उत्तराखंड के यूजी-पीजी डाक्टरों का कार्य बहिष्कार

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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हल्द्वानी/ राजकीय मेडिकल कालेज हल्द्वानी के एमबीबीएस इंटर्न और पीजी डाक्टरों का कार्य बहिष्कार 7 सितम्बर से चल रहा है। इंटर्न की मांग स्टाइपेंड 17,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये करने और पीजी डाॅक्टरों की मांग स्टाइपेंड 69,800 से बढ़ाकर 1,10,000 रुपये करने की है। यह कार्य बहिष्कार उत्तराखंड के देहरादून, श्रीनगर, अल्मोड़ा, मेडिकल काॅलेज में भी जारी है। उत्तराखंड सरकार की तरफ से मौखिक रूप से तो सकारात्मक जवाब आये लेकिन डाॅक्टरों की मांग है कि लिखित आदेश जारी किए जाएं। अंततः एम बी बी एस इंटर्न का स्टाइपेंड सरकार ने 17,000 रु. से बढ़ाकर 25,000 रु. कर दिया पर पी जी डाॅक्टरों का स्टाइपेंड नहीं बढ़ाया।
    
राजकीय मेडिकल काॅलेज, हल्द्वानी में 124 एमबीबीएस इंटर्न हैं। इन्हें अपनी पढ़ाई के लिए सालाना 1,56,000 रुपये ट्यूशन फीस देनी होती है। मेस के लिए दी जाने वाली फीस 30,000 रु. से बढ़कर 40,000 रु. हो गयी है। पीजी डाॅक्टरों को अपनी पढ़ाई के लिए सालाना 4,50,000 रुपये चुकाने होते हैं, मेस का अलग से।
    
एमबीबीएस इंटर्न ने 2020-21 में संघर्ष कर स्टाइपेंड 7,500 रु. से 17,000 रु. करवाने में सफलता पाई थी। अभी भी यह देश में सबसे कम स्टाइपेंड देने वाला राज्य है। पीजी डाॅक्टरों को दिए जाने वाले स्टाइपेंड में दस साल से कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। स्टाइपेंड में प्रति वर्ष महंगाई भत्ता जोड़ते हुए बढ़ोत्तरी की इनकी मांग है। 
    
एमबीबीएस इंटर्न और पीजी डाॅक्टर वर्तमान में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ हैं। ओपीडी, वार्ड ड्यूटी, आपरेशन, आपातकालीन सेवा, आदि में यह प्रमुख रूप से सेवाएं देते हैं। इसके अलावा राउंड काल, कैम्प ड्यूटी में भी इन्हें लगाया जाता है। इसका अलग से कोई भुगतान नहीं किया जाता है। एक एमबीबीएस इंटर्न सप्ताह में 60 से 70 घंटे ड्यूटी देता है तो पीजी डाॅक्टर 100-102 घंटे तक ड्यूटी करता है। कार्य बहिष्कार के बावजूद डाॅक्टरों ने आपातकालीन सेवाओं को चालू रखा है और उसमें सेवाएं जारी हैं।
    
हमारे देश मे स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत खराब है। उसमें भी पहाड़ी दुर्गम क्षेत्रों में तो अभाव सा ही है। सरकारें कहीं आशा, आंगनबाड़ी, भोजनमाताओं के जरिये बेगार सी करवा रही हैं तो कहीं संविदा-ठेके के तहत बिना अधिकारों के काम करवा रही हैं। डाॅक्टरों को सरकार से लिखित आश्वासन की मांग है। यह देखना होगा कि सरकार आखिर कब डाॅक्टरों की मांगों को मानने को मजबूर होती है।         -हल्द्वानी संवाददाता
 

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