साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और सूडान में जारी नरसंहार

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अफ्रीका के देश सूडान में बड़े पैमाने पर नरसंहार जारी है। यह लम्बे समय से चल रहा है। एक तरफ सूडान की केन्द्रीय सरकार की सेना है। यह केन्द्रीय सरकार अल बुरहान नामक जनरल के नेतृत्व में सैनिक तानाशाही है। दूसरी तरफ हेमदती नामक सैन्य अधिकारी के नेतृत्व में रेपिड सपोर्ट फोर्सेस नामक मिलिशिया है। ये दोनों सैन्य बल समूचे देश में अपना-अपना कब्जा करने को लेकर युद्धरत हैं। इस युद्ध में दोनों तरफ से आम लोगों का कत्लेआम किया जा रहा है। लोगों को बड़े पैमाने पर शरणार्थी बनने पर मजबूर किया जा रहा है। लाखों शरणार्थी दक्षिणी सूडान और मिस्र की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हुए हैं। इस समय रेपिड सपोर्ट फोर्सेस ने पश्चिमी सूडान के बडे शहर अल फशेर पर कब्जा कर लिया और सरकारी सेना को वहां पर पराजित कर दिया। इसके बाद बड़े पैमाने पर वहां की आबादी का नरसंहार किया। लोगों का खाना, पानी बंद कर दिया। लाखों लोग घरों के भीतर कैद होने के लिए विवश हो गये। 
    
दरअसल, सूडान के भीतर गृहयुद्ध और नरसंहार का यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है। सूडान में करीब 30 वर्ष तक अल बशीर नामक जनरल की तानाशाही वाली सरकार रही है। इस दौरान अल बशीर ने सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति को जारी रखते हुए अरबों और गैर अरबी अवाम के बीच विवादों को भड़काया। इसके साथ ही इस्लाम धर्म मानने वाले और ईसाई धर्म मानने वाले तथा स्थानीय गैर इस्लामी आदिवासी समूहों की मान्यताओं को मानने वालों के बीच टकरावों को बढ़ाया। गैर-अरबी और गैर-इस्लामी आबादी के साथ भेदभाव और अतिरिक्त उत्पीड़न को घनीभूत किया। स्वाभाविक तौर पर इसकी प्रतिक्रिया होनी थी। उत्तर में दारफुर में गैर-अरबी लोग अपना प्रतिरोध संघर्ष शुरू कर चुके थे। इन्हें कुचलने के लिए अल बशीर की हुकूमत ने जंजीवेद नामक एक हमलावर मिलिशिया का गठन किया। इसी जंजीवेद मिलिशिया का नेता हेमदती नामक एक अधिकारी था। इस मिलिशिया ने सेना की सहायता और सहयोग से दारफुर में गैर-अरब जनता का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया। 
    
लेकिन अल-बशीर की सत्ता के विरुद्ध 2018 से बड़े पैमाने पर जुझारू विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये। इन विरोध प्रदर्शनों में मजदूर वर्ग और व्यापक मेहनतकश अवाम की बहुत बड़ी भूमिका थी। लाखों लोग सड़कों पर समूचे सूडान में उतर पड़े। पोर्ट सूडान से लेकर राजधानी खारतूम पर लोग जुझारू विरोध कर रहे थे। कई बार आम हड़तालें हुईं। लोगों ने न सिर्फ प्रदर्शन और आम हड़ताल की बल्कि सेना के दमन के शिकार घायल लोगों का इलाज कराया। लोगों को जरूरत की चीजें मुहैया करायीं। और अल बशीर की तानाशाही को खत्म करने के संघर्ष को और तेज कर दिया। लोगों के इस आंदोलन के सशक्त प्रतिरोध के बढ़ते जाने के चलते सेना ने अल बशीर की तानाशाही सत्ता को हटा दिया। इससे पहले जंजीवेद मिलिशिया को रेपिड सपोर्ट फोर्सेस में तब्दील कर दिया गया था। अल बशीर की तानाशाही को हटाने में सेना और रेपिड सपोर्ट फोर्सेस, दोनों की भूमिका थी। इस समय तक रेपिड सपोर्ट फोर्सेस में मिलिशिया लोगों की संख्या लगभग 1 लाख तक पहुंच गयी थी। 
    
सेना द्वारा अल बशीर की तानाशाह सत्ता को समाप्त करने का मुख्य कारण व्यापक व सशक्त जन प्रतिरोध था। सेना व रेपिड सपोर्ट फोर्सेस के नेताओं के साथ ही सूडान के समाज में शोषक वर्ग यह सोचते थे कि यदि अल बशीर को सत्ता से नहीं हटाया गया तो समूचे शोषक वर्ग के विशेषाधिकारों को भी जन आंदोलन का तूफान बहा कर ले जायेगा। इसके बाद कुछ दिनों के लिए एक संक्रमणकालीन नागरिक सरकार का गठन किया गया। लेकिन असली सत्ता की बागडोर सेना प्रमुख अल-बुरहान के हाथ में ही रही। 
    
इस संक्रमणकालीन सरकार के दौरान कुछ लोगों को रिहा किया गया। एक हद तक नागरिक आजादी बहाल की गयी। लेकिन इसके साथ ही आंदोलनकारियों का दमन भी जारी रहा। आंदोलनकारी सेना की सरकार में भूमिका के विरुद्ध थे। इस संक्रमणकालीन सरकार में अल बशीर के नजदीकी लोगों को भी शामिल किया गया था। आंदोलनकारी इसके विरुद्ध थे। वे देशव्यापी पैमाने पर चुनाव कराकर नई पूर्ण नागरिक सरकार की मांग कर रहे थे। 
    
जब सेना ने यह देखा कि अल बशीर के सत्ता से हटने के बाद भी जन आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है तब फिर से बड़े पैमाने पर दमन और नरसंहार शुरू हो गया। जन आंदोलन और जन विद्रोह 2021 तक चला। अंततोगत्वा सेना और रेपिड सपोर्ट फोर्सेस द्वारा कुचल दिया गया। अब तक रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की ताकत और ज्यादा बढ़ गयी थी। सेना के नेता अल बुरहान और रेपिड सपोर्ट फोर्सेस के नेता हेमदती के बीच देश की सत्ता के लिए और संसाधनों के बीच कब्जे करने के लिए गृहयुद्ध शुरू हो गया। तब से यह गृहयुद्ध जारी है और गहराता और व्यापक होता जा रहा है। रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की विचारधारा दकियानूसी और इस्लामपंथी है और यह ज्यादा बड़े नरसंहारों व अत्याचारों के लिए दारफूर को कुचलने के समय से ही कुख्यात रहा है। लेकिन सेना का प्रमुख अल-बुरहान भी साम्राज्यवादियों और क्षेत्रीय शक्तियों की दखलदांजी का प्रमुख औजार है। 
    
यदि साम्राज्यवादी और क्षेत्रीय अरब देशों के शासकों का सूडान की इन दोनों सेनाओं के मुखियाओं को समर्थन नहीं होता और बड़े पैमाने पर इनको हथियारों और धन को मुहैया नहीं कराया गया होता तो इनके बीच में यह गृहयुद्ध और इनके द्वारा चलाये जा रहे नरसंहार व अत्याचार इतने बड़े पैमाने पर संभव नहीं होते। 
    
सूडान प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध देश है। यहां तेल, सोना और खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है। इन संसाधनों पर कब्जा करने के लिए विभिन्न साम्राज्यवादी शक्तियां निगाहें गड़ाये रही हैं। इसमें अमरीकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रमुख रहे हैं। 1955 में सूडान की आजादी के पहले यह ब्रिटिश उपनिवेश था। ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतें मिस्र के जरिये इसका शासन संचालन करती थीं। अभी भी अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की यहां के सोने व तेल और खनिज संपदा पर अधिकार के लिए यहां की सत्ता में और  समाज में दखलदांजी काफी ज्यादा है। सूडान के बैंकों, उद्योगों और सोने की खदानों के मालिकाने का बड़ा हिस्सा सेना के शीर्ष अधिकारियों के पास है। उनका निहित स्वार्थ ही उन्हें साम्राज्यवादियों के साथ सांठ-गांठ की ओर ले जाता है। रेपिड सपोर्ट फार्सेस के नेता हेमदती सोने की खदानों पर अधिकाधिक नियंत्रण चाहता है। कई सोने की खदानों पर उसका नियंत्रण है और इन खदानों से निकलने वाला सोना अवैध रूप से यूरोप और पश्चिम एशिया के देशों के बाजारों में बिकता है। 
    
चूंकि सूडान के दक्षिणी हिस्से में तेल का बड़ा भण्डार है। इस तेल भण्डार पर चीनी साम्राज्यवादियों की भी निगाहें रही हैं। बल्कि चीन ने बेल्ट और रोड इनीशियेटिव के तहत सूडान में अरबों डालर का निवेश कर रखा है। और इसके कर्ज का भुगतान सूडान द्वारा चीन को तेल की बिक्री के जरिये किया जाना था। इसके अतिरिक्त, सूडान की अल बशीर की सरकार दक्षिणी सूडान के साथ भेदभाव करती थी। और उसे एक पिछड़े हुए इलाके के रूप में बनाये हुए थी। इसके विरुद्ध दक्षिणी सूडान में आजादी को लेकर आंदोलन लम्बे समय से चल रहा था। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने इसका फायदा उठाया और दक्षिणी सूडान के तेल के भण्डार से चीनी साम्राज्यवादियों को बाहर करने में भूमिका निभायी और 2011 में यह सूडान का दक्षिणी हिस्सा एक स्वतंत्र देश दक्षिणी सूडान के नाम से बन गया। अब इस दक्षिणी सूडान के तेल पर अमरीकी साम्राज्यवादियों का प्रभाव हो गया। चूंकि दक्षिणी सूडान अत्यन्त पिछड़ा हुआ देश है। वहां गरीबी बहुत अधिक है और व्यापक भुखमरी है। इसके साथ ही वह भूआवेष्ठित देश है। इसकी तेल निकासी की पाइपलाइन सूडान से होकर जाती है। इसके लिए इसे सूडान से भारी मात्रा में राजस्व साझा करना पड़ता है। यहां भी भिन्न जनजाति समूहों के बीच तीखी टकराहटें चलती रहती हैं। 
    
जहां सूडान के तेल पर कब्जा करने और उसे चीनी प्रभाव क्षेत्र से निकालने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने सूडान का बंटवारा करके दक्षिण सूडान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी वहीं उसने सूडान की सत्ता का समर्थन जारी रखा, लेकिन उसने रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की भी निंदा नहीं की। बल्कि यमन में हूती लोगों की सत्ता से लड़ने में रेपिड सपोर्ट फोर्सेस के लोग संयुक्त अरब अमीरात की तरफ से शामिल हुए। इसमें अमरीकी व ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की न सिर्फ अरबों डालर की मदद की बल्कि हथियार भी मुहैया कराये। आज भी संयुक्त अरब अमीरात की हुकूमत सूडान में रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की आर्थिक व आधुनिक हथियारों से मदद कर रही है। जबकि मिस्र, साऊदी अरब, तुर्की और ईरान की सत्तायें सूडान की केन्द्रीय सैनिक तानाशाह सत्ता की मदद कर रही हैं। यह देखने में अजीब लग सकता है कि साऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सूडान में गृह युद्ध में  लगी परस्पर विरोधी सेनाओं की मदद कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादी दोनों मदद करने वाले पक्षों को एक-दूसरे की निंदा करने से रोक रहे हैं। अभी संयुक्त अरब अमीरात रेपिड सपोर्ट फोर्सेस द्वारा शासित इलाकों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है और उसे भारी पैमाने पर आधुनिक हथियार मुहैय्या करा रहा है। कहा यह भी जाता है कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी संयुक्त अरब अमीरात के माध्यम से रेपिड सपोर्ट फोर्सेस की मदद कर रहे हैं। जहां तक रूसी साम्राज्यवादियों का सवाल है, वे अभी कुछ समय पहले तक रेपिड सपोर्ट फोर्सेस के प्रशिक्षण के लिए अपनी वैगनर निजी सेना को तैनात किये हुए थे लेकिन सीरिया में असद की सत्ता गिरने के बाद रूसी साम्राज्यवादी पूर्वी भूमध्यसागर और लाल सागर में अपने अड्डे बनाने के लिए सूडान की केन्द्रीय सत्ता अल बुरहान की सत्ता के पक्ष में हो गये हैं और इस सैनिक तानाशाह से उन्होंने इस मसले पर समझौता भी कर लिया है। 
    
चीनी साम्राज्यवादी भी स्थिरता के नाम पर अल-बुरहान की सत्ता से सम्बन्ध बनाये हुए हैं। हालांकि वे ‘मध्यस्थ’ बनने की बातें करते रहे हैं। 
    
इस तरह, हम देखते हैं कि सूडान की गृहयुद्ध की स्थिति लगातार गंभीर हो रही है। इसमें लगातार हो रहे नरसंहार, भारी पैमाने पर आबादी का दूसरे देशों में और आंतरिक पलायन, भयंकर पैमाने पर भुखमरी और अकाल से हो रही मौतें और बीमारियों के शिकार लोगों की स्थिति गंभीर होती जा रही है। इस सबके बीच साम्राज्यवादी शक्तियां और क्षेत्रीय अरब देशों के शासक अपने हित साधने में जुटे हैं और सूडान की व्यापक मजदूर-मेहनतकश अवाम की इस बदहाल स्थिति से उनका कोई सरोकार नहीं है। न तो इन दोनों गुटों के सैन्य शासकों का इससे सरोकार है बल्कि ये तो इस स्थिति के जनक हैं। ये सभी शोषक वर्ग की जमातें, विशेष तौर पर साम्राज्यवादी शक्तियां, ऐसे ही नरसंहार और विनाश को अपनी समाप्ति तक जन्म देती रहेंगी। 
    
सूडान के गृहयुद्ध और नरसंहार के सबक दुनिया के मजदूर-मेहनतकश अवाम के लिए इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हैं कि यदि व्यापक और सशक्त जनांदोलन को उसकी अंतिम परिणति - व्यवस्था परिवर्तन- तक नहीं पहुंचाया जाता तो आदमखोर शोषक शक्तियां ऐसे ही मेहनतकशों का कत्लेआम करती रहेंगी।    

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