औद्योगिक संबंध संहिता, 2020
मोदी सरकार द्वारा पारित की गई 4 नई श्रम संहिताओं में औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (The Industrial Relations Code] 2020) पूंजी द्वारा श्रम पर किया गया सबसे भीषण हमला है। इस संहिता के लागू होने के साथ अब ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926; औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 एवं औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसे महत्वपूर्ण श्रम कानूनों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
यह संहिता फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE); मजदूर की परिभाषा में विभ्रम और बदलाव; 300 से कम मजदूरों वाले फैक्टरी-संस्थानों में पूंजीपतियों को एकतरफा छंटनी-तालाबंदी की खुली छूट व स्टैंडिंग आर्डर लागू करने की बाध्यता से मुक्ति; ट्रेड यूनियन व हड़ताल के संवैधानिक अधिकार पर पहरे बैठाने एवं स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा को खंडित करने के रूप में मजदूरों पर भारी हमले बोलती है।
सबसे पहले हम फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) और मजदूर की परिभाषा में किये गये विभ्रम और बदलाव को लेते हैं-
इस संहिता की धारा- 2 (O) में फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) अथवा निश्चित अवधि के रोजगार के तहत स्थायी प्रकृति के कामों पर भी अस्थायी मजदूर रखने का रास्ता साफ कर दिया गया है; और इस तरह ‘‘रखो और निकालो’’ (hire & fire) को कानूनी जामा पहनाकर पूंजीपतियों की मुंहमांगी मुराद पूरी कर दी गई है। जबकि पुराने कानूनों के तहत स्थायी प्रकृति के कामों पर स्थायी मजदूर की नियुक्ति अनिवार्य थी और स्थायी प्रकृति का काम कर रहा मजदूर 240 दिन के उपरांत स्थायी होने का कानूनी अधिकार हासिल कर लेता था। हालांकि, उदारीकरण-निजीकरण के पिछले करीब 35 सालों में विभिन्न सरकारों एवं श्रम विभाग द्वारा गैर कानूनी ठेका प्रथा को बढ़ावा (लोडिंग-अनलोडिंग अथवा किसी अन्य नॉन कोर काम के लाइसेंस पर खुलेआम मशीनों एवं अन्य स्थायी कामों पर ठेकेदारी के तहत मजदूरों को नियोजित करना) दिया जाता रहा। 240 दिन पूरे होने से पहले ही ठेका व कैजुअल मजदूरों की सर्विस ब्रेक करके गैर कानूनी तरीके से उन्हें सालों साल ठेका अथवा कैजुअल के रूप में ही खटाते रहने की छूट व्यवहार में मालिक हासिल कर लेते थे। इस तरह सरकार व मालिकों ने काफी हद तक इस कानून का तोड़ निकाल लिया था। लेकिन, तब भी, पुराने कानूनों के तहत यह सब था तो गैर कानूनी कृत्य ही! और यह स्थिति पूंजीपतियों से लेकर श्रम विभाग के अफसरों और सरकार तक सभी को असहज करती थी; और कुछ मौकों पर मजदूर कानूनी संघर्ष एवं आंदोलन के बल पर पूंजीपति अथवा प्रबंधन को झुकाकर स्थायी मजदूर का दर्जा हासिल भी कर लेते थे।
लेकिन, फिक्स टर्म एम्प्लॉयमेंट के तहत अब पूंजीपति खुलेआम 6 महीने अथवा 11 महीने या हो सकता है कुछ अधिक समय के लिये भी, लेकिन निश्चित अवधि के लिये ही, स्थायी कामों पर अस्थायी मजदूरों की भर्ती करेंगे और निश्चित अवधि समाप्त हो जाने के बाद बेरोजगार होने वाला मजदूर कानूनी रूप से इसे कोई चुनौती भी नहीं दे सकेगा। इसके अलावा पूंजीपति अथवा प्रबंधन उसी मजदूर को FTE के तहत ही फिर से सर्विस पर रखकर (असल में कागजों में सर्विस ब्रेक दिखाकर) उसे सालों साल अस्थायी मजदूर के रूप में खटाते रहेंगे; और यह सब अब कानूनी होगा।
मोदी सरकार प्रचार कर रही है कि FTE के तहत भर्ती मजदूरों को एक साल की नौकरी पर भी ‘ग्रेच्यूटी’ मिलेगी। मतलब, एक साल बाद रोजगार खत्म होने पर मजदूर को 15 दिन का वेतन मिलेगा। लेकिन जब FTE के तहत ज्यादातर मजदूरों को 6 अथवा 11 महीने के लिये ही रखा जायेगा (ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है) और एक साल की सेवा अवधि पूरी होगी ही नहीं तब भला मजदूरों को क्या मिलेगा? इस पर सरकार मौन है! जबकि पुराने कानूनों के तहत 240 दिन की सेवा अवधि पूरी होने पर मजदूर न सिर्फ कानूनी तौर पर स्थायी होने का दावा पेश कर सकता था अपितु नौकरी से हटाये जाने पर नोटिस पे और छंटनी मुआवजा पाने का अधिकारी भी होता था। असल में महत्व स्थायी होने के अधिकार का था, जो कि फिक्स टर्म एम्प्लायमेंट के तहत अब छीन लिया गया है।
इस संहिता की धारा- 2(1) में कर्मचारी की परिभाषा देते हुये मजदूर से लेकर प्रबंधक तक सभी को इसमें शामिल कर लिया गया है। जबकि, इसकी धारा- 2 (27) में मजदूर की परिभाषा देते हुये प्रशिक्षुओं को इससे बाहर कर दिया गया है। इसके अलावा धारा- 2 (Zr)IV के तहत जो व्यक्ति सुपरवाइजर की क्षमता वाले काम में नियोजित हो और उसका वेतन 18 हजार रु. प्रतिमाह से कम हो तो उसे भी अब मजदूर नहीं माना जायेगा।
मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है।
अब हम 300 से कम मजदूरों वाले फैक्टरी-संस्थानों में पूंजीपतियों को प्रदान की गई छूटों पर आते हैं-
इस संहिता के अध्याय-10 के प्रावधानों के तहत ऐसे फैक्टरी-संस्थान जहां 300 से कम मजदूर काम करते हैं वहां सरकार की अनुमति के बिना एकतरफा छंटनी-तालाबंदी की खुली छूट पूंजीपतियों को प्रदान कर दी गई है। जबकि पहले यह कानूनी छूट 100 से कम मजदूरों वाले फैक्टरी-संस्थानों तक ही सीमित थी। इसी के साथ इस संहिता के अध्याय-4 के प्रावधानों के तहत स्टैंडिंग आर्डर अर्थात रोजगार की परिस्थितियां, नियम व शर्तें इत्यादि को लागू करने से भी 300 से कम मजदूरों वाली फैक्टरियों को मुक्त कर दिया गया है। पहले पूंजीपतियों को यह कानूनी छूट भी 100 से कम मजदूरों वाली फैक्टरियों तक ही सीमित थी।
हालांकि, विभिन्न राज्य सरकारें, जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों द्वारा शासित राज्य सरकारें शामिल हैं, श्रम के समवर्ती सूची में होने के नाम पर राज्य स्तर पर कानून में बदलाव कर 300 से कम मजदूरों वाली फैक्टरियों में एकतरफा छंटनी-तालाबंदी एवं स्टैंडिंग आर्डर लागू करने की बाध्यता से मुक्ति का यह अधिकार पूंजीपतियों को पहले ही सौंप चुकी हैं; और स्थायी मजदूरों से छुटकारा पाने तथा उनकी यूनियनों को तोड़ने व पालतू बनाने में इसका इस्तेमाल पहले ही शुरू हो चुका है। अब जबकि मोदी सरकार ने देशव्यापी स्तर पर इन नये कानूनों को लागू कर दिया है तब यह सब अब धड़ल्ले से होगा। साथ ही, अब 300 तक मजदूरों वाली फैक्टरियों में यूनियन पंजीकृत कराना भी लगभग असंभव हो जायेगा।
गौरतलब है कि हमारे देश में 90 प्रतिशत से भी अधिक फैक्टरी-संस्थान 300 से कम मजदूरों वाले हैं जिनमें कि अब ‘‘खुला खेल फर्रुखावादी’’ चलेगा। इतना ही नहीं इन नये कानूनों में अब 300 से अधिक मजदूरों वाले फैक्टरी-संस्थानों को भी संहिता की धारा- 77 (1) के तहत एकतरफा छंटनी-तालाबंदी की छूट देने तथा धारा-39 के तहत स्टैंडिंग आर्डर लागू करने की बाध्यता से मुक्ति का अधिकार प्रदान करने की शक्ति संबंधित सरकार को सौंपकर असल में शत प्रतिशत फैक्टरी-संस्थानों को इसकी जद में लिया जा चुका है।
अब हम ट्रेड यूनियन अधिकारों एवं हड़ताल के अधिकार पर बोले गये हमलों पर आते हैं-
इस संहिता के अध्याय-2 की धारा-4 के बिंदु 9 के तहत प्रबंधन द्वारा किसी मजदूर पर कोई कार्यवाही करने पर पैदा होने वाले औद्योगिक विवाद में किसी अन्य मजदूर एवं ट्रेड यूनियन को पक्ष बनने का अधिकार नहीं होगा। संहिता का यह प्रावधान घोर मजदूर विरोधी है क्योंकि यह एकजुट व संगठित होकर पूंजीपति से लड़ने के मजदूरों के संवैधानिक अधिकार को ही छीनता है।
संहिता के अध्याय-3 के तहत अब किसी संस्थान में एकमात्र वार्ताकार यूनियन (Sole negotiating union) की मान्यता हासिल करने के लिये 51 प्रतिशत मजदूरों का समर्थन प्राप्त करना जरूरी होगा। यदि संस्थान की कोई भी यूनियन 51 प्रतिशत मजदूरों का समर्थन नहीं जुटा पाती है तो एक वार्ताकार परिषद (Negotiating Council) बनाई जायेगी, लेकिन इसमें भी सिर्फ उन्हीं यूनियनों के प्रतिनिधि बैठेंगे जिनके पास कम से कम 20 प्रतिशत मजदूरों का समर्थन हो। जबकि पहले वार्ताकार परिषद में बैठने के लिये 10 प्रतिशत मजदूरों का समर्थन होना ही जरूरी था। संहिता के ये प्रावधान भी प्रबंधन को ही मजबूत बनाते हैं। इसके अलावा इस संहिता में पुरानी यूनियनों के रजिस्ट्रेशन को रद्द करने की शक्ति भी संबंधित सरकार को प्रदान कर दी गई है एवं ट्रेड यूनियनों के संचालन व मार्गदर्शन में बाहरी एक्टिविस्टों की भूमिका को भी सीमित कर दिया गया है।
अभी तक आवश्यक जन उपयोगी सेवाओं (बिजली, पानी, टेलीफोन, रेलवे एवं हवाई सेवा) को छोड़कर अन्य किसी भी संस्थान में हड़ताल पर जाने से पहले कोई नोटिस देना अनिवार्य नहीं था लेकिन अब संहिता की धारा-62 के तहत सभी संस्थानों के लिये हड़ताल से 14 दिन पूर्व नोटिस देना अनिवार्य बना दिया गया है। इसी तरह पहले सिर्फ आवश्यक जन उपयोगी सेवाओं वाले संस्थानों में समझौता वार्ता (Conciliation) के दौरान एवं फैसले के बाद अगले 7 दिनों तक हड़ताल पर प्रतिबंध था। इसे भी अब सभी संस्थानों के लिये अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अलावा पहले किसी ट्रिब्यूनल में सुनवाई के बाद अगले 7 दिनों तक हड़ताल प्रतिबंधित थी लेकिन अब इसे बढ़ाकर 60 दिन कर दिया गया है।
ऐसे में अब प्रबंधन द्वारा श्रम कानूनों का उल्लंघन करने, मज़दूरों को दबाये जाने एवं समझौता वार्ताओं व ट्रिब्यूनल के फैसलों को न मानने पर मजदूरों के लिये कानूनी तौर पर वैध हड़ताल करना बहुत ही मुश्किल हो जायेगा। इस तरह यह संहिता असल में मजदूरों के लिये वैध कानूनी हड़ताल के रास्ते बंद करने का काम करती है। जबकि अवैध घोषित हड़ताल के दौरान यदि प्रबंधन लॉकडाउन घोषित कर देता है तो यह संहिता उसे कानून सम्मत बताती है। इतना ही नहीं, इस कानून की धारा- 86 (13, 15 और 16) हड़ताल को गैर कानूनी घोषित कर हड़ताल में शामिल मजदूरों एवं उनका सहयोग-समर्थन करने वाले लोगों पर भारी आर्थिक जुर्मानों और जेल की सजा तक का प्रावधान करती है। यह सीधे-सीधे मजदूर आंदोलन का अपराधीकरण करने और मजदूरों को उनके सामाजिक आधार से काटने की साजिश है।
उपरोक्त के अलावा यह संहिता स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा को खंडित कर न्यायपालिका में नौकरशाही की घुसपैठ कराती है जिसका सीधा लाभ पूंजीपतियों को होगा। इसके तहत अब श्रम न्यायालय नहीं होंगे और केवल राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ट्रिब्यूनल होंगे; और इन ट्रिब्यूनलों में एक प्राधिकारी न्यायिक तो दूसरा प्रशासनिक होगा।
स्पष्ट है कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का उद्देश्य छुट्टे पूंजीवाद के जारी दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों के मुनाफों को अधिकाधिक बढ़ाने की खातिर मजदूरों को गुलामी की नई बेड़ियों में जकड़ना है। मजदूरों को बतौर वर्ग एकजुट होकर इसका प्रतिरोध करना होगा।
नोटः मोदी सरकार द्वारा फरवरी, 2026 में औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) अधिनियम 2026 को भी पारित कर लागू कर दिया गया है जो कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 लागू होने के बाद पुराने तीन कानूनों - ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926; औद्योगिक रोजगार स्थायी आदेश अधिनियम, 1946 एवं औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947- के निरस्तीकरण को कार्यकारी नहीं बल्कि वैधानिक घोषित करता है। इसमें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 2020 की धारा 104 में एक नई उपधारा (1 ए) जोड़ी गई है जिसके तहत पुराने कानूनों के तहत कायम ट्रिब्यूनल और प्राधिकरण तब तक काम करते रहेंगे जब तक कि नये कानूनों के तहत नये ट्रिब्यूनल और प्राधिकरण स्थापित नहीं हो जाते हैं।