देश के बड़े हिस्से में मजदूर संघर्षों की लहर जारी है। उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में ज्यादा तेजी बढ़ती हुई पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग की खाई की पृष्ठभूमि में मजदूरी बढ़ाने के सवाल पर मजदूर वर्ग व्यापक पैमाने पर स्वयंस्फूर्त तरीके से सड़कों पर उतर रहा है। ट्रेड यूनियन आंदोलन का पुराना सुधारवादी नेतृत्व मजदूर वर्ग के सबसे ज्यादा सताए हुए हिस्सों में पैदा हुई इस मुखरता से अवाक है। बिना संगठन, बिना किसी योजना, संघर्ष के तरीकों या समाधान के रास्तों के बारे में बिना किसी जानकारी के बस यह काम छोड़कर सड़क पर आ जा रहा है। पुराने सुधारवादी नेताओं को जिनको कि आदत है कि आम मजदूरों के सामने साहबों की तरह पेश आए, वे परेशान हैं कि मजदूर किसी हद तक पूंजीपति वर्ग को दबाव में ला रहे हैं और इस सबमें पुराने सुधारवादी नेताओं की कोई भूमिका नहीं है। मजदूर उनका नेतृत्व स्वीकारना तो दूर, एक समर्थक के रूप में भी इन सुधारवादी नेताओं पर विश्वास नहीं कर रहे हैं।
बात को स्पष्ट करने के लिए फरीदाबाद की एक फैक्टरी का उदाहरण पेश है। इस फैक्टरी में इस लहर के दौरान मजदूरों के दो अलग-अलग समूह दो अलग-अलग मौकों पर काम बंद कर फैक्टरी से बाहर आ गए। दोनों मौकों पर इस संघर्ष का समर्थन करने के लिए इंकलाबी मजदूर केन्द्र के साथी और इस फैक्टरी के भीतर स्थायी मजदूरों की यूनियन के नेता जो कि एक सुधारवादी ट्रेड यूनियन केन्द्र से जुड़े हैं, मजदूरों के बीच स्वतंत्र तौर पर पहुंचे। दोनों मौकों पर सुधारवादी नेता यह दावा कर रहे थे कि चूंकि इस फैक्टरी में उनकी पंजीकृत ट्रेड यूनियन मौजूद है, इसलिए मजदूरों के मुद्दों का प्रबंधन से बातचीत कर समाधान कराने के लिए वही उपयुक्त है और इंकलाबी मजदूर केन्द्र के साथियों को वहां से चले जाना चाहिए। लेकिन दोनों मौकों पर संघर्ष कर रहे मजदूरों ने इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ताओं के सामने इन सुधारवादी नेताओं के प्रति अविश्वास व्यक्त किया। बल्कि, पहले मौके पर तो कुछ मजदूरों ने बताया कि सुधारवादी नेताओं में से कोई एक नेता फैक्टरी में कुछ मशीनों पर मजदूरों से काम कराने के मामले में ठेकेदार की भूमिका में है। इस तरह की चीज को अपवाद भी मान लिया जाये तो भी मजदूरों के बीच आम भावना यही थी कि इन नेताओं को वे वर्षों से जानते हैं इन नेताओं ने गैर यूनियनीकृत मजदूरों के संबंध मंे कभी भी प्रबंधन के समक्ष गंभीरता से कोई मांग नहीं उठाई है।
आज जब बड़ी तादाद में मजदूर संघर्ष के मैदान में उलट रहे हैं, तो इस संघर्ष को अपने प्रभाव में लाने की चाहत तो संभवतः देश के सुधारवादी ट्रेड यूनियन आंदोलन नेतृत्व में होगी ही। लेकिन कानूनवाद और सुविधापरस्ती की बीमारियों से ग्रस्त कर सुधारवादी नेतृत्व कैसे इस अत्यंत संभावनाशाली प्रवृत्ति को अपने दायरे में समेट सकता है।
देश में मौजूद क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन आंदोलन ही इस लहर का सच्चा हिमायती हो सकता है। उसे इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि ये अनुभवहीन मजदूर आत्मविश्वास से लबरेज है। हां, यह उनके संगठित होकर और अपने वर्ग के गौरवशाली इतिहास से परिचित होकर किये जानी वाले सचेत कार्यवाहियों के लिए इनकी तरफ आशा भरी निगाह से जरूर देख रहा है।
सुधारवादी नेताओं का इस लहर के दौरान निष्प्रभावी हो जाना क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन आंदोलन की जिम्मेदारियों को बढ़ा रहा है। उनकी हर सही पहल का मजदूर वर्ग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।