अपना इक़बाल खोती मोदी सरकार

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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देश की राजधानी सहित पूरे देश में हो रहे मुख्य चुनाव आयुक्त विरोधी प्रदर्शनों ने मोदी सरकार की साख को पूरा बट्टा लगा दिया है। कहां तो मोदी सत्ता के 25 साल पूरा करने पर आलीशान जश्न मनाना चाहते थे और कहां अब हालत यह हो गयी कि वे सरेआम गालियां खा रहे हैं। कोई कह सकता है कि मोदी ने जो पिछले 25 सालों में बोया उसे ही काट रहे हैं। 
    
इस वक्त जो कुछ दिल्ली में चल रहा है उस पर पूरे भारत की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर है। भारत सहित पूरी दुनिया देख रही है कि मोदी अपने ही बुने हुए जाल में फंस चुके हैं, और अब इस जाल से निकलने के लिए वे जो भी कोशिश कर रहे हैं उसमें वे अपने ही बुने जाल में और ज्यादा फंसते जा रहे हैं। और ऐसा एक न एक दिन होना ही था और वही हो भी रहा है। 
    
मोदी और उनके सहयोगियों के बिगड़ते मानसिक संतुलन की ही निशानी है कि पहले मोदी सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं करने दिया, 10-11-12 अक्टूबर को भारी दमन व भगवा गुण्डों का नंगा नाच किया। और फिर जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन करने की जगह की सूची से ही हटा दिया। जंतर-मंतर को भले ही मोदी सरकार ने ‘‘छूमंतर’’ कर दिया हो परन्तु उसने इसके साथ ही घोषित कर दिया है कि अब उसका इकबाल, इदबार (दुर्भाग्य) में तब्दील हो गया है। कौन भूल सकता है ऐसा ही 33 साल पहले भी हो चुका है। तब वोट क्लब को दिल्ली के प्रमुख धरना स्थल की सूची से व्यावहारिक तौर पर हटा दिया गया था। और फिर जिस सरकार ने यह कदम उठाया था वह अगले एक दशक तक सत्ता का मुंह नहीं देख सकी थी। 
    
1988 तक वोट क्लब दिल्ली की बहरी होती सरकारों को जनता की आवाज सुनाने के लिए प्रमुख स्थल था। वोट क्लब ठीक सरकार की नाक के नीचे इण्डिया गेट के पास था। 1988 में जब इस वोट क्लब में पांच लाख से ज्यादा किसान इकट्ठा हो गये थे तो तत्कालीन राजीव सरकार के होश उड़ गये थे। उसने वोट क्लब पर प्रदर्शन पर अघोषित रोक लगा दी और फिर 1993 में वोट क्लब के स्थान पर जंतर-मंतर को घोषित प्रदर्शन स्थल बना दिया गया। और अब 33 साल बाद मोदी सरकार चाहती है कि जहां देश की सरकार बैठती है यानी ‘‘नई दिल्ली’’ में कोई धरना प्रदर्शन न हो सके। कोई सत्ता के नशे में डूबे ऐय्याश शासकों की मस्ती में विघ्न-बाधा न डाल सके। जंतर-मंतर को ‘‘छू मंतर’’ करके असल में मोदी सरकार ने अपने इकबाल को इदबार में, अपने ‘‘खुशनसीबी’’ को बदनसीबी में बदलने की घोषणा अपने आप ही कर दी है। यह कुछ ऐसा ही है मानो कोई अपने डेथ वारण्ट (मृत्यु के आदेश) पर खुद ही दस्तखत कर रहा हो। कभी मोदी अपनी खुशनसीबी पर खुद बहुत इतराया करते थे अब नई पीढ़ी (जेन जी) उनको उन गालियों से नवाज रही है, जो आज तक भारत के किसी प्रधानमंत्री के हिस्से नहीं आयी। मोदी मजाक के पात्र बन गये। 
    
सवाल यह उठता है कि, मोदी का इकबाल, इदबार में क्यों बदला?
    
इसके सैकड़ों कारण गिनाये जा सकते हैं। मोदी के केन्द्र में पिछले 12 सालों के शासन में एक के बाद एक ऐसे अनेकों ऐसे कदम उठाये व कार्यवाहियां की गयी हैं जिन्होंने उनके ‘इकबाल को इदबार’ में बदल दिया। 12 साल पहले यह सरकार हिन्दू फासीवादियों और भारत के एकाधिकारी घरानों (अम्बानी, अडाणी, टाटा, मित्तल आदि) के गठजोड़ से कायम करवायी गयी थी। मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एकाधिकारी घरानों ने जहां अपने खजाने के मुंह खोल दिये थे वहां हिन्दू फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके चुनावी फ्रंट भाजपा ने अपना पूरा जोर लगा दिया था। पूरे देश का तीव्र धार्मिक ध्रुवीकरण किया गया। हिन्दुओं को झूठे-झूठे धार्मिक मुद्दे उठाकर भड़काया व उकसाया गया और मुसलमानों और ईसाइयों को खुले निशाने पर लिया गया। सैकड़ों मस्जिदें व दर्जनों गिरजाघरों को या तो बुलडोजर से ढहा दिया गया या फिर जला दिया गया। 
    
तीव्र धार्मिक धु्रवीकरण के साथ घोर अंधराष्ट्रवाद का सहारा लिया गया। अमेरिकी व पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के सामने नंगा आत्मसमर्पण करने वालों ने पाकिस्तान व बांग्लादेश के खिलाफ झूठा राष्ट्रवादी उफान पैदा किया। नग्न आत्मसमर्पण को झूठे व नकली राष्ट्रवाद से छुपाया गया। अन्यथा ऐसे कैसे होता जो ट्रम्प रात दिन मोदी की बेइज्जती कर रहा था उस ट्रम्प को मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, योगी आदि स्वघोषित महान राष्ट्रवादी कोई जवाब तक नहीं देते हैं। असल में, पूरी भाजपा, पूरा संघ हमेशा से घोर अमेरिकी साम्राज्यवाद परस्त रहा है। अब तो हद यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा अमीर व अमेरिकी एलन मस्क खुलेआम मोदी सरकार को ‘अम्बानी सरकार’ कह रहा है। अम्बानी को भारत का ‘असल बाॅस’ (असली मालिक) व ‘‘प्रधानमंत्री अम्बानी’’ कहकर सम्बोधित कर रहा है। देश के प्रधानमंत्री की इस कदर बेइज्जती पर मजाल है कि मोदी या उनके लगुओं-भगुओं की जुबान खुल सके। यहां तक कि मुकेश अम्बानी ने भी एलन मस्क को कोई जवाब नहीं दिया। कुल मिलाकर अमेरिकी साम्राज्यवादी मोदी का अपमान कर रहे हैं व औकात दिखा रहे हैं। और यह सब आये दिन होता रहता है। इन नकली राष्ट्रवादियों ने भारत का सिर दुनिया के सामने नीचा कर दिया है। 
    
तीव्र धार्मिक ध्रुवीकरण, अंध व नकली राष्ट्रवाद के साथ इनका तीसरा तरीका थोथे किस्म की लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाने का रहा है। मसलन इन्होंने आजादी के बाद अस्तित्व में आयी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी डी एस) को नष्ट करके उसके स्थान पर ‘‘पांच किलो राशन’’ की भीख देने जैसी योजनाएं लागू की हैं। जनता के स्वाभाविक अधिकार को भीख में बदल दिया गया। अब यह सब महामहिम की इच्छा या मेहरबानी पर है। ठीक चुनाव के पहले ‘लाडली बहन’ जैसी योजनाएं वोट खरीदने के लिए लागू की जाती हैं। इस तरह एक ओर आम जनता के अधिकार छीनना, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार में नाम मात्र का भी धन नहीं खर्च करना और दूसरी ओर तीव्र धार्मिक धु्रवीकरण व अंधराष्ट्रवाद के साथ झूठी जन कल्याणकारी योजनाएं लागू करना। 
    
यहां तक तो जो कुछ था, वह था पर अब तो बात और आगे बढ़ गयी है। अब इन्होंने बार-बार चुनाव जीतने के लिए अपनी मनपसंद जनता चुनने का कुकृत्य करना शुरू कर दिया है। एस आई आर के जरिये करोड़ों लोगों के मत देने का अधिकार छीन लिया गया। देश के भीतर करोड़ों लोग ऐसे बनाये जाने लगे जो वस्तुतः नागरिक ही नहीं रह जायेंगे। और यह साजिश जैसे-जैसे उजागर होती गयी वैसे-वैसे देश के युवा-छात्रों का आक्रोश गर्म लावे की तरह दिल्ली की सड़कों पर बहने लगा। विपक्षी पार्टियां अपनी ही हार की मूल वजह भी ‘वोट चोरी’ में देखने लगी। अब स्थिति यह है कि मोदी सरकार की कोई सफाई, कोई आश्वासन, कोई वायदा, कोई सुनने व समझने को तैयार नहीं है। चुनाव, चुनाव प्रणाली, चुनाव आयोग मोदी एण्ड कम्पनी के अगले पचास साल तक भारत पर शासन (या हिन्दू फासीवादी राष्ट्र बनाने) करने का उपकरण बनते उससे पहले ही एक व्यापक जनाक्रोश फूट पड़ा। और मोदी का इकबाल जाता रहा और उन पर इदबार छाता गया। 
    
मोदी सरकार अपनी खोती जा रही साख, इकबाल के लिए आने वाले दिनों में जो कुछ करेगी उससे वह अपने आप में या तो बहुत दयनीय या फिर हास्यास्पद साबित होगी। मोदी सरकार लगभग उसी स्थिति में पहुंचती जा रही है जहां 2012-13 के समय मनमोहन सरकार थी। देश की जनता के लिए मोदी सरकार का पतन अच्छा ही साबित होगा।   

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