अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले से शुरू होकर पश्चिम एशिया में टकराव कई कोणों से बढ़ने लगा है। इजरायल व लेबनान के हिजबुल्ला के बीच संघर्ष जहां अमेरिका-ईरान युद्ध की शुरूआत से ही चल रहा था वहीं अब यमन के हूती व सऊदी अरब के बीच संघर्ष ने पश्चिम एशिया को और अशांत कर दिया है। यह संघर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें समुद्र व्यापार का एक अन्य प्रमुख मार्ग बाब अल मंदेब भी दांव पर लगा है। अब तक इस वर्ष इस लड़ाई में 800 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।
इस टकराव का इतिहास काफी पुराना है। 2014 में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों व सऊदी समर्थित यमन सरकार के बीच चल रहा टकराव तब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया जब हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर नियंत्रण कर यमन की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को भागने को मजबूर कर दिया था। सरकार के कई लोगों को सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी। 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब राष्ट्रों के समूह ने हूती विद्रोहियों को खदेड़ने के लिए संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया। तब से यह युद्ध कभी नरम कभी गरम पड़ते हुए जारी रहा है। अप्रैल 2022 से संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में कायम हुआ युद्ध विराम 4 वर्षों तक जारी रहा पर 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़ते टकराव के दौरान टूट गया। बीते कुछ माह से हूती विद्रोही तेजी से यमन के पश्चिमी तट पर कब्जा बढ़ाते गये और मोखा व बाब-अल-मंदेब खाड़ी के चोक बिन्दु के निकट तक पहुंच गये। सऊदी हवाई हमले यद्यपि लगातार जारी रहे हैं पर वे अभी तक हूती विद्रोहियों को आगे बढ़ने से रोकने में विफल रहे हैं।
हूती विद्रोहियों ने भी सऊदी शहरों पर मिसाइलों से हमला जारी रखा है। सऊदी अरब ने मुस्लिम पवित्र स्थल पर हमले का भी हूती विद्रोहियों पर आरोप लगाया। हालांकि हूती विद्रोहियों ने इस हमले से इंकार किया।
सऊदी अरब पर हमलों ने हाल में तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा समझौते की भी परीक्षा लेनी शुरू कर दी। पाकिस्तान व तुर्की दोनों ही किसी न किसी बहाने सऊदी अरब को मदद देने में आनाकानी करते रहे। वहीं सऊदी अरब को अमेरिकी साम्राज्यवादियों से भी कुछ खास समर्थन नहीं मिला। जी-7 के देशों ने हूती हमलों की निन्दा तो की पर यू के को छोड़ किसी देश ने सऊदी की कुछ खास मदद नहीं की। इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि मक्का समझौते से नाराजगी की वजह से अमेरिकी साम्राज्यवादी सऊदी अरब की मदद करने को तैयार नहीं हैं।
इस टकराव से यमन में गृह युद्ध जोर पकड़ रहा है और कई लाख लोग विस्थापन को मजबूर हुए हैं।
अगर हूती विद्रोही बाब अल मंदेब खाड़ी के चोक बिन्दु पर नियंत्रण कर इससे गुजरने वाला समुद्री व्यापार बाधित कर देते हैं तो यह पहले से चल रहे तेल व्यापार संकट को और बढ़ा देगा। होरमुज के बाद बाब अल मंदेब का रास्ता ही पश्चिम एशिया से तेल निर्यात का प्रमुख रास्ता रहा है। ऐसे में पहले से अमेरिका-ईरान जंग से त्रस्त दुनिया की जनता और मार झेलने को मजबूर होगी। कहने की बात नहीं कि इस सबमें अमेरिकी साम्राज्यवादी व सऊदी विस्तारवादी ताकतें ही मुख्य कारक हैं जो अपने हितों की खातिर दुनिया को और तेल संकट की ओर धकेल रही हैं।