चुनाव

बिहार चुनाव : एन डी ए की भारी जीत के मायने

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बिहार चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। एन डी ए गठबंधन पिछले चुनाव से भी भारी जीत हासिल कर सत्ता संभालने की तैयारी में है। इण्डिया गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। टक्कर का प

चुनाव, चुनाव आयोग और हिंदू फासीवाद

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चुनावी पद्धति और सीमित जनवादी अधिकार (आम नागरिकों के लिए) पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद है। इसी के दम पर इसे ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ का मंत्र दोहराया जाता है। असल में यह शांतिपूर्ण काल में पूंजीपति वर्ग की लोकतंत्र की ओट में छुपी तानाशाही से इतर कुछ भी नहीं है। आर्थिक-राजनीतिक संकटों के काल में इस नकाब को हटाने में शासक पूंजीपति वर्ग को ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसका एक रास्ता इंदिरा गांधी के जरिए संवैधानिक तानाशाही थोपे जाने के रूप में दिखा तो दूसरा रास्ता हिंदू फासीवादियों के दौर में फासीवादी तानाशाही की ओर बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। 

सवालों से भागता चुनाव आयोग

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भारत का चुनाव आयोग आजकल काफी चर्चा में है। एक तरफ बिहार में मतदाता सूची पुनर्रीक्षण पर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी बिहार की तदर्थ मतदाता सूची में

होश खोते होसबोले

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ट्रम्प से लेकर संघ तक सब ‘वोकिज्म’ (Wokeism) से परेशान हैं। ट्रम्प अपने यहां इसे खतरा बताता है तो संघ भारत में इसे खतरा बताता है। दोनों को एक ही चीज परेशान कर रही है। दोन

महाराष्ट्र जीत ने भाजपा को वाचाल तो झारखण्ड हार ने गूंगा बनाया

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महाराष्ट्र व झारखण्ड विधान सभा के चुनाव व विभिन्न राज्यों में उपचुनाव तथा लोकसभा उपचुनाव में संघ-भाजपा व उसके नेताओं ने घोर साम्प्रदायिक-धार्मिक ध्रुवीकरण, राज्य मशीनरी औ

चुनावी उलटबांसी : जीतने वाले हार गए और हारने वाले जीत गए

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हरियाणा विधानसभा के चुनाव परिणाम ने जितने दुखद आश्चर्य में कांग्रेस पार्टी को डाला उतने ही दुखद आश्चर्य में योगेंद्र यादव व वाम उदारवादियों को डाला। योगेंद्र यादव तो कांग

आलेख

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

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लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

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इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

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गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि