विविध

पीड़िता ही दोषी

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स्त्री विरोधी सोच किस कदर हमारे समाज में पसरी हुई है इसका एक हालिया उदाहरण गुजरात से सामने आया है। स्त्री विरोधी सोच कोई गुपचुप तरीके से जाहिर नहीं की गयी बल्कि चौराहे-सड़

अडाणी परिवार ने प्रासाद मिल मजदूरों के घर उजाड़े

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एक समय था कि जब फैक्टरी, कल-कारखाने लग रहे थे तब मालिकों को बड़े पैमाने पर मजदूरों की जरूरत थी और मजदूर फैक्टरी के आस-पास बस गये और सरकार तथा फैक्टरी मालिक मजदूरों को आवास

‘‘माननीय’’ पूर्व सांसद को उम्र कैद

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यौन उत्पीड़न के बहुचर्चित मामले में प्रज्वल रेवन्ना को 1 अगस्त को विशेष अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। कुछ समय पहले तक ‘‘माननीय’’ रहे अब कैदी संख्या में बदल गये हैं। ज

मोदी जी का भविष्य

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असली मालिक न तो संसद में विराजमान हैं और न सरकार में बैठे हैं। वे कहीं दूर बैठे-बैठे ही इस देश को अपनी मर्जी से चलाते हैं। मोदी जी ने इनके लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। संघ के हिन्दू फासीवादी एजेण्डे को खूब चलाया और भारत ही नहीं विदेशी एकाधिकारी घरानों व वित्तीय पूंजी के धंधे की भी खूब मदद की। परन्तु मोदी जी का यह दुर्भाग्य है कि संघी कारकूनों व वित्तीय पूंजी के मालिकों से ही भारत की जनता नहीं बनी है। संघ और एकाधिकारी घरानों के मालिकों के अलावा भी भारत में करोड़ों मजदूर, किसान, मेहनतकश हैं। वे कैसे उन पर भरोसा कर सकते हैं।

दिल्ली के अस्पतालों में अव्यवस्था को झेलने को अभिशप्त मरीज

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पिछले दिनों मेरी महिला साथी की तबियत खराब होने के कारण उसके साथ दिल्ली के सरकारी अस्पताल डा.बी.आर.अंबेडकर अस्पताल जाना हुआ। यह अस्पताल दिल्ली के बड़े अस्पतालों में गिना जा

बुलडोजर कार्यवाही व सत्यापन अभियान रोकने को सत्याग्रह

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हल्द्वानी/ बुद्ध पार्क में 10 अगस्त 25 को कई संगठनों द्वारा सभा की गयी। सभा का मुख्य उद्देश्य बुलडोजर कार्रवाई व कथित सत्यापन के नाम पर हो रहे अधिकारों क

चुनाव, चुनाव आयोग और हिंदू फासीवाद

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चुनावी पद्धति और सीमित जनवादी अधिकार (आम नागरिकों के लिए) पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद है। इसी के दम पर इसे ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ का मंत्र दोहराया जाता है। असल में यह शांतिपूर्ण काल में पूंजीपति वर्ग की लोकतंत्र की ओट में छुपी तानाशाही से इतर कुछ भी नहीं है। आर्थिक-राजनीतिक संकटों के काल में इस नकाब को हटाने में शासक पूंजीपति वर्ग को ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसका एक रास्ता इंदिरा गांधी के जरिए संवैधानिक तानाशाही थोपे जाने के रूप में दिखा तो दूसरा रास्ता हिंदू फासीवादियों के दौर में फासीवादी तानाशाही की ओर बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। 

तम्बाकू के लती क्रांतिकारियों के नाम एक खत

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आज दिनांक 31 मई तम्बाकू निषेध दिवस है। यह हिन्दुस्तान नामक अखबार में आया है। मैं हिन्दुस्तान नामक दैनिक अखबार का पाठक हूं। इसे पढ़कर मुझे तम्बाकू के बारे में लिखने की कुछ

पंजाब : आदिवासी लोगों के कत्लेआम के खिलाफ प्रदर्शन

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8 अगस्त को मोगा में पंजाब के दर्जनों जनवादी जनसंगठनों द्वारा आदिवासियों और उनके हितों के लिए संघर्षरत ताकतों के क्रूर कत्लेआम के खिलाफ रोषपूर्ण रैली और प्रदर्शन करके मांग

उधमसिंह के शहादत दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

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उधमसिंह हमारे देश के अविस्मरणीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार पंजाब के तत्कालीन गवर्नर जनरल ओ’डवायर को लंदन के एक सभागार

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।