नारी मुक्ति का सवाल : आज का भारत
भारत में नारी मुक्ति का सवाल विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले ज्यादा उलझा हुआ है। यहां पूंजीवाद का कम विकास होने के चलते पुराने सामंती पितृसत्तात्मक संबंध तो ज्यादा मजबूत हैं ही, यहां वर्ग के साथ
भारत में नारी मुक्ति का सवाल विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले ज्यादा उलझा हुआ है। यहां पूंजीवाद का कम विकास होने के चलते पुराने सामंती पितृसत्तात्मक संबंध तो ज्यादा मजबूत हैं ही, यहां वर्ग के साथ
काफी लम्बे समय से पश्चिम एशिया के देशों पर अमरीकी साम्राज्यवादियों का दबदबा रहा है। 2021 में अफगानिस्तान से बेआबरू होकर अपनी सेनाओं को वापस बुलाने के बाद पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवादियों का
हरिद्वार बेगमपुर सिडकुल एरिया में गंगा थर्मा पैक नाम की एक वैण्डर कम्पनी है जो डिंकसन, सोनी, हैवल्स, केन्ट आदि के लिए उत्पादन करती है। कम्पनी का मालिक बारह साल में तीन गुना से भी ज
पूंजीवाद में हमेशा से ही भ्रष्टाचार की कानूनी और गैर-कानूनी सीमा रेखा अत्यन्त धुंधली रही है। कानूनी गैर-कानूनी तथा गैर-कानूनी कानूनी बनता रहा है। इसी के हिसाब से भ्रष्टाचार सदाचार और सदाचार भ्रष्टा
वर्तमान में जी-20 देशों की बैठक भारत में चल रही है। इसी के तहत विदेशी मेहमानों में भारत की छवि को बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इसके बहाने पुराने एजेंडे (गरीब लोगों को उ
जी-20 की अध्यक्षता जब से भारत को मिली है तब से संघ-भाजपा के कूपमंडूक बहुत खुश हैं। मूर्खों के स्वर्ग में रहने वाले अतीत के इन बंदियों को लगने लगा कि बस अब भारत के विश्व गुरू बनने या बनाने का इनका द
हर साल मार्च के पहले हफ्ते से ही टीवी, अखबार से लेकर विज्ञापनों तथा सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर चारों तरफ महिलाओं के विशिष्ट सत्कार की चर्चा होने लगती है। चारों तरफ महिला बराबरी और महिला आदर का ऐसा
दिनांक 20 एवं 21 फरवरी 2023 को इंकलाबी मजदूर केंद्र एवं ठेका मजदूर कल्याण समिति तथा प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के कार्यकर्ताओं ने पंतनगर परिसर के टा कालोनी एवं झा कालोनी में कर्मचारियों/ शिक्षकों
महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले देश में बेटियों को प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा से दूर करने की कवायद जारी है। आजादी के अमृत महोत्सव पर देश की महिलाओं/बेटियों के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं व दावों
बीते लगभग एक दशक में चीन विश्व रंगमंच पर एक प्रमुख ताकत के बतौर उभरा है। आज अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी चीन को अपने प्रमुख प्रतिस्पर्धी के बतौर चिन्हित कर रहे हैं तो यह यूं ही नहीं है। बात चाहे चीन-अ
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।