बीजों के रखवाले -फवाज तुर्की

जला डालो हमारे खेत खलिहान
जला डालो हमारे सपने
छिड़क दो तेजाब हमारे गीतों पर
कत्ल किए गये हमारे लोगों के
लहू के ऊपर चाहे तो फैला दो
बुरादों की मोटी परत
अपने नए ईजादों से इस तरह लपेट दो 
हमारी गर्दन 
कि अंदर ही अंदर घुट जाए 
तुम्हारी कैद में बंदी देशभक्तों के
सारे उद्धोधन आजादी के
खाक कर डालो
नष्ट कर डालो
हमारी हरियाली और मिट्टी
नेस्तनाबूद कर डालो हमारे खेत और गांव
एक-एक चुन कर
जो हमारे पुरखों ने बनाए थे जतन से
अपने बम फेंको इस ढब कि 
कोई शहर कोई कस्बा बचने न पाए
जमींदोज हो जाए
एक-एक दरख्त एक-एक घर
एक-एक किताब एक-एक कानून
सभी घाटियां समतल कर डालो
फरमानों का चाहे तो ऐसा रेला झोंको, 
कि बिल्कुल न बचे हमारा अतीत 
आंधी में उड़ जाए हमारा साहित्य
हमारी कल्पनाएं और रूपक
हमारी धरती जंगलों को ऐसा उजाड़ो
कि एक पिद्दी से मकोडे को भी
कहीं छुपने की जगह न मिल पाए
इतना करो या मुमकिन हो तो
इससे भी ज्यादा वीभत्स कुछ कर डालो
मैं तुम्हारी दरिंदगी से डरने वाला नहीं
मैं पूरे एहतिहात के साथ बचा लूंगा
दरख्त का वह बीज
जो पीढ़ियों से हमारे पुरखों ने
खूब जतन से बचा रखा था
उस बीज को मैं फिर से रोप दूंगा
अपनी मातृभूमि की मिट्टी पर
        (साभार : नवजीवन)

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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