था। यहां ध्यान रखना होगा कि 2014 के चुनाव से पहले मोदी की ‘विकास-पुरुष’ वाली ब्रांडिंग ही नहीं हो रही थी, बल्कि भाजपा द्वारा देश का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण भी किया जा रहा था। 2013 के मुजफ्फरनगर के दंगे इसका सबसे बड़ा उदाहरण थे। समय के साथ देश का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का काम संघ-भाजपा ने तीव्र से तीव्रतर कर दिया। आज राजनीतिक क्षेत्र में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण संघ-भाजपा का एकमात्र काम और सत्ता में टिके रहने का औजार बन गया है। बाकी प्रशासनिक तौर-तरीके व जालसाजियां-हथकंडे अन्य औजार हैं। अपनी इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की ताकत से संघ-भाजपा ने बदहाल होती मेहनतकश जनता की व्यापक राष्ट्रव्यापी गोलबंदी को होने से रोक कर रखा हुआ है। और देश का पूंजीपति वर्ग 2014 के बाद जो कुछ चाहता था, वह हासिल कर पा रहा है। दर्जनों कानून उसके हित में बदले जा चुके हैं, प्राकृतिक संसाधनों की लूट की नंगी छूट उसे मिली हुई है; खुदरा व्यापार, कृषि, परमाणु ऊर्जा, रक्षा उद्योग, बीमा, अंतरिक्ष उद्योग आदि नये क्षेत्र अब उन्हें मुनाफा लूटने के लिए उपलब्ध हैं। तबाह-बर्बाद होती जनता साम्प्रदायिक उन्माद, राम मंदिर, धारा-370, समान नागरिक संहिता, आदि-आदि के नशे में चूर अपने वास्तविक मुद्दे और एकजुटता को भुलाए बैठी है। भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और संघ-भाजपा का गठजोड़ फिलवक्त इस प्रकार कामयाब है।
    
गौर से देखें तो पूंजीपतियों और संघ-भाजपा के इस गठजोड़ और नरेन्द्र मोदी की ‘एक दुष्ट सरकार’ के आने में प्रशांत भूषण जैसों की भूमिका तो बहुत छोटी है, लेकिन मनमोहन सिंह व कांग्रेस की नीतियों व व्यवहार की भूमिका बहुत बड़ी है। प्रशांत भूषण से कहीं ज्यादा वे इस ‘दुष्ट सरकार’ के लिए जिम्मेदार हैं। किन्तु वाम-उदारवादियों का राजनीतिक दिवालियापन उन्हें कभी भी परिदृश्य को उसके सम्पूर्ण रूप में देखने नहीं देता। वे पूरे पेड़ को न देखकर बस पत्ते ही निहारते रहते हैं।
    
कुछ वाम-उदारवादी ऐसे भी थे, जो मोदी और संघ-भाजपा के उभार के प्रति सचेत थे। और केवल इसी वजह से कांग्रेस सरकार की प्रत्येक आलोचना को संघ-भाजपा को बढ़ावा देने के रूप में देखते थे। इनके राजनीतिक दिवालियेपन का आलम यह था कि वे भाजपा-संघ वाली ‘बड़ी बुराई’ की तुलना में कांग्रेस की ‘छोटी बुराई’ को सहते रहने की वकालत करते थे। आज तो ऐसे उदारवादियों-वाम उदारवादियों का कुनबा और भी बहुत बड़ा हो गया है। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, रवीश कुमार, ध्रुव राठी, कुणाल कामरा, आदि इस कुनबे के प्रतिनिधि हैं। इन्हें राहुल गांधी या कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों से कोई खास उम्मीद नहीं है, तब भी ये लोग मौजूदा ‘दुष्ट सरकार’ के विकल्प के तौर पर इन्हें ही देखते हैं।
    
हेगेल का प्रसिद्ध कथन है कि ‘इतिहास स्वयं को दोहराता है’। मजदूर वर्ग के शिक्षक कार्ल मार्क्स ने इसमें सही ही जोड़ा था कि इतिहास स्वयं को दोहराता है किन्तु पहले त्रासदी के रूप में और फिर प्रहसन के रूप में। भारत के उदारवादियों-वाम उदारवादियों-लोहियावादियों-रंग-बिरंगे समाजवादियों के लिए उपरोक्त कथन सटीक बैठता है। 70 के दशक में चले ‘जे पी आंदोलन’ और 1977-79 की जनता सरकार में समाजवादियों-लोहियावादियों- उदारवादियों ने इंदिरा गांधी व कांग्रेस के खिलाफ संघ-जनसंघ के साथ गठजोड़ कायम किया था, आंदोलन व सरकार तो कुछ समय में सिमट गये किन्तु जनसंघ/भाजपा व संघ के अतिरिक्त तमाम समाजवादी दल मजबूत होकर निकले। बहुत से राज्यों में काफी समय तक उनकी सरकारें चलीं। भाजपा ने विकास किया, किन्तु सीमित ही क्योंकि उस समय पूंजीपति वर्ग का वरदहस्त उसे हासिल न था।
    
2011-12 में समाजवादी-उदारवादी-वाम उदारवादी बुद्धिजीवियों व कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर संघ-भाजपा के साथ कांग्रेस के खिलाफ गठजोड़ कर मुहिम चलाई। लेकिन इस बार स्थितियां भिन्न थीं। भाजपा-संघ-मोदी को पूंजीपति वर्ग का वरदहस्त हासिल था। नतीजा यह हुआ कि संघ-भाजपा ही सर्वशक्तिशाली बनकर उभरी। थोड़ा बहुत फायदा केजरीवाल एंड पार्टी को मिला। बाकी सारे उदारवादी-वाम उदारवादी प्रहसन बनकर रह गये और अब ‘अफसोस’ करते घूम रहे हैं। 

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