साम्राज्यवाद और अभिजात मजदूर वर्ग

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Sat, 05/16/2026 - 15:50
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1914 में जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ तो यूरोप में एक बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक परिघटना सामने आई जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। यहां तक कि किसी बड़े पैमाने के युद्ध की बात सालों से की जा रही थी पर उक्त परिघटना की कोई चर्चा नहीं थी। यह परिघटना थी तब के संगठित मजदूर आंदोलन का एक झटके से ध्वस्त हो जाना। यह एकदम प्रत्याशित था। 
    
उक्त परिघटना की गुरुता को समझने के लिए कुछ तथ्यों को याद करना होगा। 
    
1848-50 की यूरोप व्यापी क्रांतियों में मजदूर वर्ग ने बढ़़-चढ़कर भूमिका निभाई थी। उसने जून 1848 में पेरिस में सत्ता पर कब्जा करने का भी प्रयास किया था। पर इन क्रांतियों की असफलता के बाद मजदूर आंदोलन करीब एक डेढ़ दशक तक सुप्तावस्था में चला गया। 1860 के दशक में जाकर ही यूरोप के मजदूर आंदोलन में फिर उभार आना शुरू हुआ जिसकी एक अभिव्यक्ति मजदूरों के पहले इंटरनेशनल (अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ) का 1864 में गठन था। हालांकि यह इंटरनेशनल केवल बारह साल जीवित रहा पर इसने यूरोप में मजदूर पार्टियों की नींव डाली और तब से मजदूर आंदोलन क्रमशः आगे बढ़ता गया। 1880 के दशक के अंत तक मजदूर पार्टियां इतनी मजबूत हो गयीं कि उन्हें लेकर 1889 में दूसरे इंटरनेशनल का गठन किया गया। इसने अपनी बारी में मजदूर पार्टियों और मजदूर आंदोलन को और गति प्रदान की। स्थिति वहां पहुंच गयी जहां जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली इत्यादि देशों में मजदूर पार्टियां अपने देशों की सबसे बड़ी पार्टियां बन गयीं। फ्रांस जैसे देश में तो उन्हें पूंजीवादी सरकार में शामिल होने का न्यौता मिलने लगा। दूसरी ओर 1905-07 में रूस में मजदूर वर्ग क्रांति का असफल प्रयास कर चुका था। 
    
मजदूर आंदोलन की इस प्रगति से पूंजीपति वर्ग बेहद चिंतित था। उसकी चिन्ता वाजिब थी क्योंकि दूसरे इंटरनेशनल के नेतृत्व वाला यह संगठित मजदूर आंदोलन इंकलाब, समाजवाद और साम्यवाद की बात करता था। उसकी प्रेरक विचारधारा माक्र्सवाद थी और इंटरनेशनल के प्रस्तावों में बार-बार सुधारवाद को नकारकर क्रांति की बातें की जाती थीं। पूंजीपति वर्ग भयभीत था कि उसकी व्यवस्था की संकट की घड़ी में यह संगठित क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन उसकी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेगा। 
    
संकट की इन घड़ियों में एक था विश्व युद्ध का आसन्न खतरा। उन्नीसवीं सदी के अंत में स्वतंत्र प्रतियोगिता वाले पूंजीवाद के एकाधिकारी पूंजीवाद और इस तरह नये साम्राज्यवाद में बदलने के साथ साम्राज्यवादी देशों के बीच दुनिया के पुनर्बंटवारे की होड़ काफी बढ़ गयी थी। जर्मनी, जापान, इटली और सं.रा. अमेरिका जैसे नये साम्राज्यवादी देश पुराने साम्राज्यवादी देशों यथा इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, इत्यादि को चुनौती दे रहे थे। नयी सदी में इनकी क्रमशः बढ़ती तनातनी से सबको लगने लगा था कि इनके बीच कोई बढ़ा युद्ध छिड़ने वाला है जिसमें न केवल यूरोप बल्कि बाकी दुनिया भी घसीट ली जायेगी। यह विश्व युद्ध होगा। 
    
आसन्न विश्व युद्ध की इसी आशंका के बीच तब इंटरनेशनल ने 1908 और 1912 में दो बैठकों में इस पर विचार किया। यह तय किया गया कि यह विश्व युद्ध पूंजीपति वर्ग का आपस में लुटेरों का युद्ध होगा- लूट के बंटवारे को लेकर। इसीलिए मजदूर वर्ग को न केवल इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए बल्कि इसका विरोध करना चाहिए। युद्ध शुरू होने पर हर देश की मजदूर पार्टी को अपनी सरकार का विरोध करना चाहिए और युद्ध से पैदा हुए संकट का इस्तेमाल कर क्रांति करने का प्रयास करना चाहिए। संगठित मजदूर वर्ग का नारा होना चाहिए- साम्राज्यवादी युद्ध को गृह युद्ध में बदल दो। 
    
दूसरे इंटरनेशनल के लगभग सर्वसम्मति से पारित इन प्रस्तावों को देखते हुए हर कोई उम्मीद कर रहा था कि विश्व युद्ध छिड़ने की स्थिति में हर देश का मजदूर वर्ग क्रांति की राह पर चल पड़ेगा। कुछ लोग तो यह भी उम्मीद करने लगे थे कि हो सकता है कि पूूंजीपति वर्ग इस डर के मारे विश्व युद्ध की ओर न जाये। स्वयं पूंजीपति वर्ग कम आशंकित नहीं था। 
    
लेकिन जब अंततः अगस्त 1914 में विश्व युद्ध शुरू हुआ तो यह उम्मीद और आशंका दोनों निर्मूल साबित हुये। कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग समूचा संगठित मजदूर आंदोलन अपनी-अपनी सरकारों के पीछे गोलबंद हो गया। मजदूर पार्टियां क्रांति की माला जपना भूलकर अपनी-अपनी सरकारों का समर्थन करने लगीं और युद्ध में अपने देश की जीत की कामना करने लगीं। ‘साम्राज्यवादी युद्ध को गृह युद्ध में बदलो’ का नारा भूलकर ये पार्टियां देशभक्त हो गयीं। उनका अंतर्राष्ट्रवाद चुटकियों में काफूर हो गया। दूसरे इंटरनेशनल का एक झटके से पतन हो गया। 
    
यूरोप के संगठित मजदूर आंदोलन के इस शर्मनाक पतन से स्तब्द्ध रह जाने के बाद फिर वे लोग इसकी शव परीक्षा की ओर उन्मुख हुए जो हार मानने को तैयार नहीं थे और जो क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन को नये सिरे से संगठित करने को उद्यत थे। लेनिन इनमें सर्वप्रमुख थे। 
    
उनके द्वारा गहन परीक्षण से स्पष्ट हुआ कि यूरोप के संगठित मजदूर आंदोलन के इस पतन का कारण वही था जो स्वयं तब के विश्वयुद्ध का भी कारण था। यानी दोनों एक ही कारण के परिणाम थे। दोनों के ही मूल में था साम्राज्यवाद।
    
उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में जिस साम्राज्यवाद का उदय हुआ था उसके तहत कुछ मुट्ठी भर विकसित पूंजीवादी देशों ने बाकी दुनिया पर कब्जा कर लिया था। इन देशों का एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने केवल अपने देशों के मजदूरों का शोषण कर रहा था बल्कि वह बाकी कब्जे वाले इलाकों के मजदूरों-मेहनतकशों को भी लूट रहा था। इस तरह वह अतिरिक्त मुनाफा कमा रहा था। इस अतिरिक्त मुनाफे के चलते विकसित देशों के पूंजीपति वर्ग को यह सुविधा हासिल थी कि वह इस अतिरिक्त मुनाफे का एक छोटा सा हिस्सा घूस के तौर पर अपने देश के संगठित मजदूर वर्ग के ऊपरी हिस्से को दे दे, खासकर उसके नेताओं को। इन देशों में अभी भी संगठित मजदूर वर्ग समस्त मजदूर वर्ग का अल्पमत ही था- अक्सर ही एक तिहाई या एक चैथाई। उसका भी ऊपरी हिस्सा और छोटा बनता था। घूस से उसे खरीदने में पूंजीपति वर्ग को ज्यादा नहीं खर्च करना था। कुछ बेहतर मजदूरी और बोनस तथा नेताओं को कुछ विशेषाधिकार इसके लिए पर्याप्त थे। मजदूर आंदोलन की प्रगति के साथ पूंजीपति वर्ग ने यही नीति अपनाई- पहले अचेत तौर पर तथा फिर सचेत तौर पर। उसने दमन के बदले आत्मसातीकरण का रास्ता चुना। परिणाम यह निकला कि संगठित मजदूर वर्ग का ऊपरी हिस्सा क्रमशः पालतू बनता चला गया। क्रांतिकारी प्रस्तावों और नारों की आड़ में सुधारवाद क्रमशः हावी होता चला गया। और जब परीक्षा की घड़ी आई तो पता चला कि न केवल घोषित सुधारवादी बर्नस्टीन बल्कि घोषित क्रांतिकारी काउत्स्की भी एक ही पाले में खड़े थे। संगठित मजदूर आंदोलन का ज्यादातर हिस्सा सुधारवादी और पूंजीपति वर्ग का पिछलग्गू बन चुका था और उसका पतन हो गया। 
    
दूसरे इंटरनेशनल के पतन की राख से फीनिक्स पक्षी की तरह क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन फिर क्रमशः खड़ा हुआ तथा रूसी क्रांति से आवेग ग्रहण करते हुए वह नयी दिशा में चल पड़ा जिसके परिणामस्वरूप दूसरे विश्व युद्ध के समापन पर दुनिया में एक पूरा समाजवादी खेमा ही अस्तित्व में आ गया। यह अलग गाथा है। 
    
अभी उपरोक्त चर्चा का उद्देश्य आज साम्राज्यवादी देशों में अभिजात मजदूर वर्ग की स्थिति पर कुछ बात करना है। 
    
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था। 
    
‘कल्याणकारी राज्य’ ने अभिजात मजदूर वर्ग परिघटना को आगे बढ़ाया और इसने एक बार फिर संगठित मजदूर आंदोलन को पालतू बनने की ओर ढकेला। एक बार फिर क्रांति की बात करने वाली मजदूर पार्टियां क्रांति का रास्ता छोड़कर सुधार के रास्ते पर चल पड़ीं और पूंजीपति वर्ग की पिछलग्गू बन गईं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक-डेढ़ दशक में यह प्रक्रिया मुकम्मल हो गयी। 
    
उसके बार नया दौर आया। 1980 के दशक से साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग ने उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के नाम से ‘कल्याणकारी राज्य’ तथा दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश जनता पर हमला बोल दिया। इसकी जद में उसके अपने देशों का मजदूर वर्ग भी था। इस हमले का उद्देश्य था पूंजीपति वर्ग के गिरते मुनाफे को रोकना और उसे बढ़ाना। कहना न होगा कि पूंजीपति वर्ग पिछले तीन-चार दशकों में अपनी इस मुहिम में खासा सफल रहा है। न केवल उसका मुनाफा गिरना रुका बल्कि वह तेजी से बढ़ना शुरू हो गया। आज दुनिया का पूंजीपति वर्ग आय और दौलत के मामले में एक सदी पहले वाली स्थिति में पहुंच गया है। ऊपर की एक प्रतिशत आबादी आज कुल आय के बीस प्रतिशत से ज्यादा तथा कुल दौलत के साठ प्रतिशत से ज्यादा की मालिक है। अमीर-गरीब की खाई तेजी से बढ़ती जा रही है। तथाकथित मध्यम वर्ग सिकुड़ता जा रहा है। 
    
उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के तहत साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग ने न केवल बाकी देशों की मजदूर-मेहनतकश जनता को बेतहाशा लूटा है बल्कि उन्होंने अपने देश के मजदूर वर्ग को भी बदहाली में ढकेला है। उसकी मजदूरी-बोनस, इत्यादि में सापेक्षिक कटौती हुई है। उसकी काम की स्थितियां खराब हुई हैं। काम की अनिश्चितता बढ़ी है तथा काम के घंटे भी। इसी के साथ उन्हें मिलने वाली सरकारी राहत में कटौती हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य सब महंगा हुआ है तथा उनका स्तर गिरा है। इन सबकी वजह से भुखमरी भी बढ़ी है। 
    
साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपति वर्ग ने विकेन्द्रीकृत केन्द्रीकरण के तहत जब उद्योगों का पिछड़े देशों में स्थानांतरण किया तथा सेवा क्षेत्र की आउटसोर्सिंग की तो इससे पूंजीपति वर्ग का मुनाफा बढ़ा पर देशी मजदूर वर्ग की हालत खस्ता हुई। रही-सही कसर इन देशों में कानूनी, गैर-कानूनी अप्रवासियों की आमद ने पूरी कर दी। 
    
इन सबके फलस्वरूप साम्राज्यवादी देशों के मजदूर वर्ग की हालत आम तौर पर खस्ता हुई। न केवल बहुलांश असंगठित मजदूर वर्ग इससे प्रभावित हुआ बल्कि संगठित मजदूर वर्ग भी। अमेरिका जैसे देशों में यूनियनीकरण एक चैथाई से छः-सात प्रतिशत तक आ गया। 
    
इसका सीधा असर अभिजात मजदूर वर्ग पर पड़ा। उसकी संख्या और हैसियत में कमी आई। वह सिकुड़ गया। उसकी सौदेबाजी की क्षमता घट गयी। घटती आय के कारण वह कर्ज में डूबने लगा।
    
ऐसा नहीं है कि साम्राज्यवादी देशों में अभिजात मजदूर वर्ग अब नहीं रह गया है या आम मजदूरों से संगठित मजदूरों का भेद नहीं रह गया है। पर अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। 
    
साम्राज्यवादी देशों में मजदूर वर्ग की इस बदलती स्थिति की दो राजनीतिक अभिव्यक्तियां मुखर हैं। एक है मजदूर वर्ग के एक हिस्से का दक्षिणपंथ या धुर दक्षिणपंथ की ओर जाना तथा दूसरा साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध। ये दोनों प्रवृत्तियों विपरीत लगती हैं पर असल में एक ही जमीन से पैदा होती हैं। 
    
साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग ने अपनी उदारीकरण-वैश्वीकरण की परियोजना से तबाह अपने मजदूर वर्ग के असंतोष को अपनी व्यवस्था के खिलाफ उन्मुख होने से रोकने के लिए उसे अंध-राष्ट्रवाद की ओर धकेला है। वही पूंजीपति वर्ग जो पूंजी के वैश्वीकरण से फायदा उठाता है, वही असंतुष्ट मजदूर वर्ग को अंधराष्ट्रवाद की ओर धकेलता है। वही पूंजीपति वर्ग जो अप्रवासियों का शोषण करता है वही अपने असंतुष्ट मजदूर वर्ग को उनके खिलाफ भड़काता है। सही चेतना न होने के चलते तबाह मजदूर अपने वर्ग बंधुओं के खिलाफ व अपने वर्ग शत्रुओं के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। इसी के चलते वह ट्रंप जैसे लोगों के पीछे गोलबंद हो जाता है जो उसकी तबाही के सबसे बड़े कारण हैं। वह ट्रंप के इस झांसे में आ जाता है कि वह दुनिया भर में ‘अमरीकी युद्धों’ को बंद कर अमेरिकी मजदूर वर्ग की हालत बेहतर करने पर ध्यान देगाा। कि वह फिर उद्योग व रोजगार अमेरिका ले आयेगा। कि वह आउटसोर्सिंग बंद करेगा जिससे अमरीकियों को काम मिले। कि अप्रवासियों से अमेरिका को मुक्त करेगा जिससे अमरीकी संसाधन व रोजगार अमेरिकियों को मिलें। यह अकारण नहीं है कि ट्रंप को गोरे अमरीकी मजदूरों के बहुमत का समर्थन मिला, उनका जो डेमोक्रेटिक पार्टी के परंपरागत मतदाता हुआ करते थे। 
    
इन मजदूरों को ट्रंप की यह बात भाती थी कि अमेरिका बेवजह सारी दुनिया में युद्ध में उलझा हुआ है। और इन युद्धों को बंद होना चाहिए। साम्राज्यवादी लूट का हिस्सा न केवल इन मजदूरों को नहीं मिल रहा है बल्कि उनकी हालत खराब हो रही है। ऐसे में इन्हें ये युद्ध अपने लिए नुकसानदेह ही लगेंगे। 
    
साम्राज्यवादी देशों के जनमानस में साम्राज्यवादी युद्धों के खिलाफ बढ़ता आक्रोश इसी जमीन से पैदा होता है। उन्हें ये युद्ध न केवल निरर्थक बल्कि अपने लिए नुकसान देह भी लगते हैं। इन देशों के मजदूर वर्ग का अत्यन्त छोटा हिस्सा ही इन युद्धों के साम्राज्यवादी चरित्र को समझता है पर वह इतना जरूर महसूस करता है कि ये युद्ध उसके हित में नहीं है। यह हकीकत का चेतना में प्रतिबिम्ब है। 
    
आज साम्राज्यवादी देशों में अभिजात मजदूर वर्ग पहले के मुकाबले काफी सिकुड़ा और हैसियत में काफी कम है। इसीलिए पूंजीवादी राजनीति में संगठित मजदूर वर्ग की वह पूछ नहीं रह गयी है जो पहले कभी हुआ करती थी। यहां तक कि यू के की लेबर पार्टी में भी कोई पूछ नहीं है जो पहले ट्रेड यूनियन फेडरेशनों पर आधारित पार्टी हुआ करती थी। 
    
इसके बावजूद इसका नेतृत्व पहले से ज्यादा पालतू और अकिंचन हो गया है। वह शासक पार्टियों के सामने रिरियाता है। वह ‘कल्याणकारी राज्य’ के अवशेषों को बनाये रखने में ही अपनी सार्थकता देखता है। वह अब सुधारवादी भी नहीं रह गया है। 
    
साम्राज्यवादी देशों में मजदूर वर्ग और अभिजात मजदूर वर्ग की यह स्थिति वहां क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन के लिए नयी संभावनाएं व चुनौतियां पेश करती है। इन चुनौतियों का सामना कर ही संभावनाओं को फलीभूत किया जा सकता है। 

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