मनरेगा : नाम पर चर्चा असली खेल कुछ और

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हाल ही में मोदी सरकार ने मनरेगा ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को खत्म कर विकसित भारत जी राम जी बिल संसद के दोनों सदनों से पास कराकर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करा लिए हैं और अब यह एक एक्ट बन चुका है।
    
लगभग दो दशक से ज्यादा पुरानी रोजगार गारंटी ग्रामीण योजना अब कोई गारंटी की नहीं रह गई है। 100 दिन की जगह अब 125 दिन काम देने की तो गारंटी है पर यह योजना लागू होगी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। दरअसल मोदी सरकार ने इस योजना को भी अपने हिसाब से अपने मन मुताबिक अपने फायदे के लिए अपने राजनीतिक लाभ को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सके इस तरह से पूरा डिजाइन कर लिया है।
    
वैसे तो आज से दो दशक पहले मनरेगा भी इस व्यवस्था की असफलता का ही एक परिणाम थी ताकि शहरों में बेकार घूम रही आबादी, बेरोजगार आबादी और ज्यादा गंभीर रूप न ग्रहण कर पाए।
    
महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लायमेंट गारंटी एक्ट (डळछत्म्ळ।) को खत्म करने पर कांग्रेस पार्टी खूब हल्ला काटे हुए है। वह कह रही है कि इनको महात्मा गांधी से नफरत है इसलिए यह महात्मा गांधी का नाम हटा रहे हैं। आज भाजपा-आरएसएस ने दूसरी बार महात्मा गांधी की हत्या की है। और वहीं दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगा रही है कि इनको राम जी के नाम से नफरत है, ये हिंदू विरोधी हैं इसलिए इनको यह योजना पसंद नहीं आ रही है। वैसे तो आज भाजपा-आरएसएस राम के नाम पर कुछ भी कर दें, सब जायज है। 
    
कोई भी चीज एकाएक नहीं सड़ती है, न ही खराब होती है। एक प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे सड़ती है। पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों-मेहनतकशों को सीमित जनवाद ही मिलता है और वह भी समय के साथ-साथ और भी ज्यादा सिकुड़ता रहा है और आज तो केंद्र की मोदी सरकार सारे ही राज्यों की सरकारों को अपने ही हिसाब से चलाना चाहती है। अपने मनपसंद आदमी को राज्य का गवर्नर बनाना और उसके माध्यम से राज्य की नीतियों में राज्य के कामकाज में हस्तक्षेप करना, यहां तक कि विपक्षी पार्टियों की सरकारों को गिराना और अपनी सरकार बनाने में भी गवर्नर का पूरा इस्तेमाल करना। जीएसटी के माध्यम से राज्यों का टैक्स का हिस्सा अपने पास रखना और अब इसी कड़ी में इस योजना के माध्यम से भी राज्यों को पंगु बनाना, पूरी योजना को अपने मन मुताबिक अपने फायदे के लिए चलाना, राज्य के न मानने पर सारा ठीकरा राज्य पर फोड़ देना कि यही नहीं करना चाहते हैं और अलग-अलग राज्यों में चुनाव के वक्त इस योजना से पूरा वोट बैंक अपने लिए तैयार करना। चुनाव के वक्त गांव-गांव तक एक-एक व्यक्ति तक पैसा बांटने में भी इस योजना का पूरा इस्तेमाल किया जाएगा।         -दीपक (फरीदाबाद)
 

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।