समान नागरिक संहिता पर सेमिनार

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देहरादून/ प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने 26 अक्टूबर 2025 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ‘समान नागरिक संहिता : जनवाद का विस्तार या फासीवादी हमला’ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया। सेमिनार का उद्देश्य समान नागरिक संहिता की बारीकियों पर चर्चा करते हुए इसकी असली मंशा पर अपनी समझ साफ करना, उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के लागू होने के दस महीने के अंदर जनता द्वारा झेली जा रही समस्याओं पर चर्चा, समान नागरिक संहिता का अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा तथा समान नागरिक संहिता के खिलाफ साझा संघर्ष विकसित करने पर चर्चा करना था। सेमिनार में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र समेत लगभग 15 संगठनों के 50 लोगों ने भागीदारी की। 
    
सेमिनार की शुरूआत प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की लालकुंआ टीम द्वारा एक क्रांतिकारी गीत से की गई। सेमिनार के आधार पत्र पर बात रखते हुए प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की उपाध्यक्ष नीता ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू हुए दस महीने बीत चुके हैं और जनता के बीच अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। सरकार नागरिकों के जीवन से संबंधित विभिन्न आयामों से संबंधित न सिर्फ दस्तावेज एकत्रित कर रही है बल्कि उनसे उस पर शुल्क भी वसूल कर रही है। विवाह, तलाक, रिहाइश से लेकर लिव-इन संबंध तक हर व्यक्तिगत पहलू पर सरकार को दस्तावेज देने हैं। नीता ने कहा कि भाजपा केंद्र में तीन प्रमुख एजेंडे लेकर आई थी- राम मंदिर का निर्माण, धारा 370 का खात्मा और समान नागरिक संहिता। ये तीनों एजेंडे इसके मुख्य ध्येय हिंदू राष्ट्र के निर्माण को लागू करने के प्रमुख हथियार हैं। सरकार समान नागरिक संहिता के जरिए अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों, तथा अन्य उत्पीड़ित तबकों पर हमला कर रही है।
    
अगले वक्ता के रूप में प्रगतिशील भोजनमाता यूनियन की अध्यक्ष शारदा ने कहा कि सरकार समान नागरिक संहिता के द्वारा अपने हिंदू राष्ट्र के फासीवादी मंसूबों को पूरा करना चाहती है। 
    
प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम से डा. आशुतोष ने कहा कि आरएसएस तथा भाजपा भले ही समान नागरिक संहिता के कितने कसीदे गढ़ें लेकिन असल में यह सरकार द्वारा देश की मजदूर-मेहनतकश जनता पर एक फासीवादी हमला ही है।
    
भेल मजदूर ट्रेड यूनियन से राजकिशोर ने कहा कि सरकार एक तरफ तो मजदूर-मेहनतकश जनता के शोषण-उत्पीड़न को अपनी पूंजीपरस्त नीतियों के जरिए बढ़ा रही है वहीं दूसरी तरफ उन्हें संघर्ष से रोकने के लिए उन पर फासीवादी विचारधारा थोपने के जरिए सांप्रदायिकता तथा वैमनस्य का विष बो रही है।
    
गार्गी महिला टीम से संजू ने कहा कि समान नागरिक संहिता का सबसे बड़ा हमला महिलाओं पर हो रहा है। समाज में पहले से ही तलाकशुदा या परित्यक्त महिलाओं को गलत नजर से देखा जाता है जिसकी वजह से जो महिलाएं अपनी वैवाहिक स्थिति को उजागर करने से बचती हैं उन्हें यह पंजीकरण करवा सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा करनी होगी जो महिलाओं के उत्पीड़न को और बढ़ाएगी।
    
उत्तराखंड मजदूर संगठन से निहारिका ने कहा कि आम जनता इस पंजीकरण की प्रक्रिया से बुरी तरह से त्रस्त है। भले ही कहने को इन पंजीकरण का शुल्क कुछ सौ रुपए है लेकिन लोग इसको अपने-आप नहीं कर पा रहे हैं। इसके लिए इनको साइबर कैफे में जाकर 3000 रु. खर्च करके पंजीकरण करवाना पड़ रहा है। निहारिका ने कहा कि सरकार इस संहिता के जरिए आम जनता के निहायत ही निजी मसलों की सूचना एकत्रित कर रही है जो कि अपमानजनक है। उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार चाहिए न कि समान नागरिक संहिता और वह इसके लिए संघर्ष करेंगे।
    
उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी से मधवाल जी ने कहा कि समान नागरिक संहिता एक तरह से उन नागरिकों की निगरानी की व्यवस्था है जो सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।
    
जमीयते-उल-हिंद से आए वक्ता ने कहा कि सरकार समान नागरिक संहिता के जरिए मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हमला कर रही है। वह भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं जिसमें मुस्लिम समुदाय का नामोनिशान न हो। इसीलिए वह समान नागरिक संहिता के जरिए मुस्लिम समुदाय के जीवन से संबंधित रीति-रिवाजों को खत्म कर उन पर हिंदू जीवन शैली थोपना चाहते हैं।
    
परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कोष सचिव तथा परचम पत्रिका के संपादक चंदन ने कहा कि सरकार भले ही समान नागरिक संहिता के जरिए महिलाओं की समानता का ढोल पीट ले लेकिन  आज भी महिलाओं को संपत्ति में अधिकार नहीं मिल रहा है। कानून होने के बावजूद महिलाओं का अपनी पैतृक संपत्ति पर दावा करना बुरा माना जाता है। लिव-इन रिलेशनशिप पर सरकार निगरानी रख महिलाओं को अपनी मर्जी के हिसाब से जीवन नहीं जीने देना चाहती।
    
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन से भूपाल ने कहा कि सरकार समान नागरिक संहिता जैसे तमाम कानूनों के जरिए जनता को हम और वे के रूप में बांटना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार मुसलमान समुदाय पर चार शादियां करने का आरोप लगाकर इस संहिता की पैरवी कर रही है, ऐसे ही झूठ और असत्य फैलाकर वह जनता को उसके मूल मुद्दों से भ्रमित कर रही है।
    
इंकलाबी मजदूर संगठन के उपाध्यक्ष पंकज ने अपनी बात रखते हूए कहा कि एक तरफ तो सरकार मजदूर-मेहनतकश आबादी पर नई श्रम संहिताओं के जरिए हमला कर रही है। इन संहिताओं की वजह से आम आबादी के रोजगार, वेतन तथा विरोध करने के अधिकार पर संकट छा गया है वहीं दूसरी तरफ वह समान नागरिक संहिता जैसे फासीवादी हथियारों के जरिए आम जनता की एकता पर भी हमला कर रही है।
    
उत्तराखंड महिला मंच से कमला पंत ने कहा कि समान नागरिक संहिता के जरिये सरकार एक बार फिर महिलाओं को पुरानी गुलामी में ढकेलना चाहती है। वह महिलाओं के जीवन के हर पहलू पर लगाम कस कर उन्हें फिर से घरों में कैद करना चाहती है। हमें समान नागरिक संहिता के तहत पंजीकरण के खिलाफ पंजीकरण न करवाकर विरोध करना चाहिए।  
    
उक्त वक्ताओं के अलावा सेमिनार में देव भूमि श्रमिक संगठन, चेतना आंदोलन, उत्तराखंड महिला मंच की तरफ से वक्तव्य आए। सेमिनार के अंत में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की अध्यक्ष बिंदु ने कहा कि अतीत में भी फासीवादी निजाम को मजदूर वर्ग के संघर्षों ने ही हराया था और आज भी इसे मजदूर वर्ग अपनी वर्गीय एकता और संघर्ष से टक्कर देकर परास्त करेगा। सेमिनार का समापन प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के साथियों द्वारा गाए गए गीत ‘वह सुबह कभी तो आएगी’ से किया गया। 
        -देहरादून संवाददाता
 

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