जनसंख्या और हिन्दू फासीवादियों का कुचक्र

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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बीते 26 मई को यानी संघी सरकार की बारहवीं वर्षगांठ पर केन्द्र की संघी सरकार ने एक ‘डेमोग्राफी कमेटी’ का गठन किया। इस कमेटी का काम देश के विभिन्न हिस्सों में जनसंख्या में किसी विशेष परिवर्तन की जांच करना है। असल उद्देश्य यह जांच करना है कि क्या किसी खास इलाके में मुसलमान आबादी में विशेष बढ़ोत्तरी हुई है। 
    
इस कमेटी में कोई जनंसख्या का विशेषज्ञ नहीं है यानी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो जनसंख्या में परिवर्तन का अध्ययन करने वाला हो। इस कमेटी के अध्यक्ष वे जज महोदय हैं जिन्होंने अफजल गुरू की फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी।
    
यह ध्यान रखने की बात है कि संघ एक लम्बे समय से ‘डेमोग्राफिक चेंज’ का हौव्वा खड़ा करता रहा है जिसका मतलब यह है कि मुसलमान जान बूझकर किसी इलाके की आबादी में अपना हिस्सा बढ़़ा रहे हैं। संघी प्रधानमंत्री ने पिछले 15 अगस्त के अपने भाषण में स्वयं इस मुद्दे को उठाया था और इसे देश के लिए खतरा बताया था। 
    
केन्द्र सरकार द्वारा इस ‘डेमोग्राफी कमेटी’ का गठन हवा में नहीं है। यह हिन्दू फासीवादियों के ज्यादा व्यापक कुचक्र का हिस्सा है। इसे इस समय चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण तथा अगले साल होने वाली जनसंख्या गणना से मिलाकर समझा जा सकता है। 
    
इसमें कोई शक नहीं है कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण मुसलमान मतदाताओं को लक्षित कर रहा है। यह इस समय उन्हें मतदाता सूची से हटा रहा है। बाद में उनकी नागरिकता पर सवाल खड़ा कर उन्हें उससे वंचित किया जायेगा। हिन्दू मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर होने पर नागरिकता खोने का खतरा भले ही न हो, मुसलमानों को यह खतरा जरूर है। यह गहन पुनरीक्षण प्रकारांतर से नागरिकता रजिस्टर तैयार करने की परियोजना है जिसका मुख्य निशाना मुसलमान होंगे। 
    
ऐसा ही कुछ आने वाली जनगणना में होने वाला है। बीते जुलाई में संघ के प्रांत प्रचारकों की एक तीन दिवसीय बैठक हुई जिसका एकमात्र मुद्दा आने वाली जनगणना था। इसका महत्व तब समझ में आता है जब इस तथ्य को ध्यान में रखा जाये कि सरकार ने भावी जनगणना में सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के अलावा निजी विद्यालयों के शिक्षकों तथा अन्यों को भी जनगणना करने के लिए नियुक्त करने का फैसला किया है। साथ ही इस जनगणना में व्यक्ति के पति या पत्नी का नाम भी पूछा जायेगा। 
    
उपरोक्त का निहितार्थ स्पष्ट है। होने वाली जनगणना में भारी मात्रा में संघ के कार्यकर्ता नियुक्त होंगे। उन्हें खासकर मुसलमान इलाकों में नियुक्त किया जायेगा। वे फिर जनगणना में क्या गुल खिलाएंगे इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इस समय मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में संघ के ‘पन्ना प्रमुखों’ की विशेष भूमिका है। वे मतदाता सूची में नाम जुड़वाने व हटवाने में विशेष भूमिका निभा रहे हैं। यही अब जनगणना में भी होने वाला है। 
    
ये तीनों प्रक्रियाएं 2027 के अंत तक सम्पन्न हो जानी हैं। इनका क्या अंतिम नतीजा निकलेगा यह भविष्य के गर्भ में है। पर संघियों की मंशा का अनुमान लगाया जा सकता है। वे मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को मतदान के अधिकार और नागरिकता से वंचित कर मलिन बस्तियों में ढकेलना चाहते हैं। वे मिश्रित इलाकों से मुसलमानों को खदेड़कर खास इलाकों में केन्द्रित करना चाहते हैं जिससे फिर उन्हें अन्य नागरिक सुविधाओं से वंचित किया जा सके। गुजरात में वे इसे एक हद तक हासिल कर चुके हैं। 
    
मतदान के अधिकार से वंचित नागरिकता विहीन मुसलमान जो मलिन बस्तियों में हिन्दू फासीवादियों के रहमो-करम पर जिन्दा हों, यह गोलवलकर के समय से ही हिन्दू फासीवादियों का सपना रहा है। यह उनके ‘हिन्दू राष्ट्र’ का अहम हिस्सा है। इसी के जरिये वे अपने हिन्दू राष्ट्र में हिन्दुओं का वर्चस्व कायम करना चाहते हैं। 
    
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के मामले में आज भारी जन आक्रोश का सामना करने के बावजूद हिन्दू फासीवादी सरकार हाल-फिलहाल पीछे हटने को तैयार नहीं है। वह अपने कुचक्र पर कायम है। उसे पीछे धकेलने के लिए और ज्यादा ताकत की जरूरत है। इसका भंडाफोड़ करने की जरूरत है कि कैसे जनगणना जैसे सामान्य काम को भी यह सरकार एक खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रही है।  

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