वेनेजुएला के राष्ट्रपति मदुरो का अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा अपहरण तथा ग्रीनलैण्ड को हड़़पने की उनकी कोशिशों के मद्देनजर एक बार फिर पूंजीवादी दायरों में साम्राज्यवाद की चर्चा होने लगी है। कुछ इस तरह का भाव व्यक्त किया जा रहा है कि साम्राज्यवाद की वापसी हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अमरीकी स्वयं अपने द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कायम की गयी वैश्विक व्यवस्था को समाप्त कर रहे हैं।
पूंजीवादी दायरों में इस तरह की बातें उनकी मासूमियत लगतीं यदि वे इतनी कूढ़मग्जी की न होतीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया के इतिहास की एक सरसरी जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि इस समय अमरीकी साम्राज्यवादी जो कर रहे हैं वह उतना अनूठा नहीं है। यदि कुछ अनूठा है तो वह है उनकी बदहवासी। इस बदहवासी में वह इस तरह का बहाना भी नहीं कर रहे हैं जैसा वे हमेशा किया करते थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के बीते अस्सी सालों में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने एक सौ से ज्यादा देशों में प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप किया है यानी औसतन हर साल एक से ज्यादा। देशों की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप, विरोधी सरकारों वाले देशों पर प्रतिबंध, नेताओं की हत्या करवाना, तख्तापलट करवाना और सीधे-सीधे सैनिक हमला, इत्यादि सब अमरीकी साम्राज्यवादी करते रहे हैं। अमरीकी खुफिया एजेन्सी सी आई ए, उसकी तथाकथित जनतंत्र को प्रोत्साहित करने वाली संस्थाएं, यू एस एड जैसी संस्थाएं तथा कर्ज इत्यादि सब इसमें इस्तेमाल किये जाते रहे हैं।
इस सबकी शुरूआत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही हो गयी थी। जर्मनी, इटली, यूनान इत्यादि में हस्तक्षेप तो युद्ध की समाप्ति से ही शुरू हो गया था। यूनान में कम्युनिस्ट छापामारों के खिलाफ अमेरिका ने सैनिक हस्तक्षेप किया। उसके बाद कोरिया और फिर वियतनाम में सैनिक हस्तक्षेप किया। इसी तरह 1953 में ही अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान में मोसद्दक का तख्ता पलट करवाया और शाह पहलवी की राजशाही को स्थापित किया। अफ्रीका में पैट्रिस लुमुंबा की हत्या से लेकर चिली में सैनिक तख्तापलट तक अन्य कुकृत्य किये गये। 1979 में अफगानिस्तान में अस्थिरता पैदा कर उसमें सोवियत साम्राज्यवादियों को सैनिक हस्तक्षेप के लिए उकसाया जिससे उन्हें वहां फंसाया जा सके। फलस्वरूप अफगानिस्तान अगले चार दशक तक युद्ध और तबाही का शिकार रहा। स्वयं अमरीकी साम्राज्यवादियों ने 2001 से उस पर हमला कर कब्जा करने का प्रयास किया जहां से उन्हें 2021 में खदेड़ दिया गया। 2003 में महाविनाशक हथियारों के झूठे बहाने से इराक पर हमला सबसे बदनाम कारनामों में था जिसके खिलाफ तब दुनिया के करोड़ों लोगों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया था। विदेशी नेताओं का अपहरण भी अमरीकी साम्राज्यवादी पहले कर चुके हैं। 1990 में उन्होंने पनामा के नोरगिया का अपहरण किया था।
अस्तु, अमरीकी साम्राज्यवादी इस समय जो कुछ कर रहे हैं वह नया नहीं है। तब फिर कुछ लोगों को यह नया क्यों लग रहा है? क्यों उन्हें साम्राज्यवाद की वापसी होती दीख रही है?
इसकी वजह है अमरीकी साम्राज्यवादियों का उद्धत, हेकड़ीभरा व्यवहार। अब उन्होंने जनतंत्र का प्रसार, कम्युनिज्म का विरोध, आतंकवाद का खात्मा, इत्यादि सारे बहानों को ताक पर रख दिया है। उनका नेता खुलेआम कह रहा है कि वेनेजुएला का सारा मसला तेल का है। वह खुलेआम कह रहा है कि उसे ग्रीनलैण्ड चाहिए कि आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस की घुसपैठ को रोक सके। इतना नहीं नहीं, उनका सुरक्षा का दस्तावेज अधिकारिक तौर पर कहता है कि पश्चिमी गोलार्द्ध अमरीका का प्रभाव क्षेत्र है जिसमें किसी और का (चीन व रूस का) हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
ऊपरी तौर पर लगता है कि अमेरिका की ये कार्रवाईयां उसके राष्ट्रपति की सनक भरी कार्रवाईयां हैं। पर थोड़ा ही ध्यान से देखने से पता चलता है कि ये सारी ही कार्यवाहियां अमरीकी प्रशासकों की नीतियों का विस्तार मात्र हैं। ओबामा और बाइडेन ने भी इसी दिशा में काम किया था। ईरान पर पिछले चालीस सालों से ज्यादा समय से तथा वेनेजुएला पर पिछले बीस सालों से ज्यादा समय से प्रतिबंध लगे हुए हैं। हां, डेमोक्रैट थोड़ा छिप कर यह करते थे तो रिपब्लिकन ज्यादा खुलकर। अब सब सारा खेल खुला फर्रुखावादी हो गया है। हां, यह जरूर है कि अमरीकी साम्राज्यवादियों का एक हिस्सा चाहता है कि इस सबको बस सनकी ट्रम्प की सनक का परिणाम माना जाये। वे एक व्यक्ति के पीछे अपनी व्यवस्था के कुकर्मों को छिपा ले जाना चाहते हैं।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों की इस बदहवासी के पीछे चीन का एक बड़ी साम्राज्यवादी ताकत के तौर पर उभरना तथा रूसी साम्राज्यवादियों का इधर-उधर हाथ-पांव मारना है। यूरोपीय साम्राज्यवादियों का कमजोर होना भी इसमें कारक है। स्वयं अमरीकी साम्राज्यवादी आर्थिक या सामरिक तौर पर कमजोर नहीं हुए हैं पर सापेक्षिक तौर पर उनकी पहले जैसी वरीयता नहीं रह गयी है। ऐसी अवस्था में उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने सभी जगह अपने को मजबूत नहीं किया तो दुनिया भर में उनकी चौधराहट खतरे में पड़ जायेगी।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों को सबसे बड़ा खतरा चीन से लग रहा है। चीन-रूस का गठजोड़ इस खतरे को और बढ़ा देता है। पिछले दस-पन्द्रह सालों में चीनी साम्राज्यवादियों ने चुपचाप सारी दुनिया में अपने तंतुजाल फैलाए हैं। उन्होंने कोई उद्यत सैनिक कार्यवाईयां नहीं कीं और न ही कोई शोर-शराबा किया। इसके उलट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने तथा विकास के नाम पर उन्होंने तमाम देशों को अपनी ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना में शामिल किया। दूसरी ओर उन्होंने एक दूरगामी योजना के तहत दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में अपना प्रभुत्व कायम किया जो आधुनिक तकनीक के लिए अत्यन्त जरूरी हैं। इसके जरिये उन्होंने अमरीकी साम्राज्यवादियों तक पर एक अंकुश हासिल कर लिया।
ऐसा नहीं था कि अमरीकी साम्राज्यवादियों को चीन के इस उभार का पता नहीं था। अमरीकी नीति नियंताओं के दायरों में इस उभार की काफी समय से चर्चा होती रही है। कई सारी मोटी-मोटी किताबें इस पर लिखी गयी हैं। पर साम्राज्यवादी ताकतों ने उत्थान-पतन पर यदि शासकों के नीति-नियंताओं का इतना नियंत्रण होता तो न तो कभी किसी पुरानी साम्राज्यवादी ताकत का पराभव होता और न ही किसी नयी साम्राज्यवादी ताकत का उदय होता। किसी समय यूरोपीय साम्राज्यवादी दुनिया में सबसे बड़ी ताकत थे। फिर अमेरिकी साम्राज्यवादी सबसे बड़ी ताकत बन गये। और अब चीन उभर कर सामने आ रहा है।
दुनिया के इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतों का उत्थान और पतन होता रहा है। आधुनिक साम्राज्यवाद के दौर में इस उत्थान और पतन की गति तेज हो जाती है। पूंजीवाद में कुल मिलाकर विकास तेज होता है और पूंजीवादी साम्राज्यवाद में यह तेज के साथ बेहद असमान भी होता है। इसका परिणाम यह निकलता है कि पहले की साम्राज्यवादी ताकतें पीछे चली जाती हैं और नयी साम्राज्यवादी ताकतें सामने आ जाती हैं। इसकी जड़ में पहले की साम्राज्यवादी ताकतों की एकाधिकार वाली स्थिति होती है जो उनमें गतिरोध या जड़ता पैदा करती है।
उन्नीसवीं सदी की दो प्रमुख साम्राज्यवादी ताकतें इंग्लैण्ड और फ्रांस थीं। इंग्लैण्ड तब सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत था जिसके राज में सूरज कभी नहीं डूबता था। इसके अलावा पुरानी सामंती किस्म की साम्राज्यवादी ताकतें भी थीं- रूस, आस्ट्रिया-हंगरी और अतोमन साम्राज्य। इन तीनों का प्रथम विश्व युद्ध में पतन हो गया। उन्नीसवीं सदी के अंत में सं.रा.अमेरिका, जर्मनी, जापान और इटली नयी साम्राज्यवादी ताकत के तौर पर उभरे, खासकर पहले वाले दो। इन्होंने इंग्लैण्ड और फ्रांस को चुनौती दी। इनकी आपसी प्रतिद्वन्द्विता ने पहले विश्व युद्ध को जन्म दिया। इस विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड और फ्रांस ने खुद को बचा लिया पर दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी, जापान और इटली पराजित व तबाह हो गये। इनके मुकाबले स.रा.अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत बनकर उभरा। इसकी अब दुनिया में वही स्थिति थी जो एक सदी पहले इंग्लैण्ड की थी।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में जो पूंजीवादी विश्व व्यवस्था बनी वह अमरीकी साम्राज्यवादियों के अनुरूप थी। वे ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक में सर्वप्रमुख हैसियत रखते थे। उन्हें इंग्लैण्ड, फ्रांस, चीन व सोवियत संघ के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो हासिल था जिसका वे बखूबी इस्तेमाल करते थे। उन्होंने दुनिया भर में अपने सैनिक अड्डे कायम कर रखे थे।
अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इंग्लैण्ड, फ्रांस व अन्य पुरानी औपनिवेशिक ताकतों की तरह उपनिवेश नहीं बनाए। इसलिए ऐसा लगा कि वे साम्राज्यवादी नहीं हैं। यही नहीं, उन्होंने ऊपरी तौर पर दूसरे विश्व युद्ध के बाद आजाद हो रहे देशों की आजादी का समर्थन किया। पर असल में उनका इरादा इन देशों को अपने चंगुल में लेने का था। इसीलिए तब अमरीकी साम्राज्यवादियों को नव-औपनिवेशिक ताकत कहा गया था।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों को चुनौती समाजवादी सोवियत संघ से और बाद में सोवियत साम्राज्यवाद से मिली जब सोवियत संघ समाजवाद का रास्ता छोड़कर पूंजीवाद के रास्ते पर चल पड़ा था। लेकिन इस चुनौती का तब अंत हो गया जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। उसके बाद कुछ समय के लिए अमेरिका चुनौतीविहीन हो गया। वे बेलगाम हो उठे।
नयी सदी की शुरूआत में अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने इसी चुनौतीविहीन स्थिति को बरकरार रखने के लिए सारी दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की सोची। उन्होंने 2001 में अफगानिस्तान पर तथा 2003 में इराक पर हमला किया। उनका इरादा पांच-सात और देशों पर भी हमला करने का था। पर जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि वे अपने इरादों में सफल नहीं हो सकते। उन्हें दुनिया की जनता, स्वयं अपनी जनता तथा अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें पहले इराक में और फिर अफगानिस्तान में मुंह की खानी पड़ी। स्थिति यह हो गयी कि चौबे जी गये छब्बे होने और दुबे होकर लौटे।
ट्रम्प के नारे ‘अमेरिका को फिर महान बनाओ’ को इसी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। ट्रम्प अमेरिका को एक बार फिर सर्वप्रमुख साम्राज्यवादी ताकत बनाना चाहता है। पर यही तो सारे साम्राज्यवादी चाहते हैं। ओबामा और बाइडेन भी यही चाहते थे।
अमेरिका पूरी बीसवीं सदी में ही साम्राज्यवादी रहा और अब भी है। उसका आज का उद्धत व्यवहार ही साम्राज्यवादी नहीं है। बल्कि उसका समस्त व्यवहार ही साम्राज्यवादी रहा है। बस वह पुराने औपनिवेशिक साम्राज्यवादियों के व्यवहार से भिन्न रहा है। इसीलिए ऐसा लगता रहा है कि अमेरिका साम्राज्यवादी नहीं है।
आज यह कहा जा रहा है कि अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वयं द्वारा कायम की गयी व्यवस्था को तहस-नहस कर रहा है। पर यह भी इतना नया नहीं है। अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद कायम की गयी मुद्रा व्यवस्था को इकतरफा तौर पर 1971 व 73 में तोड़ दिया। यह व्यवस्था उस पर भारी पड़ने लगी थी। इसके भी पहले उसने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संघ को अस्तित्व में ही नहीं आने दिया था हालांकि ब्रेटन वुड्स समझौते में इसकी भी व्यवस्था की गयी थी। तब वह व्यापार के मामले में बंधना नहीं चाहता था। इसीलिए आज जब अमेरिका विश्व व्यापार संगठन को धता बताकर सारे देशों पर मनमाने तटकर थोप रहा है तो यह उसके पुराने व्यवहार का ही दोहराव है।
आज जो नया है वह है अमरीकी साम्राज्यवादियों के बदहवासी भरे कदम। बदहवासी में उन्होंने दिखावा करना छोड़ दिया है। वे नंगई पर उतर आये हैं। यह नंगई अमरीकी साम्राज्यवादियों के एक हिस्से को परेशान कर रही है। उन्हें लगता है कि यह उनके असली चरित्र को उजागर कर उनको नुकसान पहुंचा रहा है। वे ट्रम्प के भदेस चेहरे के बदले ओबामा या बाइडेन के चिकने-चुपड़े चेहरे को बेहतर समझते हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादियों का बदहवास हो जाना अनायास नहीं है। उन्हें दीख रहा है कि क्रमशः चीजें उनके हाथ से निकल रही हैं। उनके पहले जैसे प्रयास स्थिति पर नियंत्रण नहीं पा रहे हैं। वे जब 1990 के दशक से आज की तुलना करते हैं तो पाते हैं कि अपनी सारी कोशिशों के बावजूद स्थितियां उनके काफी प्रतिकुल हुई हैं। तब फिर क्या किया जाये। पहले आजमा लिये गये तरीकों से भिन्न कुछ किया जाये। और ट्रंप के भदेस नेतृत्व में वही किया जा रहा है।
क्या अमरीकी साम्राज्यवादी सफल होंगे? क्या वे अपनी सापेक्षिक पराभव को रोक पायेंगे? क्या वे उभरते चीन की चुनौती से निपट पायेंगे? इन सारे सवालों का उत्तर बहुत सारे जटिल कारकों पर निर्भर करता है। भविष्य ही बतायेगा कि चीजें किधर जाती हैं। पर इतना तय है कि जैसे पहले की साम्राज्यवादी ताकतों का उत्थान और पतन हुआ उसी तरह अमरीकी साम्राज्यवादियों का भी पतन होगा। वे अमृत का घड़ा पीकर नहीं आये हैं। पर दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता के हित में यह जरा भी नहीं है कि उनकी जगह चीनी साम्राज्यवादी ले लें। उनके हित में यही है कि समूची साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था का ही विनाश हो जाये। ‘अमेरिका को फिर महान बनाओ’ के नारे के पीछे अमेरिका के जो अंदरूनी हालत हैं वे इस ओर ईशारा भी करते हैं कि एक साम्राज्यवादी ताकत के दूसरी साम्राज्यवादी ताकत से प्रतिस्थापित होने के बदले पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था ही समाजवादी व्यवस्था से प्रतिस्थापित हो जाये।