मुखौटे के पीछे असली चेहरा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 2025 में सौ साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर आरएसएस ‘100 इयर्स आफ संघ जर्नी : न्यू होराइजन्स’ नामक व्याख्यान श्रृंखला चला रहा है। इस एक साल में पूरे भारत में लगभग 1000 से अधिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाना है जिसकी शुरुआत 8 नवंबर 2025 को बेंगलुरु में की गई। बेंगलुरु में हुए व्याख्यान के दौरान मोहन भागवत ने कई दावे किए जिनमें से एक दावा यह है कि उनका संगठन (आरएसएस) राजनीतिक संगठन नहीं है वह एक सांस्कृतिक संगठन है। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार कहा जा रहा है। आरएसएस पहले भी ऐसी बातें कहता रहा है।
    
शायद देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करना उसके लिए हिंदुओं को गोलबंद करना राजनीति नहीं है? शायद जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी बनाना राजनीति नहीं है? शायद देश में मस्जिदों को ढहाना, मन्दिरों को बनवाने की बात करना राजनीति करना नहीं है? शायद देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करना राजनीति करना नहीं है? शायद देश में हिंदू-मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश करना राजनीति करना नहीं है? क्योंकि यह मुद्दे तो आरएसएस के जन्म के साथ से उसके साथ हैं और इन सौ सालों में आरएसएस ने इन्हीं मुद्दों पर काम किया है। 
    
भाजपा, एबीवीपी, बजरंग दल जैसे अपने अनुषंगी संगठन बनाना, भाजपा के अध्यक्ष से लेकर देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को चयनित करने वाले कह रहे हैं कि वह राजनीतिक नहीं हैं? शिक्षण संस्थानों से लेकर न्यायपालिका जैसे देश के हर संस्थान में आरएसएस के लोगों को बैठा कर देश की राजनीति को अपने मुद्दों के हिसाब से संचालित करना राजनीति नहीं है? संघ के सौ साल पूरे होने पर हर हिन्दू घर में जाकर हिन्दू राष्ट्र बनाने की बातें करना राजनीति नहीं है? अगर ये राजनीति नहीं तो राजनीति क्या होती है?
    
दरअसल संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगा। सबसे पहले आजादी के एक साल बाद ही। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या संघ से जुड़े नाथूराम गोडसे ने की थी। 18 महीने तक संघ पर प्रतिबंध लगा रहा। ये प्रतिबंध 11 जुलाई, 1949 को देश के उस वक्त के गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने हटाया और आरएसएस के सामने कई शर्तें रखीं जिनमें एक शर्त यह भी थी कि आरएसएस देश की राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह से दूरी बनाकर रखेगा तभी उस पर से प्रतिबंध हटाया जाएगा। उस समय इस शर्त को मानने के सिवा कोई रास्ता नहीं था क्योंकि संघ का अपनी शुरुआत से मौका परस्ती और माफी मांगने का ही इतिहास रहा है। चाहे वह आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों से माफी मांगने की बात हो या फिर आजाद भारत में प्रतिबंध हटवाने के लिए। इसलिए उस समय के संघ प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने बिना शर्त यह बात मान ली। और तब से आरएसएस अपने आप को तथाकथित गैर राजनीतिक संगठन कहने लगा। लेकिन सिर्फ कहने के लिए। देश की जनता को धोखा देने के लिए। आरएसएस का कहना है कि वह राजनीति से दूर है क्योंकि वह सीधे चुनाव नहीं लड़ रहा है। 
    
इस बार भी यह सवाल तब उठा जब आरएसएस के अनुषंगी संगठन भाजपा (जो इस समय सत्ता में है) के अमित शाह (गृहमंत्री) ने सरकारी कर्मचारियों का आरएसएस के कार्यक्रमों/शाखाओं में शामिल होने पर प्रतिबंध हटा दिया। यह प्रतिबंध 30 नवंबर 1966 को लगाया गया था। 
    
इसके बाद 1975 और 1992 में आरएसएस पर दो बार और प्रतिबंध लगा और हटा और इतने सालों से देश में भाजपा की सरकार है लेकिन अभी तक सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध नहीं हटा सके थे लेकिन जैसे ही आरएसएस के सौ साल पूरे होने जा रहे थे ये प्रतिबंध हटा लिया गया ताकि सरकारी कर्मचारियों को भी आरएसएस की हिन्दू फासीवादी परियोजना में शामिल किया जा सके, उनका इस्तेमाल किया जा सके। 
    
इस प्रतिबंध को हटाने का देश में विरोध हो रहा है जिसको शांत करने के लिए फिर यह वही घिसी-पिटी बातें दोहराने लगे कि आरएसएस कोई राजनीतिक संगठन नहीं है जिसमें सरकारी कर्मचारियों को शामिल होने से रोका जाना चाहिए। 
    
दरअसल फासीवादी झूठ का सहारा लेकर ही आगे बढ़ सकते हैं। वह देश की बहुसंख्यक आबादी के सामने एक नकली दुश्मन खड़ा करते हैं। लोक-लुभावन नारे उछालते हैं। यह ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जैसे ये देश की आम मेहनतकश जनता के हित में काम करने वाले हैं। उनकी जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए ही काम कर रहे हैं। लेकिन असल में ये आम मेहनतकश जनता को तबाह-बर्बाद करके देश के पूंजीपतियों को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए आम मेहनतकश जनता को बांटने का काम करते हैं। जैसे हाथी के दांत दिखाने के कुछ, और खाने के कुछ और होते हैं वैसे ही ये फासीवादी एक झूठे मखौटे के पीछे अपना असली खूंखार चेहरा छिपा कर रखते हैं।
    
हिटलर ने भी अपनी पार्टी के नाम में समाजवादी शब्द को जोड़कर अपना खूंखार चेहरा छिपाने की कोशिश की। वैसे ही आज आरएसएस अपने को एक राजनीतिक संगठन के बजाय एक सांस्कृतिक संगठन बताकर अपना खूंखार चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन देश दुनिया को चलाने वाली, उत्पादन करने वाली मेहनतकश जनता असली और नकली को पहचानना भी जानती है और जिस दिन वह इस मुखौटे के पीछे के असली खूंखार चेहरा को पहचान लेगी उस दिन उनको उनकी सही जगह दिखा देगी। 
    
हिटलर जैसे फासीवादी तानाशाह ने, जो दुनिया को जीतने चला था अंत में अपने ही देश की मेहनतकश जनता के डर से खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी और इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गया। इससे बेहतर हस्र आज के फासीवादियों का और क्या ही हो सकता है।
 

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