सम्पादकीय

भारतीय अर्थव्यवस्था: रहस्यमयी व अविश्वसनीय

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इस वर्ष के दो लोकप्रिय जनउभार के पीछे बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी (बदहाल शिक्षा के साथ) ही थे। पहला जनउभार इस वर्ष के अप्रैल-मई माह में भारत के बेहद कम मजदूरी व बढ़ती महंगाई से हैरान-परेशान मजदूरों का था। और दूसरा जनउभार जून-जुलाई माह में छात्र-युवाओं का था जो बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होने से परेशान थे।

राहुल गांधी की राजनीति

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भारत का मजदूर वर्ग ही वह वर्ग या वह ताकत है जो भारत के सभी शोषित-उत्पीड़ितों की मुक्ति की राह खोल सकता है। भारत का मजदूर वर्ग जब जागेगा तब वह अपनी करोड़ों भुजाओं से उस शोषण-उत्पीड़न-दमन के तंत्र को एक झटके में उखाड़ फेंकेगा जो आज शोषित-उत्पीड़ितों के ऊपर लदा हुआ है। 

परेशान हाल अंधभक्त और उनके आका

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अंधभक्त को न तो तर्क से, न विज्ञान से, न भारत की महान ऐतिहासिक दार्शनिक व ज्ञान परम्परा से और न ही भारत के वर्तमान या भविष्य से कोई लेना-देना है। और यह भी सच है कि अंधभक्त जिनका अनुयायी है उनका भी इससे कोई लेना-देना नहीं है। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास का दर्जा देना चाहते हैं और अपने कुटिल हितों को आस्था का आवरण पहनाकर परम सत्य का दर्जा दिलाना चाहते हैं।

अंततः इस्तीफा, हेकड़ी का निकलना और ताजी हवा का बहना

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जब-जब सत्ताधारियों का अहंकार सर चढ़ के बोलता है तब-तब उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। अंततः मोदी सरकार को मुंह की खानी पड़ी और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना

कैसा राष्ट्रवाद? किसका राष्ट्रवाद?

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आज यह स्थापित बात है कि भारत के हिन्दू फासीवादियों ने आजादी की लड़ाई में क्रूर, धूर्त व अत्याचारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खुले व छिपे ढंग से समर्थन किया था। ये आजादी की लड़ाई से दूर-दूर रहे। और उन सामंती, राजाओं की गोद में बैठकर ऊंघते-सोते रहे जो अंग्रेजों के पिट्ठू, दलाल व लठैत थे। हेडगेवार, गोलवलकर आदि को अपने घृणित हिन्दू साम्प्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए पैसा व अन्य संसाधन राजा-महाराजाओं, जमींदारों, सूदखोरों व अंग्रेजों के चाकर व्यापारियों से ही आता था।

युवा और युवा सपनों की कत्लगाह बनता भारत

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आत्महत्या, सड़क हादसे या आगजनी जैसी घटनाओं में मारे जाने वाली युवा आबादी को आसानी से मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता था। परन्तु यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसका कारण सिवा इस बात के क्या है कि हमारी समाज व्यवस्था और उसको चलाने वाला शासक वर्ग ही अंततः इस सबके लिए दोषी है।

मोदी के बारह साल: न उत्तम, न मध्यम, केवल अधम

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मोदी काल में लोकतंत्र (जो कि एक पूंजीवादी लोकतंत्र है) दिनों दिन वहां पहुंच गया है जहां फासीवाद (हिटलर-मुसोलिनी राज) की आहट हर ओर से सुनायी दे रही है। हिन्दू फासीवाद आज के भारत की एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस हिन्दू फासीवाद को अम्बानी, अडाणी टाटा, मित्तल जैसे सबसे बड़े भारतीय पूंजीपतियों का आशीर्वाद प्राप्त है। 

गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’

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जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।

हालिया विधानसभा चुनाव: कुछ निष्कर्ष

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इन सभी राज्यों में मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो सच्चे अर्थों में उसके हितों, आकांक्षाओं व भविष्य का प्रतिनिधित्व करती थी। विकल्पहीनता उसे एक धूर्त पूंजीवादी नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे धूर्त नेता या पार्टी की ओर ही धकेलती है। हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे का सामना इनमें से कोई भी पार्टी करने में सक्षम नहीं है।

ये तो होना ही था

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अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।