भारतीय मजदूरों को मौत के मुंह में भेजने की तैयारी

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भारत में बेरोजगारी की भयावहता किसी से छिपी नहीं है। इस भारी बेरोजगारी पर जहां मोदी सरकार आंखें मूंदे बैठी है वहीं विकसित देश इस बेरोजगारी का फायदा उठाने की जुगत में लगे हुए हैं। मोदी सरकार पहले ही अपने चहेते देश इजरायल में लाखों भारतीय कामगारों को युद्ध के हालातों में काम के लिए भेज चुकी थी अब खबर आ रही है कि भारत सरकार युद्ध में फंसे रूस में भी हजारों भारतीय कामगारों को भेजेगी। 
    
अगले महीने दिल्ली में होने वाले भारत और रूस के वार्षिक शिखर सम्मेलन में इस मसले पर दोनों देशों के बीच करार होने की संभावना है। यह करार ऐसे वक्त में हो रहा है जब रूसी सेना में भारतीयों को शामिल कर युद्ध में लगाने की खबरें एक के बाद एक आती रही हैं। यानी करार से पहले से ही रूसी साम्राज्यवादी भारतीय युवाओं को सेना में भर्ती कर युद्ध में भेजते रहे हैं। इस मामले में तमाम आवाजें उठने के बावजूद मोदी सरकार ने अब तक चुप्पी साधने का ही काम किया है। 
    
अक्सर ही जब दुनिया में किसी इलाके में युद्ध छिड़ता रहा है तो दूसरे देश अपने वहां रह रहे नागरिकों को सुरक्षित निकालने में जुट जाते रहे हैं। वहीं युद्धरत साम्राज्यवादी मुल्क इस बात का प्रयास करते रहे हैं कि युद्ध में उनके नागरिक मरने के बजाय गरीब मुल्कों के नागरिकों को चारा बनाया जाए। इस मामले में पश्चिमी साम्राज्यवादी यूक्रेन की तरफ से अरब देशों के लोगों को लड़ने में झोंकते रहे हैं तो रूसी साम्राज्यवादी उ. कोरिया-भारत सरीखे देशों के गरीब लोगों को युद्ध में लगाते रहे हैं। 
    
केवल युद्ध के मोर्चे पर ही नहीं अन्य कामों में भी कामगारों की कमी होने पर युद्धरत ताकतें गरीब मुल्कों के कामगारों के लिए अपने दरवाजे खोलती रही हैं। जिन्हें युद्ध समाप्त होने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर किया जाता रहा है। पहले इजरायली हत्यारे शासकों ने भारतीय कामगारों की बड़े पैमाने पर भर्ती की और अब रूसी साम्राज्यवादी भारत के लोगों को अपने देश में काम देने पर उतारू हैं। 
    
इसमें सबसे घृणास्पद भूमिका भारत सरकार की है जो एक तरफ अमेरिका से खदेड़े जा रहे हथकड़ियां पहने भारतीय कामगारों पर अमेरिका से कोई विरोध तक दर्ज नहीं कराती। वहीं दूसरी तरफ पहले इजरायल और फिर रूस से करार कर भारतीय कामगारों को युद्धरत क्षेत्रों में मरने के लिए भेजने पर कोई शर्म तक महसूस नहीं करती। उल्टा वह भारत के लोगों को अच्छा रोजगार दिलाने का दम्भ भरती है। 
    
स्पष्ट है भयावह बेरोजगारी के शिकार युवा देश में भूखे मरने के बजाय युद्धरत क्षेत्रों में काम करने को तरजीह दे रहे हैं। और भारत सरकार देश में काम पैदा करने की अपनी नाकामी छिपा इन्हें युद्धरत देशों में भेज रही है। भारतीय करोड़ों बेरोजगारों से मोदी सरकार को कोई सरोकार नहीं है कि युद्धरत देशों में वे किन हालातों में जिएंगे। ये बेरोजगार युद्ध के चारे के रूप में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। भारत सरकार खुद उन्हें मौत के मुंह में भेज रही है जबकि अमीरजादों को युद्ध शुरू होने पर यही सरकार सुरक्षित वापस लाती रही है। स्पष्ट है सरकार की नजर में बेरोजगारों की जान की कोई कीमत नहीं है। 

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