ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 को अस्तित्व में आये 100 साल पूरे हो चुके हैं। मजदूरों को संगठित होने का कानूनी अधिकार देने वाला यह कानून जब अस्तित्व में आया था तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। आज आजाद भारत में मोदी राज में यह कानून औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में समाहित होकर न सिर्फ अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो चुका है बल्कि इसमें मजदूर विरोधी बदलाव भी कर दिये गये हैं।
यह स्थिति वर्ग संघर्ष के दो अलग-अलग दौरों को दर्शाती है। एक दौर वह था जबकि प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) का अंत हो चुका था, और इस दौरान रूस में 1917 में अक्टूबर क्रांति भी सम्पन्न हो चुकी थी। इस महान समाजवादी क्रांति की गूंज ने विश्व पूंजीवाद को हिला डाला था; बोल्शेविक खतरे ने पूंजीवादी शासकों को भयभीत कर दिया था; जर्मनी, इटली सरीखे कई पूंजीवादी मुल्कों में तो क्रांति आसन्न ही थी। इस क्रांति के धमाके क्रांतिकारी विचारधारा को भारत के आगे बढ़ते राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और मजदूर आंदोलन में भी ले आये थे, और इससे भारत पर राज कर रहे ब्रिटिश उपनिवेशवादी भी भयभीत थे। इन स्थितियों में जिस तरह पूरी दुनिया में मजदूर अपने लिये अधिकार और रियायतें हासिल कर रहे थे उसी तरह भारत में भी अंग्रेजी राज को कई श्रम कानून बनाकर मजदूरों को कुछ अधिकार और रियायतें देने पर मजबूर होना पड़ा। 1926 का ट्रेड यूनियन एक्ट भी इन्हीं में से एक था। हालांकि इन श्रम कानूनों को बनाने का मकसद मजदूर आंदोलन को पूंजीवादी कानूनों की सीमाओं में बांधकर उसे भोंथरा करना भी था।
अब जिस दौर में मोदी सरकार ने ट्रेड यूनियन एक्ट समेत सभी 29 केन्द्रीय श्रम कानूनों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर घोर मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं को देश में लागू कर दिया है तब वैश्विक परिस्थितियों पर नजर डालने पर हम देखते हैं कि इस दौरान न सिर्फ सोवियत समाजवाद का अंत हो चुका है बल्कि सोवियत संघ भी बिखर चुका है; चीन में भी पूंजीवादी पुनस्र्थापना हो चुकी है और अब तो वह एक साम्राज्यवादी ताकत बन चुका है; पूर्वी यूरोप के देशों के जनवादी गणतंत्रों का भी पतन हो चुका है, और इस तरह पूरे समाजवादी खेमे का ही अंत हो चुका है। इसके बरक्स 70 के दशक से ही विश्व पूंजीवाद उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के साथ पूरी दुनिया में हमलावर है। जबकि दुनिया का क्रांतिकारी और मजदूर आंदोलन टूट-फूट और बिखराव का शिकार है। दुनिया के विभिन्न देशों में फासीवादी ताकतें नये सिरे से आगे बढ़ रही हैं और हमारे देश भारत में तो केंद्र की सत्ता पर हिंदू फासीवादी ताकतें काबिज हैं।
स्पष्ट है कि एक दौर में वर्ग संघर्ष मजदूर वर्ग के पक्ष में था जबकि दूसरे दौर में इसी वर्ग संघर्ष में पूंजीपति वर्ग हावी है। एक दौर में मजदूर अधिकार और रियायतें हासिल कर रहे थे, जबकि दूसरे दौर में उन्हें गंवा रहे हैं।
पूंजीपतियों की इच्छा की बात करें तो वे मजदूरों का खून-पसीना सब निचोड़ लेना चाहते हैं, और अपने मुनाफे की इस हवस में कोई कानूनी बाधा नहीं चाहते हैं। पूंजीवाद के इतिहास में दर्ज है कि पूंजीपतियों को छोटे-छोटे बच्चों तक से दिन-दिन भर काम कराने में भी कोई गुरेज नहीं रहा है। लेकिन सभी शोषितों-उत्पीड़ितों की तरह मजदूरों का भी एक इतिहास रहा है, और वे जुल्म-अन्याय को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करते रहे हैं। वे पूंजीपतियों के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करते रहे हैं, और ये संघर्ष अक्सर खुले वर्ग युद्ध का रूप भी ले लेते रहे हैं। ऐसे में पूंजीपतियों और मजदूरों के बीच जारी इस वर्ग संघर्ष को पूंजीवादी व्यवस्था की सीमाओं में बांधने के मकसद से पूंजीवादी राज्य द्वारा श्रम कानूनों का निर्माण किया जाता रहा है।
यदि पूंजीवाद की जन्मस्थली इंग्लैंड की बात करें तो वहां 1824 से पहले तक ट्रेड यूनियन बनाना ही गैर कानूनी था। ऐसे में मजदूर गुप्त यूनियनें बनाकर काम करते थे जो कि अक्सर मजदूर क्लबों के रूप में होती थीं। लेकिन 19वीं सदी के शुरुआती दशकों में मजदूरों द्वारा की गई बड़ी-बड़ी हड़तालों के परिणामस्वरूप पूंजीवादी राज्य द्वारा 1824 में इंग्लैंड में ट्रेड यूनियन बनाने पर लगे प्रतिबंध हटा लिये गये। अपने संघर्षों के बल पर पूंजीपतियों व सरकार के तमाम दमन चक्र को झेलते हुये वहां मजदूरों ने संगठित होने का कानूनी अधिकार हासिल किया।
भारत की बात करें तो 19वीं सदी के मध्य में भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई। रेल, कोयला, जूट, सूत, नौ परिवहन एवं चाय बागानों इत्यादि में शुरुआत में ब्रिटिश पूंजीपतियों का ही मालिकाना था; हालांकि, वक्त बीतने के साथ भारतीय पूंजी भी इन उद्यमों में लगनी शुरू हुई, खासकर जूट व सूत उद्योगों में। इन उद्यमों में ब्रिटिश और भारतीय पूंजीपति, दोनों ही, भारतीय मजदूरों का भयंकर शोषण-उत्पीड़न करते थे। उस समय उद्योगों में कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल शुरू होने लगा था, और तब मजदूरों से 16 से 18 घंटे तक काम लिया जाता था। उन्हें मजदूरी बहुत ही कम दी जाती थी और बात-बात पर जुर्माने लगाये जाते थे। यहां तक कि गाली-गलौच और मारपीट भी की जाती थी। महिला मजदूरों से पुरुष मजदूरों के बराबर काम लिया जाता था लेकिन उन्हें और भी कम मजदूरी दी जाती थी। सात साल से कम उम्र के छोटे-छोटे मासूम बच्चों से भी इन मिलों और कारखानों में दिन भर काम कराया जाता था। ऐसी नारकीय परिस्थितियों में मजदूर कम उम्र में ही बूढ़े होकर मर जाया करते थे। भारत में पूंजीवादी विकास के इस काल में संगठित होने का अधिकार तो दूर की बात है, श्रम कानून जैसी कोई चीज ही नहीं थी। उलटे, इस अमानवीय शोषण से परेशान होकर मजदूर काम छोड़कर भाग न सकें इसके लिये कानून बने हुये थे। लेकिन, मजदूर प्रतिरोध भी करते थे, और कुछ मौकों पर यह प्रतिरोध संगठित भी होता था। ऐसे कुछ संगठित प्रतिरोधों में 1862 में हावड़ा रेल स्टेशन पर हुई रेल मजदूरों की हड़ताल भारत के मजदूर आंदोलन का एक शुरुआती सुनहरा अध्याय है।
भारत में 1881 में पहला इंडियन फैक्टरी एक्ट अस्तित्व में आया जिसके तहत 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम कराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 1871 के पेरिस कम्यून, जिसने दुनिया के पूंजीवादी शासकों को दहला दिया था, की वैश्विक पृष्ठभूमि में अस्तित्व में आये इस एक्ट के बनने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लंकाशायर व मैनचेस्टर के ब्रिटिश पूंजीपतियों की थी, जिनकी भारत के ब्रिटिश व भारतीय पूंजीपतियों से प्रतियोगिता थी, और जो इसीलिये लगातार भारत में श्रम कानूनों के अभाव पर हल्ला मचा रहे थे। इसके अलावा भारत में पूंजीवादी विकास के परिणामस्वरूप पैदा हुये मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों एवं समाज सुधारकों द्वारा भी मजदूरों के जीवन के अमानवीय हालातों को मुद्दा बनाया जाने लगा था।
इंडियन फैक्टरी एक्ट, 1881 लागू होने के दस साल बाद भारत में फैक्टरी एक्ट, 1891 अस्तित्व में आया। इसके तहत अब 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से फैक्टरी में काम पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस अधिनियम ने 9 से 14 साल उम्र के बाल मजदूरों का 9 घंटे और महिला मजदूरों का 11 घंटे का कार्यदिवस तय किया। जबकि पुरुष मजदूरों के काम के घंटे इस एक्ट ने भी नियत नहीं किये। इंडियन फैक्टरी एक्ट, 1881 हो या फैक्टरी एक्ट, 1891 दोनों ने ही एक तरह से बच्चों से फैक्टरी-कारखानों में काम लिये जाने अर्थात बाल मजदूरी को कानूनी मान्यता प्रदान की।
19वीं सदी के अंत के साथ उथल-पुथल से भरी 20वीं सदी का विश्व रंगमंच पर आगमन हुआ। गौरतलब है कि उन्नीसवीं सदी का अंत होते-होते मुक्त प्रतियोगिता वाला पूंजीवाद एकाधिकारी पूंजीवाद अर्थात साम्राज्यवाद में तब्दील हो चुका था। इस बीसवीं सदी में दो साम्राज्यवादी युद्ध लड़े गये जिनमें करोड़ों लोग मारे गये। लेकिन, पहले विश्व युद्ध ने जहां बीसवीं सदी की राजनीतिक दिशा को बदल देने वाली रूसी क्रांति और समाजवादी सोवियत संघ को जन्म दिया, तो वहीं दूसरे विश्व युद्ध में फासीवाद-नाजीवाद की ऐतिहासिक पराजय और पूर्वी यूरोप में कायम हुये जनवादी गणतंत्रों एवं बाद में चीन में हुई क्रांति के बाद दुनिया में एक समाजवादी खेमा ही अस्तित्व में आ गया। एक तिहाई दुनिया लाल हो गई।
यह वह दौर था जबकि दुनिया में साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन आगे बढ़ रहे थे और सोवियत समाजवाद का भौतिक और नैतिक समर्थन उन्हें अभूतपूर्व आवेग प्रदान कर रहा था। साम्राज्यवाद को पीछे हटना पड़ रहा था। भारत में भी न सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन आगे बढ़ रहा था, अपितु मजदूर आंदोलन भी अधिकाधिक साम्राज्यवाद विरोधी तेवर हासिल कर रहा था। 1908 में बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी के बाद मुंबई के मजदूरों की हड़ताल भारत में मजदूरों की पहली राजनीतिक कार्यवाही थी, जो कि उनकी बढ़ती साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का प्रतीक थी। 6 दिनों की इस हड़ताल के दौरान मुंबई की सड़कों पर सेना और पुलिस के साथ जंग में 200 से भी अधिक मजदूर मारे गये थे। इसके अलावा इस दौर में 1905 में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया प्रेस के मजदूरों, कोलकाता कारपोरेशन के कुलियों, मुंबई के सूती मिल मजदूरों एवं 1906 में बज बज स्थित क्लाईव जूट मिल के मजदूरों एवं 1907 में रेल मजदूरों की सशक्त हड़तालें भी हुईं। इस सबके परिणामस्वरूप 1911 में अस्तित्व में आये इंडियन फैक्टरीज एक्ट में पुरुष मजदूरों के लिये 12 घंटे का कार्यदिवस नियत हुआ।
लेकिन, असल में ये सभी कानून कागजों की शोभा ही अधिक बढ़ाते थे और इन्हें व्यवहार में लागू कराने के लिये मजदूरों को फिर नये सिरे से संघर्ष करना पड़ता था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और इसके बाद खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने और मजदूरी गिरने के कारण एक के बाद एक हड़तालों का तांता ही लग गया। इनमें सूत, जूट मिलों से लेकर रेलवे, गोदी और म्यूनिसिपलिटी तक के मजदूर शामिल थे। ज्यादातर सफल रही इन हड़तालों में 1919 की मुंबई के 2 लाख मजदूरों की हड़ताल सर्वप्रमुख थी। इसी क्रम में 1920 में मजदूरों के अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (एटक) की स्थापना भारत के मजदूर आंदोलन में मील का पत्थर थी। इसके पहले अध्यक्ष कांग्रेसी लाला लाजपत राय थे लेकिन जल्द ही एटक पर क्रांतिकारी विचारधारा का प्रभाव बढ़ता चला गया।
उक्त अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय परिस्थितियों में ही भारत के मजदूरों को 1926 में ट्रेड यूनियन एक्ट के रूप में संगठित होने का कानूनी अधिकार मिला। हर श्रम कानून की तरह ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 के तहत भी मजदूर आंदोलन को पूंजीवादी कानूनों की सीमाओं में बांधकर भोंथरा बनाने की कोशिशें की गई थीं। उदाहरण स्वरूप, यह कानून यूनियनों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाता था और पंजीकरण करा पाना व्यवहार में बहुत मुश्किल होता था। इस तरह गैर पंजीकृत यूनियन गैर कानूनी हो जाती थी जबकि पंजीकृत होने पर यूनियन पर सरकारी नियंत्रण कायम हो जाता था। यह सरकारी नियंत्रण सख्त प्रावधानों के साथ सबसे अधिक यूनियन के कोष पर रहता था, कि कहीं यूनियन अपना कोष राजनीतिक उद्देश्यों के तहत अर्थात राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने में खर्च न करें। ऐसे में इस एक्ट के तहत संगठित होने की कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद उस समय एटक से लेकर विभिन्न ट्रेड यूनियनों और राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने भी इसका विरोध किया था।
अब जब इस ट्रेड यूनियन एक्ट को बने सौ साल पूरे हो चुके हैं तब देश-दुनिया के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। मजदूरों के लिये प्रतिकूल वर्ग संघर्ष के आज के हालातों में मोदी सरकार द्वारा इस कानून समेत सभी 29 केंद्रीय श्रम कानूनों के स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त कर घोर मजदूर विरोधी 4 नई श्रम संहिताओं में समाहित कर दिया गया है, और इसी वर्ष अर्थात 2026 से देशव्यापी स्तर पर लागू भी कर दिया गया है।
नई श्रम संहिताओं में ट्रेड यूनियन स्तर पर एक मात्र वार्ताकार यूनियन की मान्यता हासिल करने के लिये 51 प्रतिशत मजदूरों की सदस्यता की सीमा रखी गई है। किसी भी यूनियन के इस मापदंड पर खरे न उतरने पर बनाई जाने वाली वार्ताकार परिषद में भी सिर्फ उन्हीं यूनियनों के प्रतिनिधि बैठेंगे जिनके पास संस्थान के कम से कम 20 प्रतिशत सदस्यों की सदस्यता हो। जबकि पहले यह सदस्यता की सीमा 10 प्रतिशत मजदूरों की ही थी। इसके अलावा समग्रता में चारों श्रम संहिताओं में तमाम ऐसे प्रावधान कर दिये गये हैं जो कि मजदूरों को आज से सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी उसी अधिकार विहीनता की स्थिति में धकेल देते हैं जबकि हड़ताल पर जाना एवं यूनियन गठन करना गैर कानूनी कृत्य माना जाता था, और ऐसा अपराध करने वाले मजदूरों पर जुर्माने लगाये जाते थे और उन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता था। ऐसे में, मोदी सरकार द्वारा आजाद भारत में मजदूरों पर किये गये इस सबसे बड़े हमले का सभी मजदूरों को एकजुट होकर विरोध करना होगा।