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भारत में इंसाफ का नया चेहरा : सेंगर, आसाराम, अखलाक के हत्यारों के लिए अलग कानून -वीर सांघवी

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बहुत ज्यादा वक्त नहीं बीता है, इसलिए मुझे लगता है कि हम में से कई लोगों को 2017 का उन्नाव रेप केस याद होगा। भारी जन आक्रोश के बाद, अदालतों ने आखिरकार भारतीय जनता पार्टी (

दो महीने बीत जाने के बाद भी, युद्धविराम किसी घेराबंदी जैसा लगता है --हसन अबो क़मर

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पिछले दो वर्षों में गाजा की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी को जबरन विस्थापित किया गया है। सार्थक पुनर्निर्माण न होने के कारण, गाजा शहर के दक्षिण-पूर्व में जैतून इलाके में 9 दिस

जीडीपी आंकड़ों से भरोसा क्यों उठा -अरूण कुमार

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भारत के राष्ट्रीय खातों पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की निराशाजनक रिपोर्ट ने देश के वृहद आर्थिक आंकड़ों की संदिग्ध प्रकृति की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है। 26 नवं

मुसलमानों का यथार्थ और राष्ट्रवाद का मिथक -देवेन्द्र

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गांव को लेकर हमारे जीवन और जेहन में जितनी भी यादें हैं, उसमें घर वालों के अलावा सबसे ज्यादा आत्मीय याद समतुल्लाह चाचा की ही है। उनके बगैर मेरे घर की कोई दिनचर्या उन दिनों

‘सिर्फ हम ही क्यों?’..

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नई दिल्लीः उत्तरी दिल्ली में अपने मामूली किराये के कमरे में बैठे हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.काम.

मई दिवस की उत्पत्ति क्या है? -रोजा लक्जमबर्ग (1894)

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आठ घंटे के कार्य दिवस को प्राप्त करने के साधन के रूप में सर्वहारा में अवकाश मनाने का सुखद विचार सबसे पहले आस्ट्रेलिया में पैदा हुआ था। वहां के मजदूरों ने 1856 में आठ घंटे

मुझे खेद है, अंकिता -कोलिन गोंसाल्वेस

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मुझे खेद है, अंकिता कि आपकी हत्या की सीबीआई जांच की मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट में आपके मामले का निपटारा कर दिया गया और हम अभी तक मुख्य अपराधी को पकड़ने में कामयाब नहीं

आधिपत्य और विध्वंस : 2024 में भारत में सांप्रदायिक दंगों की कहानी

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सेंटर फार स्टडी आफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (CSSS) की निगरानी के अनुसार, भारत में 2024 में 59 सांप्रदायिक दंगे हुए, जो 2023 में 32 दंगों की तुलना में 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। सांप्रदायिक दं

आलेख

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि