केशवानन्द भारती मामले के पचास साल बाद
पचास साल पहले 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानन्द भारती मामले में अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के सभी 13 न्यायाधीशों में से 7 ने यह कहा कि संविधान का एक बुन
पचास साल पहले 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानन्द भारती मामले में अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के सभी 13 न्यायाधीशों में से 7 ने यह कहा कि संविधान का एक बुन
आजकल क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद की काफी चर्चा है। मोदी-अडाणी के रिश्तों के संबंध में हर कोई (संघियों को छोड़कर) इसका इस्तेमाल कर रहा है। विपक्षी पार्टियों ने इस पर और जोर देने के लिए ‘मो
आजकल जब किसी मोदी समर्थक से पूछा जाता है कि मोदी के विकास के वादों का क्या हुआ तो वह देश भर में बनी नयी सड़कों की ओर ईशारा करता है और कहता है कि देखो विकास तो हो रहा है। देश भर में हो रही सड़कों के न
पूंजीवाद में हमेशा से ही भ्रष्टाचार की कानूनी और गैर-कानूनी सीमा रेखा अत्यन्त धुंधली रही है। कानूनी गैर-कानूनी तथा गैर-कानूनी कानूनी बनता रहा है। इसी के हिसाब से भ्रष्टाचार सदाचार और सदाचार भ्रष्टा
भारत में नारी मुक्ति का सवाल विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले ज्यादा उलझा हुआ है। यहां पूंजीवाद का कम विकास होने के चलते पुराने सामंती पितृसत्तात्मक संबंध तो ज्यादा मजबूत हैं ही, यहां वर्ग के साथ
अडाणी-मोदी प्रकरण से संघ के हिन्दू फासीवादियों का राष्ट्रवाद एक बार फिर उफान पर आ गया। उन्होंने बिना लाग-लपेट घोषित कर दिया कि अडाणी समूह पर हमला भारत पर हमला है। वह उभरते भारत को रोकने के लिए अंतर
पिछले समय में हिन्दू फासीवादियों की ओर से समान नागरिक संहिता की बातें एक बार फिर बहुत जोर-शोर से होने लगी हैं। कई भाजपा शासित प्रदेशों में इस संबंध में विधेयक लाने की बात हो रही है। गुजरात के हाल क
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।