विविध

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से दुखी और हैरान बनभूलपुरा

हल्द्वानी/ 24 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जयमाला बाघची की पीठ ने बनभूलपुरा प्रकरण में अंतरिम आदेश दिया। इस अंतरिम आद

प्रगतिशील रसोइया यूनियन ने मांगें उठायीं

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बदायूं/ उत्तर प्रदेश की बदायूं तहसील के परिषदीय स्कूलों में मिड डे मील बनाने का ठेका एन जी ओ को दिए जाने के विरोध में और अन्य मांगों को लेकर प्रगतिशील रस

पूंजी द्वारा श्रम पर किया गया सबसे भीषण हमला

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मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

दुनिया भर में उठी आवाज : ट्रम्प-नेतन्याहू खूनी हैं!

28 फरवरी को जैसे ही अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके पिट्ठू इजरायल ने ईरान पर मनमाने तरीके से हमला बोला, वैसे ही दुनिया भर में इस अन्यायपूर्ण युद्ध के खिलाफ जनता के सड़कों

पी.एफ. की योजनायें मालिक के नाम

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सरकार रोजगार को बढ़ावा देने के लिये तरह-तरह की योजनायें लाती रहती है। खासकर ऐसी योजनायें जिससे पूंजीपतियों को भी लाभ मिल सके। जैसे स्प्री स्कीम (SPREE SCHEME), प्रधानमंत्र

मुशरिक

/musharik

‘‘सफर कैसा रहा?’’  ट्रे में पानी का गिलास पेश करते हुए बीवी ने जानना चाहा। ‘‘हम्म सफर में तो खैर रही। धागा बांध दिया है। देखें कब खुदा मुराद बक्शे। शायद मेरी इबादत में को

आपका नजरिया- मासूम फरिश्तों को मारते-नोंचते घृणित साम्राज्यवादी/अमरीका

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आज जब आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, तब तक अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किये गये हमले को 15 दिन से अधिक हो चुके हैं। यह हमला अमेरिका ने अमेरिका व ईरान के बीच चल रही समझौता वार

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है!

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सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

अमरीका-इजरायल का ईरान के विरुद्ध युद्ध

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।