सम्पादकीय

आठ मार्च का दिन इंकलाब व मुक्ति के नाम
भारत को लज्जित करते भारत के शासक
मुक्त व्यापार समझौते : भारत को घेरते साम्राज्यवादी
एक राष्ट्र का सरेआम बलात्कार
नया साल
भारत का संकट
नई श्रम संहिताएं : मजदूर वर्ग पर बोला गया तीखा व क्रूर हमला
दलित उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला
आज की दुनिया में नई दुनिया का ख्वाब
बूढ़ा, बीमार डगमग-डगमग कर चलता पूंजीवाद
भारतीय राजसत्ता की खुराक : गर्म, ताजा रक्त
गद्दारी, षड्यंत्र, झूठ और हिंसा के सौ साल
कोई भी बात उठाओ, बात इंकलाब तक जायेगी
मोदी जी का भविष्य
सत्ता पक्ष और विपक्ष : खोटे सिक्के के दो पहलू
यह ‘युद्ध विराम’ नहीं, नये युद्धों की तैयारी है
लोकलुभावनवाद : मुंह में राम बगल में छुरी
अजब-गजब राष्ट्रवाद
यह टकराव किसके हित में और किसके खिलाफ है
पहलगाम आतंकी हमले से निकलने वाले सबक
चट्टान में भी फूल खिल सकते हैं; शर्त खूने जिगर से सींचने की है
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया
तुम्हारे झूठे ख्वाबों की कीमत हम क्यों चुकायें
कलह के बाद अब सांठगांठ
फिलिस्तीन जिन्दाबाद !
युद्ध विराम समझौता
एक देश-एक चुनाव : भारतीय गणराज्य का नया शोकगीत
लो, एक साल और बीता
‘‘अरबन नक्सल’’
उन्नीस सौ पच्चीस
एक बदमाश की वापसी
ये डर है तो किस बात का डर है
चुनाव में अपचयित होता लोकतंत्र
मजदूरों-मेहनतकशों सावधान !
राजनीति से बेरुखी ठीक नहीं
यौन हिंसा और उसके खिलाफ फूटा आक्रोश
बांग्लादेश : जनाक्रोश से हसीना भागी पर भगोड़ा सत्ता में
15 अगस्त : आजादी के मायने तलाशने की जरूरत
मजदूरों-मेहनतकशों की बस्ती में ठगों का डेरा
नयी सरकार : अमीरों द्वारा, अमीरों की, अमीरों के लिए सरकार
चुनाव परिणाम : ‘‘कोउ नृप होउ हमहिं का हानि’’..?
आम चुनाव में मजदूर वर्ग कहां है
मजदूर पूंजीपतियों की गुलामी क्यों करें? कब तक करें?
इलेक्टोरल बाण्ड एक गोरखधंधा
‘‘विश्व गुरू’’ के मंसूबे के आगे खड़ी फौलादी दीवार
भारत का इतिहास सवाल दर सवाल
‘समान नागरिक संहिता’ : कहीं पे निगाह कहीं पे निशाना
उन्माद के बाद
‘‘आप तो आंधी और तूफान थे’’
किसी भी कीमत पर चुनावी जीत हासिल करने की साजिश
नया साल : चुनावी साल
हमारा भविष्य उज्जवल है
विकास का रथ : खून से लथपथ
वामपंथ क्यों गाली खाता है
शांति का रास्ता क्रांति से होकर जाता है
जातीय जनगणना
महिला आरक्षण क्या महज एक झुनझुना
भगतसिंह होने का मतलब
वैज्ञानिक उपलब्धि; श्रेय का चक्कर
‘‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’’
गुलामी की स्याही हर माथे पर, गुमान पर आजाद होने का
किम रहस्यम् मोदी मौनम्
मोदी की अमेरिकी यात्रा के निहितार्थ
आगामी आम चुनाव : बनते-बिगड़ते राजनैतिक समीकरण
नया संसद भवन : रंग में भंग
‘सामाजिक न्याय’ के झण्डे में छेद ही छेद
मई दिवस का महत्व
देश का दुश्मन
जी-20 और विश्व गुरू
‘‘इंकलाब जिन्दाबाद !’’
व्यक्तिगत सफलता और सामाजिक मुक्ति
बीते साल का लेखा-जोखा

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि