पूंजीवादी समाज के बारे में एक लम्बे समय से यह स्थापित रहा है कि पैसा ही इसकी एकमात्र नैतिकता है। इसकी बाकी सारी नैतिकताएं इस पैसे की सेवा के लिए ही होती हैं। इतना ही नहीं, पैसा वह विलायक होता है जो पहले की सारी नैतिकताओं का विलयन कर देता है। अब पैसा ही आदि और अंत हो जाता है। वह भगवान को स्थानापन्न कर देता है- भगवान जितना ही अमूर्त और उतना ही सर्व विद्यमान और सर्व शक्तिमान। भगवान के सौदागरों और भक्तों का भी पैसे के बिना काम नहीं चलता।
पूंजीवादी समाज की सारी नैतिकताएं पैसे की सेवा के लिए होती हैं पर पैसा स्वयं किसी भी नैतिकता से परे होता है। वह अपने आप में ही नैतिकता होता है। स्व-प्रसार उसका सर्वप्रमुख गुण है- ज्यादा से ज्यादा पैसा। और इसके लिए पैसा किसी भी नैतिकता की ऐसी-तैसी कर देता है। ‘न बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’।
इस सबका सहज-स्वाभाविक निष्कर्ष यह निकलता है कि समूचा पूंजीवादी समाज, खासकर इसके नियंता एक या दूसरे किस्म के पाखंड में लिप्त होते हैं। यदि पूंजीवाद में पैसा ही सब कुछ है तो इसे इसी रूप में घोषित कर इसके हिसाब से आचरण ही किसी को पाखंड मुक्त कर सकता है। पर पूंजीपति वर्ग ऐसा नहीं करता। इसके बदले वह भांति-भांति की नैतिकताएं घोषित करता है। स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व, जनतंत्र, परिवार, कानून का शासन, निजता, इत्यादि इसकी घोषित नैतिकताएं हैं। इसके अलावा चोरी न करना, झूठ न बोलना, इत्यादि पहले से चली आ रही नैतिकताएं तो हैं ही।
पूंजीवाद जिस तरह से अस्तित्व में आया, जिस तरह से वह पैदा और विकसित हुआ, उसे जानने वाला कोई भी व्यक्ति साथ ही यह भी जानता है कि यदि पूंजीपति वर्ग ने उपरोक्त नैतिकताओं का पालन किया होता तो पूंजीवाद अस्तित्व में ही नहीं आता। प्रूधों ने कभी कहा था कि समस्त निजी सम्पत्ति चोरी है। और पैसा तो निजी सम्पत्ति का सबसे अमूर्त रूप है जिसकी कोई सीमा नहीं हो सकती। भौतिक पदार्थ के रूप में निजी सम्पत्ति की सीमा हो सकती है पर खाते में दर्ज पैसे की क्या सीमा हो सकती है?
अब यदि सारी निजी सम्पत्ति चोरी है तो चोरी न करने की नैतिकता का क्या रह जाता है? यही कि व्यवस्था द्वारा मान्य चोरी को चोरी नहीं माना जायेगा। ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति’। निजी सम्पत्ति का संचय मेहनत करने वालों के श्रम के शोषण से होता है यानी शोषक मेहनतकशों के श्रम का एक हिस्सा हड़प लेते हैं। गुलाम मालिक गुलाम से, सामंत भूदास या किसान से तथा पूंजीपति मजदूर से यह हड़प लेते हैं। निजी सम्पत्ति की व्यवस्था में इसे चोरी या डकैती नहीं माना जाता। चोरी या डकैती तब माना जायेगा जब इस तरह हासिल की गयी निजी सम्पत्ति को कोई दूसरा चुपके से या जोर-जबर्दस्ती से हड़प ले। निजी सम्पत्ति की व्यवस्था में केवल इसे ही गलत, अनैतिक या अपराध माना जाता है।
लेकिन चोरी-डकैती की इस संकीर्ण परिभाषा को भी पूंजीपति वर्ग ने खुद कभी नहीं माना। बहुत पहले पुनर्जागरण काल में इटली के व्यापारिक नगरों (वेनिस, फ्लोरेंस, जिनेवा) के व्यापारिक पूंजीपतियों ने दूसरे देशों में लूटपाट के लिए बड़ी नौसेना खड़ी कर ली थी। बैजन्तिया साम्राज्य भी इन लुटेरों का सम्मान करता था। उसके बाद डच, पुर्तगाली, स्पेनी, अंग्रेजी और फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियों के दुनिया भर में लूटपाट के कारनामों से इतिहास का हर विद्यार्थी परिचित है। इस लूटपाट ने यूरोप में पूंजीवाद के विकास के लिए प्रारंभिक पूंजी जुटाई। इतना ही नहीं, इन पूंजीपतियों ने स्वयं अपने देश की मेहनतकश जनता को भी उसी तरह लूटा। इंग्लैण्ड में बाड़ाबंदी अभियान की वहां के औद्योगिक पूंजीवाद के विकास में क्या भूमिका थी, इसका विस्तृत वर्णन मार्क्स अपनी ‘पूंजी’ में कर गये हैं। इस अभियान ने एक ओर किसानों को देहातों से खदेड़ कर शहरों में मजदूर बनने की ओर धकेला तो दूसरी ओर खाली हुयी जमीनों को भेड़ों की चरगाह में बदल दिया जिनका ऊन ऊनी कपड़ा उद्योग के लिए कच्चा माल होता था। लूटपाट के इस सिलसिले में अफ्रीकी गुलामों के व्यापार की चर्चा न करना ही बेहतर है जिसमें यूरोप के राजघराने भी लिप्त होते थे।
बात केवल निजी सम्पत्ति की लूटपाट तक ही सीमित नहीं थी। इस प्रक्रिया में कौन से अपराध थे जो पूंजीपति वर्ग ने नहीं किये? कौन से कुकर्म थे जो उन्होंने नहीं किये? कौन सी नैतिकता थी जो उन्होंने नहीं तोड़ी। 1757 से लेकर 1947 तक भारत का इतिहास ही इसे बताने के लिए पर्याप्त है।
ऐसा नहीं है कि एक बार अस्तित्व में आ जाने और स्थापित हो जाने के बाद पूंजीपति वर्ग ‘सुधर’ गया। ऐसा कुछ नहीं हुआ। बस उसकी लूटपाट और कुकर्मों के ऊपर ‘कानून का शासन’, ‘जनतंत्र’ इत्यादि की चादर डाल दी गयी। जैसे कोई नया-नया उभरा पूंजीपति बाद में ‘सभ्य’ हो जाता है वैसे ही समूचा पूंजीपति वर्ग ‘सभ्य’ हो गया। भारत के टाटा-बिड़ला (जो चीन को अफीम के गैर-कानूनी व्यापार से धनी हुए थे) और अमेरिका के ‘टाबर बैरन्स’ सब कालान्तर में ‘सभ्य’ हो गये। उसी तरह पश्चिमी साम्राज्यवादी भी बाद में ‘सभ्य’ हो गये। यानी उन्होंने अब अपने कुकर्मों को सात परतों में छुपा दिया। पर उनके लाख छिपाने के बाद भी उनके कुकर्म समय-समय पर ज्वालामुखी के लावा की तरह बाहर आते रहे हैं जिसे तब समूचा पूंजीपति वर्ग एक अपवाद या एक अपराध की तरह बताने की कोशिश करता है।
पूंजीपति वर्ग ने बहुत सारे अनैतिक या आपराधिक कारनामों से मुक्ति का एक तरीका यह निकाला कि उसने उन्हें कानूनी बना दिया। वेश्यावृत्ति मानव सभ्यता में हमेशा से अनैतिक और अक्सर अपराध रही है। अब पूंजीपति वर्ग ने उसे काम (वर्क) घोषित कर अनैतिकता और अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। इसी तरह जनतंत्र में वोट की खरीद-बेच अनैतिक और अपराध मानी जाती थी। अब अमेरिका ही नहीं, भारत में भी यह भांति-भांति के तरीके से जायज बना दी गयी है।
पर इस सबके बावजूद पैसा है कि उसकी भूख शांत ही नहीं होती। वह स्व-प्रसार की व्याकुलता में नित नये रास्ते तलाश लेता है। यहां तक कि बाबाओं के नैतिक उपदेश भी पैसा कमाने के जरिया बन जाते हैं। भक्तगण जन पाते हैं कि उन्हें ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का पाठ पढ़ाकर या आध्यात्मिक शांति का पाठ पढ़ा कर उनसे हासिल किये गये पैसे से बाबा खूब महंगे उपभोक्तावादी सामान चमका रहे हैं तो वे अतिशय ठगा महसूस करते हैं।
कोई जमाना रहा होगा जब पूंजीवादी नेता शायद वास्तव में सोचते रहे होंगे कि वे अपनी राजनीति से समाज की सेवा कर रहे हैं। हालांकि ऐसा नामुमकिन ही लगता है। यदि महान फ्रांसीसी क्रांति के दौरान पूंजीवादी क्रांतिकारी नेता भ्रष्टाचार में लिप्त थे, यह भली-भांति जानते हुए भी कि पकड़े जाने पर उनका गिलोटीन पर चढ़ना तय है तो सामान्य समय में उनके व्यवहार की कल्पना ही की जा सकती है। पूंजीवादी राजनीति हमेशा से एक व्यवसाय रही है तब से जब से चुने हुए प्रतिनिधियों को कोई तनख्वाह नहीं मिलती थी। और व्यवसाय तो मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है। निवेश पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना हर व्यवसाय का लक्ष्य होता है। ऐसे में पूंजीवादी नेता से अपने व्यवसाय में धर्मार्थ काम करने की उम्मीद करना हद दर्जे की मासूमियत है। और यह सभी जानते हैं कि पूंजीवाद में हर व्यवसाय में कानूनी और गैर-कानूनी की सीमा अत्यन्त धुंधली होती है। ऐसे में यदि भारत में किसी नेता के घर से यदि नोटों की बोरियां या अलमारियां बरामद होती हैं तो यह केवल इसी बात का प्रमाण होता है कि वह पैसे को ठिकाने लगाने के मामले में अत्यन्त अनाड़ी है। इसका प्रमाण तो बिल्कुल नहीं होता कि बाकी नेता दूध के धुले हैं।
और नेता अपनी नेतागिरी का यह व्यवसाय बिना पूंजीपति वर्ग की मिलीभगत के नहीं कर सकते। और कुछ नहीं तो केवल इसलिए कि पूंजीवाद में पूंजीपति वर्ग ही लगभग समस्त पूंजी का मालिक होता है। ऐसे में पूंजीवादी नेताओं का व्यवसाय उनके साथ मिलकर उनके छोटे साझीदार के रूप में ही चल सकता है। राजनीतिक अर्थशास्त्र में इनकी पूंजी को नौकरशाह पूंजी कहा गया है क्योंकि वे सरकारी नौकरशाही का इस्तेमाल कर पूंजी हासिल करते हैं।
पूंजीवाद में नैतिकता की स्थिति में ये बातें क्यों की जा रही हैं? इसलिए कि आज दुनिया भर में नैतिकता की चिल्ल-पों चल रही है। प्रसंग है कुख्यात यौन अपराधी जेफरी एपिस्टिन का। दुनिया भर के तमाम नामी-गिरामी लोग इस अपराधी के साथ उसके अड्डे पर रंग-रेलियां मनाते पकड़े गये। यह सिलसिला सालों-साल चला। यहां तक कि उसके 2008 में अपराधी साबित होने और सजा काटने के बावजूद। अंत में जब पानी सिर से गुजरने लगा तो इस मुजरिम को 2019 में जेल भेज दिया गया और फिर अत्यन्त सुविधापूर्वक उसे इस दुनिया से ही विदा कर दिया गया।
दुनिया भर की तरह भारत में भी नैतिकता की काफी चिल्ल-पों है। सब अपने आपको इस प्रकरण से स्तब्ध हुआ दिखा रहे हैं। यह जता रहे हैं कि उनकी कल्पना से बाहर था कि दुनिया भर के नामी-गिरामी लोग इस तरह के कुकर्म में लिप्त हो सकते हैं। यह परले दरजे का पाखंड है पर सभी इस स्वांग में शामिल हैं।
अपने देश की स्थिति पर थोड़ा गौर किया जाये। आज हमारे देश की राजनीति के शीर्ष पर दो ऐसे लोग हैं जो केवल ‘सबूतों के अभाव’ में ही जेल से बाहर हैं। देश की राजनीति की जरा भी खबर रखने वाला कोई भी आदमी उन्हें निर्दोष नहीं मानता। इनके अपराधों में वसूली, हत्या, दंगा, यौन शोषण, इत्यादि सब शामिल हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि दिन-रात नैतिकता की कसम खाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वयं सेवक संगठन उनके पीछे खड़ा है और उन्हें अपना नैतिक-भौतिक समर्थन दे रहा है। भक्तगण उन्हें लगभग पूजते हैं और उनकी ‘मर्दानगी’ पर इतराते हैं।
जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं।
ऐसे में जेफरी एपिस्टिन का गुनाह भला क्या है? यही कि उसने इस्राइली खुफिया एजेन्सी मोसाद के एजेन्ट के तौर पर दुनिया भर के नामी-गिरामी लोगों को अपने जाल में फंसाया जिससे जरूरत पड़ने पर उनका भया-दोहन किया जा सके। और मोसाद का अमरीकी एजेन्ट क्या सीआईए की निगाह से बच सकता है, वह भी तब जब उसने अमेरिका के तट पर ही समुद्र में अपनी ऐशगाह बना रखी हो। यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि एपिस्टिन का धंधा दरअसल मोसाद-सीआईए का एक खुफिया मिशन था। कम से कम इतना तो था ही कि ये दोनों खुफिया एजेन्सियां उसका इस्तेमाल कर रही थीं।
और खुफिया एजेन्सियों को तो चाणक्य के जमाने से ही सारी नैतिकताओं से परे माना जाता रहा है। चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ को पढ़कर कोई भी इससे मुतमइन हो सकता है। जो सभ्य समाज में त्याज्य माना जाता है वह सारा वहां जायज होता है। और वे अपना सारा गोरखधंधा करने में कामयाब क्यों हो जाते हैं? क्योंकि नामी-गिरामी लोगों के लिए नैतिकता केवल दिखावे की चीज होती है। असल में वे हमेशा ‘पतित होने’ के लिए या बिकने के लिए तैयार होते हैं।
पूंजीवाद और खासकर आज का पूंजीवाद कैसा है उसे इस तथ्य से समझा जा सकता है वह यह कि एपिस्टिन से सबसे ज्यादा लम्बे समय तक ताल्लुक रखने वाला आदमी आज दुनिया के सबसे ताकतवर देश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा है और अपनी कार्रवाईयों से दुनिया का भविष्य तय कर रहा है। यह शख्स एपिस्टिन की ऐशगाह पर कभी-कभार गया नहीं था बल्कि लम्बे समय तक उसका दोस्त था। यौन सम्बन्धों के मामले में वह उसका हमराह था। एपिस्टिन के खतो-किताबत में सबसे ज्यादा नाम उसी का है। और यह आदमी पूरी बेहयाई और ढिठाई से अपनी संलिप्तता को झुठला रहा है। एपिस्टिन से संबंध के कारण दुनिया के किसी भी आदमी का चाहे जो बिगड़ जाये पर इस आदमी का कुछ नहीं बिगड़़ने वाला। क्योंकि उसकी पार्टी के लोग उसका कुछ नहीं बिगड़ने देंगे। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति के चलते उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है। महाभियोग चला कर उसे पद से हटाया जा सकता है और फिर जेल भेजा जा सकता है। पर ऐसा नहीं होगा। क्योंकि उसकी पार्टी के सांसद ऐसा होने नहीं देंगे। और ये ही सांसद सबसे ज्यादा पारिवारिक मूल्यों की कसमें खाते हैं। वे खुद को नैतिकता के पुजारी की तरह पेश करते हैं।
आज की पूंजीवादी दुनिया के लिए इससे बड़ा आईना और क्या हो सकता है कि इसके ‘सबसे पुराने लोकतंत्र’ और ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के शीर्ष पर ऐसे लोग विद्यमान हैं। इस दुनिया को अपने संचालक के तौर पर इनसे ज्यादा बेहतर व्यक्ति नहीं मिल रहा है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि इनसे बेहतर इस दुनिया को चला ही नहीं सकता। इस पतित दुनिया को ऐसे ही पतित नेता चाहिए।
एक महान क्रांतिकारी ने ठीक ही कहा था कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए इंकलाब केवल इसीलिए जरूरी नहीं है कि सत्तानशीन वर्गों को किसी और तरीके से सत्ता से बेदखल नहीं किया जा सकता बल्कि इसलिए भी जरूरी है कि केवल इंकलाब की भट्ठी में तप कर ही मजदूर-मेहनतकश जनता स्वयं नये समाज के निर्माण लायक बन सकती है। केवल इंकलाब में ही, जब वह अपनी जान की बाजी लगाकर सड़क पर उतरती है, वह पूंजीवादी कलुष से खुद को मुक्त कर सकती है। नये समाज का निर्माण करने वाले लोग आसमान से नहीं टपकेंगे बल्कि इंकलाब की ज्वाला से उत्पन्न होंगे। वह इंकलाब जो पूंजीपति वर्ग को उसके समस्त पापों समेत भस्म करेगा वह मजदूर-मेहनतकश जनता को इस तरह पाप मुक्त भी करेगा कि वे एक नये समाज का निर्माण कर सकें- पैसे से मुक्त, निजी सम्पत्ति से मुक्त, वर्ग-विहीन-शोषण विहीन समाज का।