कविता

नाम -मैरी फील्ड

दूध की कीमत एक सेंट बढ़ गई,
एक क्वार्ट पर एक पैसा ज्यादा,
और एक अमीर आदमी ने गर्मियों के महीनों में
अपनी सामान्य आय से पांच हजार ज्यादा कमा लिए।

हिटलर के तम्बू में -नागार्जुन

/hitlar-ke-tamboo-mein-naagaarjun

अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
छांट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े कानून।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्त्र पर खून।

निर्माण -रेजिनो पेद्रोसो

/nirmaan-rejino-pedroso

जैसे निहाई पर लोहे का पत्थर ढाला जाता है
वैसे ही हम नए दिन ढालेंगे
ताकत और पसीने से नहाए हुए
हम पाताल में उतरेंगे
और धरती के गर्भ से नया वैभव जीत लाएंगे

ऐ शरीफ इंसानो -साहिर लुधियानवी

/ye-shareef-insaano-sahir-ludhiyaanavi

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आखिर

जंग मशरिक में हो कि मगरिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आखिर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह-ए-तामीर जख्म खाती है

औरत -वरवर राव

/aurat-varavar-raav

ऐ औरत!
वह तुम्हारा ही रक्त है
जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को
शिशु के रूप में परिवर्तित करता है।

मुझे संदेह है

/mujhe-sandeh-hai

तुम्हारी उस मुस्कुराहट पर
जो तुम ‘संधि-पत्र’ (ज्तमंजल) पर हस्ताक्षर करते वक्त
कैमरों को दिखा रहे थे।
इतिहास गवाह है-

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।