गुजरात के सूरत शहर में शोषण व उत्पीड़न से तंग आकर मजदूरों ने आजकल एक नया आंदोलन शुरू किया है। इस आंदोलन को उन्होंने ‘गांव चलो आंदोलन’ नाम दिया है। इस आंदोलन के तहत भारी संख्या में मजदूर सूरत से अपने गांव लौट रहे हैं। इनमें भारी संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश के मजदूरों की है। खबरों के मुताबिक इस आंदोलन से कई हजार मजदूरों के जुड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।
सूरत शहर की आबादी 75 लाख से अधिक है जिसमें 15 लाख से अधिक प्रवासी मजदूरों की संख्या है। अभी त्योहार दूर है परन्तु मजदूर काफी समय पहले से ही अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं।
दरअसल कुछ दिनों पहले सूरत में टेक्सटाइल क्षेत्र के मजदूरों ने 8 घंटे काम व सप्ताह में 1 दिन की छुट्टी के लिए आवाज उठायी। इन मजदूरों का कहना था कि वे पूरे महीने 12-12 घंटे काम करते हैं। और जब अत्यधिक थकान या बीमारी के कारण वे छुट्टी कर लेते हैं तो उनकी तनख्वाह काट ली जाती है। सेठ (मालिक) लोग उनकी मजदूरी का पैसा या तो रोक लेते हैं या कभी देते ही नहीं हैं। मजदूरों का कहना है कि वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी अपने परिवार के साथ समय बिताने की जरूरत होती है।
शुरूआत में पुलिस और फैक्टरी मालिकों के गुण्डों ने मजदूरों के 8 घंटे काम के दिन और सप्ताह में 1 दिन की छुट्टी वाले आंदोलन को दबाने की कोशिश की लेकिन यह आंदोलन तेज होता गया। 12 सितम्बर को मजदूरों ने कलेक्टर आफिस को घेर लिया। इसके बाद मजदूरों को आश्वासन मिला कि नये लेबर कोड के हिसाब से उनसे काम लिया जायेगा। नये लेबर कोड को लागू करते समय खूब हल्ला मचा था कि अब मजदूरों से सप्ताह में केवल 4 दिन काम कराया जायेगा और तीन दिन छुट्टी मिलेगी। दरअसल नये लेबर कोड के हिसाब से मालिकों को मजदूरों से दिन में 12 घंटे काम लेने की अनुमति दी गयी थी लेकिन यह सप्ताह में 48 घंटे से अधिक नहीं होना था। लेकिन जैसा तय है कि यह नये लेबर कोड मजदूरों के फायदे के लिए नहीं लाये गये हैं। पूंजीपतियों की मांग के अनुरूप लाये गये हैं।
शासन प्रशासन और श्रम विभाग फैक्टरी मालिकों को नये लेबर कोड के हिसाब से मजदूरों से काम लेने के नियमों का हवाला देकर शांत बैठ गये, लेकिन फैक्टरी मालिकों ने वही किया जो वे कर रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे मजदूरों को कोई छुट्टी नहीं देंगे और 12 घंटे काम नहीं करायेंगे तो वे आर्डर पूरा नहीं कर सकते। यह दिखाता है कि आज फैक्टरी मालिक खुलेआम यह ऐलान कर रहे हैं कि वे मजदूरों को उनके अधिकार नहीं देंगे।
जब मजदूरों ने देखा कि आश्वासन मिलने के बाद भी उनकी मांगें पूरी नहीं हो रही हैं तो उन्होंने तय किया कि वे अब गुलामी की जिंदगी नहीं सहेंगे और अपने घर लौट जायेंगे। दीवाली और छठ पूजा के करीब आने ने भी उनको यह महसूस कराया कि उन्हें छुट्टी तो मिलेगी नहीं, इससे अच्छा है कि वे अपने घर ही चले जायें और अपने परिवार के साथ त्यौहार मनायें।
इन पूरे समीकरणों से ‘गांव चलो आंदोलन’ शुरू हो गया और अक्टूबर माह के शुरू से ही मजदूरों की भारी भीड़ रेलवे स्टेशन पर जमा होने लगी। लम्बी-लम्बी लाइनें रेलवे स्टेशन पर दिखने लगीं। मजदूरों का कहना है कि वे अपने गांव जाकर कुछ भी कर लेंगे लेकिन ऐसी गुलामी की जिंदगी वे बर्दाश्त नहीं करेंगे।
मजदूरों का यह पलायन दिखाता है कि फैक्टरियों में उनकी जिंदगी कितनी कठिन हो चुकी है। वे बिना छुट्टी के 12-12 घंटे काम करने को मजबूर किये जा रहे हैं और श्रम कानूनों में दर्ज 8 घंटे काम का दिन अब दूर की कौड़ी हो चुका है। बीमार होने, अत्यधिक थकान होने पर भी उनको छुट्टी नहीं मिलती और फैक्टरी से ही निकाल दिया जाता है। फैक्टरी मालिक फैक्टरी बंद होने की धमकी देकर मजदूरों को उनके बचे-खुचे अधिकार भी देने को तैयार नहीं हैं। मजदूरों का यह पलायन व्यवस्था से उनकी हताशा-निराशा को ही व्यक्त करता है।
लेकिन मजदूरों का गांव को पलायन वास्तव में उनकी समस्याओं को हल करने वाला नहीं है। जब कोविड काल में भारी संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ तब भी मजदूरों ने सोचा कि वे अब शहर नहीं लौटेंगे लेकिन उन्हें शहर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसकी वजह वही थी जो उन्हें पहले गांव से शहर ले गयी। रोजगार की कमी। गांव में खेती-किसानी अब घाटे का सौदा बन चुकी है। ‘मनरेगा’ जैसी थोड़ी बहुत रोजगार देने वाली योजनाओं की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। खुद गांव में रहने वाली भारी आबादी गांव के आस-पास के शहरों में लगी फैक्टरियों में काम करने को मजबूर है। और इन फैक्टरियों के हाल भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। ऐसा ही कुछ तब हुआ जब इस साल के शुरू में अमेरिका के द्वारा ईरान पर हमले के बाद भारत में गैस के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि हो गयी थी। गैस के दामों में वृद्धि और बढ़ती महंगाई ने मजदूरों को पलायन को मजबूर कर दिया था।
अभी भले ही ये मजदूर सूरत की फैक्टरियों में अपने भयानक शोषण की वजह से गांव लौट रहे हैं लेकिन गांव में भी इनके रोजगार की समस्या का हल नहीं होने वाला है और तब ये मजदूर फिर शहरों की तरफ लौटेंगे। तब मजदूरों को यह और अच्छे से समझ में आयेगा कि संघर्ष और केवल संघर्ष ही इनके जीवन में बेहतरी ला सकता है। संघर्ष से ही वे अपने छिने हुए अधिकार हासिल कर सकते हैं। आखिकार 8 घंटे का काम का अधिकार उन्हें पूंजीपतियों ने खैरात में नहीं दिया था। इस अधिकार को पाने के लिए मजदूरों ने कुर्बानियां दी थीं।